क्या शुक्ला परिवार की तरह संघवी परिवार की मिथ्या टूटेगी…? | Will the falsity of ‘Sanghvi Family’ break like a ‘Shukla Family’…?

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pankaj sanghvi

इंदौर: इंदौर शहर के दो बड़े राजनीतिक व वर्चस्वकारी घराने दोनों में काफी समानता और सामाजिक दायरा भी विस्तृत जिस तरह से लोगों ने प्रचाके चलते धारणा बना ली थी कि शुक्ला परिवार से कोई विधायक नहीं बन सकता, ठीक उसी तरह कहा जाता है कि संघवी परिवार से भी कोई विधायक या सांसद का चुनाव नहीं जीत सकता। शुक्ला परिवार ने तो गत नवम्बर माह में हुए विधानसभा चुनाव में विधायक का चुनाव जीतकर इस मिथ्या को तोड़ दिया कि यह परिवार पार्षद से ऊपर का चुनाव नहीं जीत सकता। अब शहर सहित सभी दूर यह चर्चा है कि इस बार क्या चुनाव जीतकर संघवी परिवार इस मिथ्या को तोड़ पाएगा?

अब शुक्ला परिवार के राजनीतिक पहलू पर गौर करे तो इस परिवार के मुखिया विष्णुप्रसाद शुक्ला (बड़े भय्या) है… वे भाजपा से जुड़े हुए हैं और पार्टी के गठन के समय से ही उसका झंडा बुलंद कर रहे हैं। एक दौर ऐसा था जब पार्टी के गठनकाल में कोई भाजपा का नाम नहीं लेता था और झंडा लगाने तक से बचता था। उस समय बड़े भैय्या ने अपने दमखम के साथ पार्टी को सींचा था। उनकी इसी मेहनत को देखते हुए पार्टी ने उन्हें 1986 में कांग्रेस और कम्युनिस्ट के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र क्रमांक 2 से विधानसभा का चुनाव लड़वाया था, जिसमें वे कांग्रेस के कन्हैयालाल यादव से पराजित हुए थे। मगर पार्टी का क्षेत्र क्रमांक 2 में वजूद कायम कर दिया था।

अयोध्या लहर के बाद वर्ष 1990 में हुए विधानसभा के चुनाव में पार्टी ने उन्हें दोबारा इसी क्षेत्र से टिकिट दिया और उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज सुरेश सेठ से हुआ। इस चुनाव में वे करीब 1100 वोटों से हार गए। इसके बाद बड़े भैय्या ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। इस दौरान विरोधियों ने खबर फैलाना शुरू कर दी कि शुक्ला परिवार से कोई विधायक नहीं बन सकता। वर्ष 1993 में इन्दौर नगर निगम के चुनाव हुए इस चुनाव में बड़े भैय्या के छोटे बेटे संजय शुक्ला ने कांग्रेस से सुदामा नगर वार्ड से पार्षद का चुनाव लड़ा और जीता। इस वार्ड में उन्होंने इतने काम किए कि लोग आज भी याद करते हैं।

पार्षद का चुनाव जीतने के बाद शुक्ला परिवार में पहली बार कोई जनता का चुनाव लड़कर जीता। यह चुनाव कांग्रेस ने फ्री फॉर ऑल यानि जो जीता वहीं सिकंदर के आधार पर लड़ा था। पार्टी में काफी गुटबाजी के चलते पार्षदों के टिकिट घोषित नहीं हुए थे और पंजा चुनाव चिह्न नहीं मिल पाया था। इसी परिवार से बड़े भैय्या के बड़े बेटे राजेन्द्र शुक्ला बाणगंगा क्षेत्र के वार्ड से पार्षद का चुनाव लड़े और प्रदेश में सर्वाधिक वोटों से चुनाव जीतने का रिकार्ड बनाया। शुक्ला परिवार पार्षद का चुनाव जीतने के बाद विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरा। राजेन्द्र शुक्ला को भाजपा ने वर्ष 2003 के आखिरी में हुए चुनाव में क्षेत्र क्रमांक 3 से टिकिट दिया। उनका मुकाबला कांग्रेस के अश्विन जोशी से था। शुक्ला क्षेत्र क्रमांक 1 में मेहनत कर रहे थे और यहीं से टिकिट मांग रहे थे पार्टी ने उन्हें 3 नंबर में धकेल दिया। यहां पर वे कांग्रेस प्रत्याशी अश्विन जोशी से 4 हजार के लगभग वोटों से पराजित हुए।

इस हार के बाद फिर शुक्ला परिवार के प्रति चर्चा शुरू हो गई कि यह परिवार का कोई व्यक्ति विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकता। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने क्षेत्र क्रमांक 1 से भाजपा के सुदर्शन गुप्ता के सामने संजय शुक्ला को चुनाव मैदान में उतारा। शुक्ला को हार का सामना करना पड़ा। लगातार बार-बार विधानसभा चुनाव में हो रही हार के चलते विरोधियों और राजनीतिक क्षेत्रों में फिर चर्चा चल पड़ी कि इस परिवार को विधानसभा का चुनाव लडऩा ही नहीं चाहिए क्योंकि विधायक बनना इस परिवार की किस्मत में ही नहीं है।

इधर, शुक्ला परिवार इन सब बातों से बेफिक्र होकर अपने राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व को बढ़ाने में लगा रहा। गत नवंबर माह में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर भाजपा के सुदर्शन गुप्ता के सामने संजय शुक्ला को उतारा। यह वक्त बदलाव का था और शुक्ला ने शानदार चुनाव अभियान के चलते चुनाव जीत लिया। इस जीत के बाद इस परिवार के प्रति लोगों की धारणा बदल गई कि यहां से कोई विधायक नहीं बन सकता। ठीक इसी तरह की धारणा पंकज संघवी और उनके परिवार के प्रति भी लोगों की व राजनीतिक क्षेत्रों में बनी हुई है।

संघवी ने वर्ष 1983 में पार्षद का चुनाव लड़ा था इसी तरह संजय शुक्ला ने भी पार्षद का चुनाव 1983 में लड़ा था। संघवी परिवार के धार्मिक, सामाजिक और व्यवसायिक, शैक्षणिक कार्यों के चलते कांग्रेस ने उन्हें 1998 में लोकसभा चुनाव लड़वाया। इस चुनाव में पंकज संघवी ने भाजपा की सुमित्रा महाजन को कड़ी टक्कर दी और 49,852 वोटों से चुनाव हारे। दिसंबर 2009 में कांग्रेस ने उन्हें महापौर का चुनाव लड़वाया यहां पर भी वे भाजपा के कृष्णमुरारी मोघे से मामूली 4 हजार वोटों से अंतराल से पराजित हुए।

वर्ष 2013 में कांग्रेस ने उन्हें 5 नंबर विधानसभा से चुनाव लड़वाया। इस चुनाव में वे भाजपा के महेन्द्र हार्डिया से 12,500 वोटों से हारे। पंकज संघवी केवल पार्षद का चुनाव ही जीते थे और सांसद, महापौर, विधायक का चुनाव हारने के बाद लोगों ने शुक्ला परिवार की तरह संघवी परिवार की तरह ही धारणा बना ली कि यह परिवार भी विधायक का चुनाव या इससे ऊपर का चुनाव नहीं जीत सकता। अब पार्टी ने फिर संघवी परिवार के कार्यों के चलते उन्हें इन्दौर जैसी हाई-प्रोफाइल संसदीय सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है। अब देखना यह है कि क्या यह परिवार की मिथ्या भी शुक्ला परिवार की तरह टूटेगी? क्योंकि वक्त बदलाव का है? शुक्ला परिवार की जीत में चुनावी कैम्पियन चलाने वाली टीम का जबरदस्त योगदान था। स्वयं नरेन्द्र मोदी भी कैम्पियन टीम की बदौलत ही अच्छे दिन की दिलाशा दे रहे हैं। शुक्ला की कैम्पियन टीम ने पंकज संघवी की जीत के लिए भी भीतर ही भीतर व्यापक अभियान छेड़ दिया है। आठों विधानसभा शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं की मंशा टटोलकर उन्हें कांग्रेस से जोडऩे का अभियान शुरू किया है।

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