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अपने सीएम जी ने तो स्वीकार लिया किसानों का चैलेंज, वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की कलम से

Posted on: 30 May 2018 07:37 by Ravindra Singh Rana
अपने सीएम जी ने तो स्वीकार लिया किसानों का चैलेंज, वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की कलम से

किसानों के हित की सरकार चलाते चलाते सीएमजी ने बैठे ठाले किसानों का एक से दस जून वाला चैलेंज स्वीकार कर लिया है।वो कौन लोग हैं जो किसान हितैषी सरकार से किसानों का मोह भंग कराने की साज़िश रच रहे हैं।मुझे तो लगता है जब से कांग्रेस को यह भ्रम हुआ है कि उसमें अंगद के पैर को हिलाने जितनी ताक़त आती जा रही है तब से ही खेती किसानी कार्यक्रम में कांग्रेस की दिलचस्पी बढ़ी है। वरना तो प्रदेश में बीजेपी/सीएमजी को चौदह साल हो गए, केंद्र में कांग्रेस की सरकार से लेकर मोदी सरकार तक लगातार पाँच साल से मिल रही कृषि कर्मण अवार्ड वाली ट्राफ़ी कोई कांग्रेसी राज्य आज तक झपट ही नहीं पाया।

इतना सब होने के बाद भी किसानों ने जाने क्या सोचकर पिछले साल भी जून में सीएमजी को चैलेंज दे डाला। पाँच किसान सहित एक व्यक्ति की गोलीचालन में मौत हुई। गोलीकांड की जाँच के लिए बैठे आयोग की अवधि समाप्त हो गई लेकिन आज तक रिपोर्ट पता चली नहीं, फिर से जून आ गया।ठीक है आयोग की रिपोर्ट नहीं आई लेकिन सीएमजी की ‘किसान एक प्रेम कथा’ के संवाद में तो बदलाव नहीं आया ना। किसानों को तो को देना ही था तो सीएमजी को ‘हम फ़िट तो इंडिया फ़िट’ का चैलेंज देते, पीएमजी की तरह बिना एक पल गँवाए लपक लेते। भारत के गाँवों में रहने, गोबर उठाने, ढोर चराने और दिन रात खेतों में अपने शरीर को खाद-पानी बनाने वाला किसान क्या जाने ‘हम फ़िट तो इंडिया फिट’ का मतलब ।

ये फिट इंडिया वाले कहाँ खाते हैं उसके खेत की रासायनिक खाद से पैदा हुई सब्ज़ी और गेहूँ ,फिट रहने के लिए तो सलाद और ड्राइफ्रूट्स भी यहाँ वहाँ से मंगवाने पड़ते हैं। वैसे भी ट्विट वाली नीली चिड़िया खेतों में कहाँ चहकती है, पिछड़े गाँव वाले ये लोग तो मोबाइल में कोई नया नंबर सेव करना तक भी नहीं जानते। ये तो उनके जवान बच्चे ही हैं जो घर में बैठे बैठे दुनिया ज़हान की हलचल देख-समझ लेते हैं।पिछले साल भी बिना हैश टेग किए सरकार को चैलेंज युवा किसानों ने ही तो दिया था।

इस एक साल में कितना कुछ तो किया सरकार ने।क़र्ज़े पर क़र्ज़ा लेकर कर्ज में डूबती जा रही सरकार ने अन्नदाता को क़र्ज़ से मुक्त कराने की दिशा में प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक तक में लोक लुभावन योजनाओं की कितनी बार झड़ी लगाई।ऐसा तो नहीं कि हल बक्खर और बैंकों के चक्कर में किसान सरकार की उपलब्धियां पढ़ नहीं पाए या गाँवों में मोतियाबिंद की बीमारी फैलती जा रही है।फ़सल का दुगना मूल्य, क़र्ज़ से पूरी तरह मुक्ति जैसी योजनाओं से पहले सरकार को गाँव गाँव नेत्र परीक्षण शिविर और निःशुल्क चश्मा वितरण में आरएसएस का सहयोग लेना चाहिए वह इसलिए कि पंच परमेश्वर से लेकर पार्षद-विधायक-सांसद तक तो सीएमजी के इतने अच्छे कामों का गुणगान कर नहीं पा रहे हैं।

जनसंपर्क भी कितनी सक्सेस स्टोरी लिखे, उपलब्धियों के परिशिष्ट ही जब रद्दी के भाव बिक रहे हों तो छवि गड़ने वालों के लिए भी चुनौती है कि कहाँ से शब्द सौंदर्य तलाशें कि किसान को सरकार में कृष्ण-बलराम नजर आने लगे।पिछली बार तो प्रशासनिक कुएँ में ही भांग मिला दी थी, गफ़लत में पता ही नहीं चला कि कौन गुंडा, कौन किसान। ये अच्छा है कि इस बार सीएसजी से लेकर डीजीपी तक सब होशोहवास में हैं।गाँव गाँव पुलिस अलर्ट है, किसानों पर नजर है।भले ही वह छुट्टी मनाए दस दिन लेकिन देखना तो पड़ेगा ना कि छुट्टी में मस्ती तो नहीं करेंगे।

सीएमजी तो साल भर से चौपाल चौपाल कहते रहे हैं कि खूनखराबा करने वाले तो गुंडे थे, मेरा किसान भाई तो ऐसा कर ही नहीं सकता।ये अधिकारी हैं कि बेवजह सीएमजी के किसान प्रेम में बांड भरवाने का नींबू निचोड़ रहे हैं। किसान यदि हिंसा में शामिल ही नहीं थे तो फिर ये बांड वाली ज़बरदस्ती क्यों? एक तरफ़ सीएमजी उन पर दर्ज मुक़दमें, ज़ब्त वाहन वापस करने को कहे और दूसरी तरफ़ अमला अपनी ग़लतियों के पाप धोने के लिए ऐसी तत्परता दिखाए! इतनी ही चिंता रही तो साल भर के दौरान ऐसी पहल क्यों नहीं हुई कि किसान के मन में लंबी छुट्टी की सोच पैदा नहीं होती और भाकियू से लेकर कक्काजी और कांग्रेस को भरी गर्मी में अलाव जलाने का मौक़ा नहीं मिलता।

इन दस दिनों में कुछ हिंसक नहीं होगा क्योंकि किसानों ने तय किया है कि गाँव की सीमा से बाहर कदम नहीं रखेंगे। सरकार की तरह आमजन को भी अन्नदाता के निर्णय पर भरोसा करना चाहिए। किसानों के नाम पर जिन लोगों ने हिंसा फैलाने के प्लान बना रखे हों उनसे सरकार को सख्ती से ही निपटना चाहिए। सरकार ने शहरों को दूध की क़िल्लत से राहत के तो प्रबंध कर लिए, कृषि उपज मंडियों के अमले को भी गाँवों से सब्जी शहरों तक लाने में लगाना चाहिए।किसान छुट्टी आंदोलन शांति से निपट जाए और शहरों में दूध-सब्जी की क़िल्लत, ऊँचे दाम और मुनाफ़ाख़ोरों को मनमानी की छूट रही तो शहरी क्षेत्रों में सीएसजी को प्रशासनिक नाकामी का तमग़ा लेने के लिए तैयार रहना चाहिए।

कीर्ति राणा की कलम से

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