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इस ठीकरे की किरचों से सिर तो आपका भी महफूज नहीं, गिरीश उपाध्‍याय की कलम से….

Posted on: 20 Jun 2018 10:20 by krishnpal rathore
इस ठीकरे की किरचों से सिर तो आपका भी महफूज नहीं, गिरीश उपाध्‍याय की कलम से….

इससे ज्‍यादा बचकाना बात क्‍या हो सकती है यदि भारतीय जनता पार्टी यह कहे कि जम्‍मू-कश्‍मीर में मुख्‍यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती की सरकार समस्‍याओं से ठीक से निपट नहीं पा रही थी और चूंकि वहां के हालात लगातार बिगड़ रहे थे, इसलिए हमने ‘राज्‍य के व्‍यापक हित’ में सरकार से अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया है।कोई भी पार्टी जो सरकार का हिस्‍सा हो वह अपने आपको किसी भी सूरत में इस तरह अलग नहीं बता सकती, तात्‍कालिक लाभ के लिए भले ही बयान कैसे भी दिए जाते रहें। यदि जम्‍मू कश्‍मीर के हालात बिगड़े हैं तो इसके लिए आप भी उतने ही जिम्‍मेदार हैं जितनी पीडीपी या मुख्‍यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती। आज पल्‍ला झाड़कर अलग होने का दिखावा करने के बजाय आप भी अपने मतदाताओं, पार्टी के कार्यकर्ताओं सहित पूरे देश को अपने किए धरे का हिसाब दें।इस बात का क्‍या मतलब होता है कि जनता ने जनादेश सरकार बनाने व चलाने के लिए दिया था इसलिए हमने जम्‍मू कश्‍मीर के लिए (गठबंधर सरकार का) बेहतर विकल्‍प चुना। बेहतर विकल्‍प का मतलब सांप और नेवले की दोस्‍ती नहीं होता। और दोनों मिलकर दिखावे के लिए दोस्‍ती कर भी लें तो वह ज्‍यादा दिन नहीं चलती। याद करें, आपने ही तो पिछले दिनों विपक्षी दलों के निकट आने पर टिप्‍पणी की थी कि बाढ़ के समय सांप, नेवला, कुत्‍ता, बिल्‍ली सब एक पेड़ पर चढ़ जाते हैं। असल में जम्‍मू कश्‍मीर में आपने भी यही किया।

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चार दिन पहले मैंने इसी कॉलम में लिखा था- ‘’घाटी में जिस तरह से हिंसा का लगातार फैलाव होता जा रहा है और जिस तरह युवाओं और किशोरों को पत्‍थरबाजी जैसी वारदातों में मोहरा बनाया जा रहा है, वह बताता है कि देश के इस सबसे संवेदनशील राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था के साथ साथ गवर्नेंस के हालात भी काबू से बाहर चले गए हैं। सीजफायर जैसे भावनात्‍मक फैसलों का अलगाववादियों के लिए कोई महत्‍व नहीं रहा है।‘’आपने सरकार से अलग होने का फैसला इसलिए नहीं किया कि घाटी में हालात बिगड़ गए हैं। घाटी में हालात कोई आज बिगड़े हैं क्‍या? वे तो लगातार बिगड़ ही रहे थे। सरकार से आप इसलिए अलग हुए क्‍योंकि उसके अलावा आपके पास अपनी नाक बचाने का कोई उपाय ही नहीं रह गया था। सीजफायर के परिणामों के बाद तो यदि आप यह फैसला नहीं लेते तो पीडीपी यह कदम उठा लेती।आनन फानन में सरकार से हाथ खींचने का एकमात्र कारण अपनी बची खुची जमीन और साख (?) को बनाए रखना है। वह तो पीडीपी चूक गई, वरना यह पहल उसने कर ली होती तो आप कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। वैसे इस बात की पूरी संभावना है कि पीडीपी ऐसा कदम उठाने की सोच रही हो और आपने इंटेलीजेंस इनपुट के आधार पर पहल कर दी हो।जम्‍मू कश्‍मीर में जो होना था वह हो चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि आगे क्‍या? आगे आपके सामने सीमा पार पाकिस्‍तानी फौज खड़ी है, सीमा पर घुसपैठ को तैयार आतंकवादी खड़े हैं और शहरों, गांवों और बस्तियों में आपके सामने हाथ में पत्‍थर लिए कश्‍मीर के नौजवान खड़े हैं। यदि आप इन सबसे निपटने का एक ही तरीका अपने मन में ठाने हुए हैं और वह तरीका गोली का है, तो याद रखिएगा कि ये पूरा जाल बिछाया ही इसीलिए गया है कि आप गोली चलाएं।

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अपनी सरकार गिर जाने के बाद मुख्‍यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती जाने अनजाने में बहुत ही मार्के की बात कह गई हैं। उन्‍होंने कहा-‘’सरकार के जरिये हम जम्‍मू कश्‍मीर में अपना एजेंडा लागू करवाने में सफल रहे हैं।‘’ यह सिर्फ पीडीपी की नेता का कथन नहीं, घाटी में पनप रहे हालात पर दिया गया ‘रणनीतिक बयान’ है। इसे और समझना हो तो मेहबूबा को आगे सुन लीजिए, वे कहती हैं कि ‘’जम्मू-कश्मीर में डर की नीति नहीं चलेगी। कश्मीर के लोगों से बातचीत होनी चाहिए, पाकिस्तान से बातचीत होनी चाहिए, ये हमारी हमेशा से कोशिश रही।‘’यानी आपने समर्थन वापस लेकर जिस पार्टी को सरकार से बेदखल किया है वह पार्टी अब उसी कश्‍मीर घाटी में वो हालात पैदा करने की कोशिश करेगी जहां मुकाबला ‘भारत बनाम कश्‍मीर’ का होगा। बात भले ही कड़वी लगे, लेकिन आज भी तो देश के अन्‍य हिस्‍सों से जाने वालों से वहां यह सवाल पूछा ही जाता है ना कि क्‍या आप भारत से आए हैं?वैसे घोषित तौर पर आपने भले ही मेहबूबा पर सारा ठीकरा फोड़ दिया हो, लेकिन पिछले तीन सालों में आपने सरकार में रहते हुए क्‍या किया वह भी अब देश के सामने आना चाहिए। सवाल आपसे क्‍यों नहीं पूछा जाए कि आपने वहां हालात बदलने के लिए क्‍या किया? कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद के इस कथन के बहुत गहरे अर्थ हैं कि जिस पार्टी की स्‍थापना ही कश्‍मीर के हालात को लेकर हुई, जिसने वहां विरोध की राजनीति करके खुद को खड़ा किया, वह सरकार चलाने के काबिल थी ही नहीं।एक छोटा सा उदाहरण ही ले लें। आपने केंद्र में अपनी सरकार बनने के बाद और फिर राज्‍य में गठबंधन की सरकार का आत्‍मघाती प्रयोग करने के बाद बड़े जोर शोर से कहा था कि घाटी से बेदखल किए गए लोगों को फिर से वहां बसाया जाएगा। जहां तक मुझे याद है मोदी सरकार के पहले या दूसरे बजट में कश्‍मीरी पंडितों के ऐसे पुनर्वास के लिए 500 करोड़ की रकम भी रखी गई थी। क्‍या भाजपा या केंद्र सरकार आज बताने की स्थिति में है कि वहां ऐसा कितने लोगों का पुनर्वास कराया गया?

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क्‍या उनके कोई माकूल जवाब आपके पास हैं? दरअसल आपका एजेंडा किसी भी कीमत पर सत्‍ता या फिर सत्‍ता में भागीदारी हासिल करना है। फिर चाहे वह कीमत आपकी विचारधारा की या आपके लिए सत्‍ता की जमीन तैयार करने वाले आपके पूर्वजों की पुण्‍याई की ही क्‍यों न हो। आपकी जिद है कि आपके अश्‍वमेधी घोड़े की लगाम कोई न पकड़ पाए. हम जैसे कलमघसीट आपको सलाह तो क्‍या देंगे, लेकिन एक बात है जो अंत में आपसे शेयर करने को मन कर रहा है। दुनिया की किसी भी समस्‍या का समाधान गोली से नहीं निकला है। कश्‍मीर के भीतर आप ये गलती मत करिएगा। आपके विरोधी हर पल चाहेंगे कि आप कब जनता पर गोली चलाएं और आपको जाल में फंसा लिया जाए। दूसरे, अफसरों के भरोसे इस समस्‍या को हल करने के सपने मत देखिएगा। अच्‍छा हो या बुरा, अंतत: पोलिटिकल सिस्‍टम ही ऐसे मामलों में काम आता है। जितनी जल्‍दी हो सके उसकी पुनर्स्‍थापना की कोशिश करिएगा…

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