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शिक्षा के निजीकरण से सरकार हमारी अगली पीड़ी के लिए कब्र खोद रही है

Posted on: 20 Jun 2019 20:06 by Mohit Devkar
शिक्षा के निजीकरण से सरकार हमारी अगली पीड़ी के लिए कब्र खोद रही है

नीरज राठौर


मध्य प्रदेश में कृषि शिक्षा के निजीकरण के विरोध में सरकारी कृषि कालेजो के 5000 स्टूडेंट्स मैदान में है इन्हें प्रदेश के कृषि संगठनो के 50000 लोगो का समर्थन भी मिल रहा है । ये स्थति क्यों बनी, इसके लिए थोडा पीछे चलते है ।

शिक्षा के निजीकरण के लिए पीथमपुर का एक उदाहरण देता हूं। मुन्नालाल कुशवाह पीथमपुर में एक कारखाने में कार्य करता है और लगभग 14,000 रुपये महीना कमाता है। उसके दो बच्चे हैं, 9 वर्षीय अरुण और 7 साल की सविता। उसने दोनों बच्चों को स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था लेकिन उसने महसूस किया कि बच्चे वास्तव में कुछ भी नहीं सीख रहे थे। सभी ने सुझाव दिया कि निजी स्कूल बेहतर होगा। तो उसने उन्हें एक स्थानीय निजी स्कूल में दाखिल करवा दिया। अब उसे परिवहन, किताबें और विभिन्न ‘शुल्क सहित दो बच्चों के लिए हर महीने लगभग 5,000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। वह अभी भी शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में अनिश्चित है लेकिन परिवार ने इस ऊंची लागत को पूरा करने के लिए अपने खर्चों में कटौती की है।

हमने खाद्य पदार्थों, कपड़ों पर अपने खर्च को सीमित कर दिया और बच्चों को शिक्षित करने की लागत को पूरा करने के लिए एक कमरे के किराए के आवास में रहने लगे। मैं चाहता हूं कि उन्हें बेहतर जीवन मिले, ये बात राम चंद ने कहा। यह कहानी देश के हर कोने में दोहराई जाती है। काम करने वाले लोगों, जो पहले से ही कम मजदूरी और बढ़ती कीमतों का बोझ उठा रहे हैं, किसी भी तरह से अपने बच्चों की ‘अच्छी शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि गरीबी से बाहर निकलने का यही एक तरीका होगा।

ऐसा क्यों है? सरकार सभी नागरिकों के लिए सस्ती और अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा क्यों नहीं दे सकती? यह सरकार क्यों मुनाफाखोरों को लाभ के लिए स्कूलों एवं कॉलेजों को चलाने की इज़ाजत देती है जो गरीब लोगों की जेब काट रहे हैं?

यद्यपि इस देश में हमेशा दो स्तरीय शिक्षा प्रणाली रही है – जनता के लिए खराब गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूल और अभिजात वर्ग के लिए सभी सुविधाओं के साथ समृद्ध स्कूल, पर हाल के वर्षों में चीजें तेजी से बदतर हो गई हैं। सरकार ने निजी व्यवसाईयों को उच्च लागत वाले संस्थान खोलने की इजाजत देकर अपने स्वयं के स्कूलों और कॉलेजों को कोष से महरूम रख कर कमज़ोर करने की नीति अपनाई है। सरकार ने शिक्षा पर खर्च करने और अधिक शैक्षिक अवसर प्रदान करने से इंकार कर दिया है जिससे शिक्षा में निजी क्षेत्र के हिस्से में वृद्धि हुई है।

सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षा की लागत निजी स्कूलों में 6-7 गुना अधिक है, जिनकी फीस औसतन 14,000 रुपये प्रति वर्ष है। उच्चतर माध्यमिक स्तर के लिए, निजी स्कूल शुल्क प्रति वर्ष औसतन 30,000 रुपये प्रति वर्ष है।

काम करने वाले लोगों के लिए, 10वीं या 12वीं से अधिक अपने बच्चों को शिक्षित करना असंभव हो रहा है। सरकारी कॉलेजों में औसत मेडिकल कॉलेज शुल्क 73,000 रुपये और निजी कॉलेजों में 1,49,000 रुपये हैं। कंप्यूटर पाठ्यक्रमों के लिए, सरकारी संस्थान 30,000 रुपये चार्ज करते हैं जबकि निजी संस्थान 60,000 रुपये लेते हैं। इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में सरकारी कॉलेज 43,000 रुपये मांगते हैं, जबकि निजी कॉलेज 83,000 रुपये मांगते हैं। कृषि शिक्षा के लिए सरकारी फीस 15000 एवं निजी की फीस 60000 रूपये है । कौन सा कारखाना कर्मचारी इतना भुगतान कर सकता है?

निजी स्कूल और कॉलेज आम लोगों की पहुंच से काफी अधिक शुल्क लेते हैं और माता-पिता को अपनी भूमि या सोने को बेचने या अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए ऋण लेना पड़ता है। बड़ी संख्या में परिवारों और उनके बच्चों का विशाल बहुमत कम गुणवत्ता वाले संस्थानों तक ही सीमित है, जिनमें, अक्सर कम वेतन वाले हतोत्साहित अनुबंधित शिक्षकों, कई बिना किसी शिक्षक के साथ और कई इसके साथ ही बिना किसी उचित आधारभूत संरचना के होते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सामान्य तौर पर गिरावट आई है। निजी संस्थान आम लोगों की जेब काटने के बावजूद, गुणवत्ता वाली शिक्षा देने के लिए ज्यादा नहीं जाने जाते हैं और बड़ी संख्या में बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहे हैं।

शिक्षा के लिए अपर्याप्त निधि :

वर्षों से सरकार द्वारा पैसे में लगातार की जा रही कमी, पहुँच वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के पतन का मुख्य कारण है। 1968 में कोठारी आयोग ने अनुमान लगाया था कि लोगों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च किया जाना चाहिए। लेकिन सभी सरकारों ने लगातार होती इस कमी को नजरअंदाज कर दिया, जिससे गुणवत्ता और शिक्षा की पहुंच में लगातार गिरावट आई। वर्तमान सरकार की बजटीय नीति ने शिक्षा के लिए धन में कटौती कर स्थिति को और बिगाड़ दिया है।

केंद्र सरकार के कुल बजटीय व्यय के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर व्यय 2013-14 में 4.6 प्रतिशत से घटकर 2018-19 के बजट में 3.5 प्रतिशत हो गया है।

चूंकि राज्य सरकारें स्कूल शिक्षा पर एक महत्वपूर्ण हिस्सा खर्च करती हैं, इसलिए हम केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा पर संयुक्त व्यय को देखते हैं। यह भी 2012-13 और 2013-14 में 11.6 प्रतिशत से घटकर 2017-18 के लिए 10 प्रतिशत हो गया है।

इसे समझने का एक और तरीका जीडीपी के हिस्से के रूप में शिक्षा खर्च को देखने का है जो एक वर्ष में देश का कुल उत्पादन है। यहां तक कि सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि जारी है – और सरकार इसे लगातार मानती भी है। पर शिक्षा पर खर्च किए जाने वाले हिस्से में लगातार गिरावट आई है। जीडीपी के हिस्से के रूप में शिक्षा पर केंद्र सरकार का खर्च 2012-13 में 0.66 प्रतिशत से घटकर 2018-19 में 0.45 प्रतिशत हो गया है। दूसरे शब्दों में, जीडीपी के हिस्से के संदर्भ में शिक्षा खर्च में बत्तीस (32 प्रतिशत) की कमी आई है। 2012-13 और 2013-14 में संयुक्त केंद्रीय और राज्य सरकारों का खर्च 3.1 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 2.7 प्रतिशत हो गया।

निजी कोचिंग :

शिक्षण देने वाले लोगों को धीरे-धीरे उन लोगों के लिए संदिग्ध निजी कोचिंग संस्थानों को भेज दिया गया है जो भुगतान कर सकते हैं। यह एक प्रकार का ढका निजीकरण है। बच्चों को प्रतिष्ठित संस्थानों में लाने या इंजीनियरिंग या चिकित्सा जैसे प्रतिष्ठित पाठ्यक्रमों में प्रवेश परीक्षाओं को पास करने के लिए निजी कोचिंग आवश्यक है। यहां तक कि स्कूल के छात्रों के लिए भी, निजी ट्यूशन बहुत आम हैं, स्कूल के शिक्षक छात्रों को निजी कोचिंग के लिए निर्देशित करते हैं। भारत के लगभग एक चौथाई छात्रों का निजी शिक्षण / कोचिंग लेने का अनुमान है। 2015 में निजी कोचिंग उद्योग का आकार 2.39 लाख करोड़ रुपये था।

स्कूल शिक्षा में निजी क्षेत्र :

नवीनतम सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, निजी स्कूलों में कक्षा 1 से कक्षा 8 में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में 2010-11 और 2016-17 के बीच 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की है, जबकि सरकारी स्कूलों में नामांकित लोग 31 प्रतिशत से कम हो गए हैं। माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक चरण (कक्षा 8 से कक्षा 12) में, जबकि 2010-11 और 2015-16 के बीच सरकारी स्कूल नामांकन में केवल 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई, निजी स्कूल नामांकन में 22 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई,यह फिर से उच्च स्तर के निजीकरण दर्शाता है ।

उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र :

2016-17 के लिए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के 36,852 कॉलेजों में से 64 प्रतिशत निजी गैर सहायता प्राप्त कॉलेज हैं, 14 प्रतिशत सरकारी निधि द्वारा समर्थित निजी कॉलेज हैं और 22 प्रतिशत सरकारी कॉलेज हैं। इन कॉलेजों में नामांकित 2.64 करोड़ छात्रों में से 66 प्रतिशत निजी गैर सहायता या सहायता प्राप्त कॉलेजों में हैं और सरकारी कॉलेजों में केवल 33 प्रतिशत हैं। न केवल निजी कॉलेजों, बल्कि सरकारी कॉलेजों को भी उन पाठ्यक्रमों पर तेजी से अमल करने के लिए मजबूर किया गया है जिसके लिए छात्र उच्च शुल्क का भुगतान करने के इच्छुक हैं और उन्हें अपने खर्च/व्यय के बढ़ते हिस्से को वित्त पोषित करने के लिए राजस्व उत्पन्न करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इनमें से अधिकतर कॉलेज, निजी कॉलेजों की तरह ही, कम वेतन पाने वाले शिक्षकों से भरे हैं। इसलिए, वे बड़ी संख्या में छात्रों को पढ़ाने के लिए संकाय के बिना ही, नामांकन कर रहे हैं तथा परीक्षाएं आयोजित करने के लिए धन इक_ा कर रहे हैं और इनमें बड़ी संख्या में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने के लिए भी बहुत कम शिक्षक हैं। इस शिक्षा के बाजार में केवल डिग्री को ही खऱीदा और बेचा जा रहा है जोकि बिना किसी संस्थान में पढ़ाई किये बिना आसानी से प्राप्त हो रही है।

सरकार द्वारा शिक्षा की इस जानबूझकर अंडरफंडिंग और इसके निजीकरण की इजाजत अंतरराष्ट्रीय और घरेलू पूंजी की मांगों को पूरा करना है जो शिक्षा को लाभकारी वस्तु के रूप में देखते हैं। सरकार विश्व बैंक के दबाव और शिक्षा में मुनाफा पाने वाले बड़े अंतरराष्ट्रीय निगमों के दबाव में इस तरफ तेजी से बढ़ रही है। यह निजी क्षेत्र के दरवाजे खोलने के लिए है – दोनों घरेलू और विदेशी-कि मोदी सरकार लगातार अपना समर्थन वित्त पोषण और शिक्षा से पीछे हट रही है। परिणाम हमारी आंखों के सामने हैं – भारत की विशाल शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा अब निजी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित है।

शिक्षा का भगवाकरण :

मोदी की अगुवाई में बीजेपी सरकार शिक्षाहीन और अवैज्ञानिक मान्यताओं के साथ शिक्षा के सिद्धांत के रूप में वैज्ञानिक मानस को बदलकर शिक्षा और छात्रों की पूरी पीढ़ी को भी नष्ट कर रही है। इसका उद्देश्य हमारे अतीत में अनैतिक गर्व और दूसरों के लिए असंतोष / घृणा को बढ़ावा देना है। यह उन बच्चों की शिक्षा की प्रकृति को कमजोर करता है जो महत्वपूर्ण सोच, कारणों की क्षमता और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता पैदा करने के लिए माना जाता है। यह भारतीय छात्रों को भविष्य में गंभीर नुकसान पहुंचाएगा और लोगों के बीच टकराव पैदा करेगा। भारत का संविधान का अनुच्छेद 51 कहता है की सरकार को वैज्ञानिक एवं तार्किक शिक्षा को बढावा देने का कार्य करना चाहिए। लेकिन सरकार उलटा कर रही है वो अंधविश्वास एवं जातिवाद को बढावा देने वाली शिक्षा का प्रचार कर रही है ।

श्रमिकों की मांग :

हम, किसान एवं मजदूर ये चाहते हैं कि सरकार को शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 6 प्रतिशत खर्च करना चाहिए। इसका उपयोग स्कूलों और कॉलेजों में उचित आधारभूत संरचना बनाने, शिक्षकों को बेहतर वेतन देने और उन्हें उपयुक्त प्रशिक्षण सुनिश्चित करने, अधिक स्कूलों और कॉलेजों को खोलने, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का विस्तार करने के लिए किया जाना चाहिए। सरकार को शिक्षा क्षेत्र में लाभ को और निजी व्यवसायों के प्रसार की अनुमति देना बंद कर देना चाहिए। इसे घरेलू और विदेशी पूंजी निवेश और नौकरशाही प्रबंधन से बचाने वाली उच्च शिक्षा की स्वायत्तता को संरक्षित रखना चाहिए। शिक्षा सामग्री का भगवाकरण रोक दिया जाना चाहिए और संविधान के मूल्यों और वैज्ञानिक सोच को फिर से स्थापित होना चाहिए।

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