भगवान जगन्नाथ के रथ की ये खास बातें नहीं जानते होंगे आप

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ओडिशा की तीर्थ नगरी पुरी में आषाढ़ मास में निकाली जाने वाली रथ यात्रा आज से प्रारंभ हो रही है। इस रथ यात्रा में देश विदेश से आय लाखों श्रद्धालु शामिल होते है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को तीन अलग-अलग रथों में विराजित कर यात्रा निकाली जाती है। श्री कृष्ण भी जगन्नाथ जी के ही एक अंश है।

आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यह मोहत्सव मनाया जाता है और साथ ही रथ यात्रा भी निकली जाती है। आज से यह यात्रा शुरू हो चुकी है। भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘गरुड़ध्वज’ या ‘कपिलध्वज’ कहा जाता है। इस रथयात्रा उत्सव में भगवान जगन्नाथ को रथ पर विराजमान करके पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है।

यह रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है। यह परंपरा सालों से चली आ रही है जिसमे दुनिया भर के कई श्रद्धालु शामिल होते है। इस यात्रा से जुडी कई सारी मान्यता भी है, श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दूसरे को सहयोग देते हुए रथ खींचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस पवित्र रथयात्रा का आरंभ भगवान श्री जगन्नाथ जी के रथ के सामने सोने के हत्थे वाली झाडू को लगाकर किया जाता है। इसके ठीक बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ विधि-विधान के साथ रथयात्रा शुरू की जाती है। इस यात्रा में तीन रथ निकलते है जिसमे भगवान जगन्नाथ जी का रथ सबसे बड़ा होता है, इस रथ में कुल 16 पहिए लगे होते हैं।

भगवान जगन्नाथ के रथ की ऊंचाई 13.5 मीटर होती है। इस रथ में लाल और पीले रंग के कपड़े का इस्तेमाल होता है। इस रथयात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम, उसके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा व सुदर्शन चक्र और अंत में गरुण ध्वज पर श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं।

जाने जगन्नाथ जी की पूजा का महत्व क्या है?
जगन्नाथ जी की पूजा संतान प्राप्ति के लिए भी की जाती है जिसमे पति पत्नी पीले वस्त्र धारण करके भगवान जगन्नाथ की पूजा करते है और साथ ही मालपुए का भोग लगते है। इसके बाद गोपाल मंत्र का जाप करते है और संतान प्राप्ति की कामना करते है। इसके आलावा परिवार में प्रेम बढ़ाने के लिए और गृह पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए भी श्री जगन्नाथ जी की पूजा की जाती है।

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