आखिर क्यों छलनी से चांद को देखकर तोड़ा जाता है करवा-चौथ का व्रत

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कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए इस व्रत का विशेष महत्व है। कुवांरी कन्याएं भी अच्छे पति की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का रूप माना जाता है।

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कहानी और फिल्मों में हमने चंद के बारे में बहुत सी बाते सुनी है। चांद प्रेम का प्रतीक होता है। ये भी मान्यता है कि चांद की आयु लंबी होती है। यही वजह है कि करवा चौथ के व्रत के दौरान महिलाएं छलनी से चांद को देखकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं और अपने पति को छलनी से देख के चांद की पूजा करके ही अपना व्रत पूरा करती हैं।

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एक पौराणिक कथा के मुताबिक, ‘साहूकार की बेटी ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। लेकिन भूख से उसकी हालत खराब होने लगी थी। साहूकार के 7 बेटे भी थे। साहूकार के बेटों ने अपनी बहन से खाना खाने को कहा। लेकिन साहूकार की बेटी ने खाने से इंकार कर दिया। भाइयों से जब बहन की हालत देखी नहीं गई तो उन्होंने चांद निकलने से पहले ही एक पेड़ की आड़ छलनी के पीछे एक जलता हुआ दीपक रखकर बहन को कहा कि चांद निकल आया है। तब उनकी बहन ने दीपक को चांद समझकर अपना व्रत खोल लिया था। लेकिन व्रत खोलने के बाद उसके पति की मुत्यु हो गई। माना जाता है कि असली चांद को देखे बिना व्रत खोलने की वजह से ही उसके पति की मृत्यु हुई।’

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शायद यही वजह रही होगी कि स्वयं अपने हाथ में छलनी लेकर चांद को देखने के बाद पति को देखकर करवा चौथ का व्रत खोलने की परंपरा शुरू हुई, ताकि कोई छल कपट से किसी का व्रत न तुड़वा सके।

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