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क्या वो गंगाराम ‘मगरमच्छी आंसू’ को भी इज्जत दिला सकेगा?

Posted on: 12 Jan 2019 08:34 by Ravindra Singh Rana
क्या वो गंगाराम ‘मगरमच्छी आंसू’ को भी इज्जत दिला सकेगा?

अजय बोकिल

क्या कोई मगरमच्छ इंसानी तासीर वाला भी हो सकता है? यह सवाल मन में छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बाव मोहरा गांव में एक 130 वर्षीय मगरमच्छ की मौत के बाद खदबदाया। जो जानकारी मीडिया में आई, उससे लगा कि यह ‘दादा’ मगरमच्छ शरीर से भले मगरमच्छ हो, जज्बाती तौर पर इंसानों के ज्यादा करीब था। शायद इसीलिए गांव वालों ने उसका नाम गंगाराम रख था और जब उसने इस फानी दुनिया से विदा ली तो बाकायदा उसका अंतिम संस्कार भी किया। जिस मगरमच्छी आंसुअों के लिए लोग मगरमच्छों को दोष देते हैं, उसी एक मगरमच्छ की मौत पर इंसानों की आंखों में आंसू छलके। यह अपने आप में बेहद अनोखी और मार्मिक घटना है।

गंगाराम की उमर वास्तव में कितनी थी, यह शायद ही किसी को पता होगा, लेकिन गांव वालों का मानना है कि वह पास के तालाब में सौ से ज्यादा सालों से रह रहा था। खास बात यह थी कि वह शाकाहारी था और गुड़ चना और दाल भात भी खा लेता था। स्वभाव से यह मांसाहारी प्राणी कुछ भी खाता हो, लेकिन किसी जानवर या इंसान पर उसने कभी हमला नहीं किया। कभी किसी का गलती से पैर भी पड़ गया तो वह हमला करने के बजाए वहां से हट जाता था। चाहे तो उसे ‘गांधीवादी’ कह लें, लेकिन ग्रामीणों से उसका लगाव ऐसा था ‍कि मानो वह भी उनके परिवार का सदस्य हों। जैसे ही गंगाराम की मौत की खबर फैली, हर कोई तालाब की ओर दौड़ पड़ा। गांव में शोक की लहर पसर गई। वन विभाग के कर्मचारी मृत गंगाराम की लाश ले जाने लगे तो गांव वालों ने विरोध किया। गांव वालों की भावनाअों को देखते हुए वन कर्मियों ने पहले गंगाराम का पोस्ट मार्टम कराया और लाश अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीणों को सौंप दी। ग्रामीणों ने धूमधाम से मगरमच्छ की अंतिम यात्रा निकाली। अब वहां गंगाराम का मंदिर बनाने की बात चल रही है।

मगरमच्छ, घडि़याल या एलीगेटर ऐसे शब्द हैं, जिनमें कपट, क्रूरता और मतलबीपन का भाव कूट कूट कर भरा है। ये शायद अकेले ऐसे उभयचर प्राणी हैं, जिनके आंसुओं को मनुष्य ने अपने चरित्र से भी जोड़ा है। मगरमच्छ बुनियादी तौर पर बेहद चतुर शिकारी और रूपाकार से भी डरावना प्राणी है। इसके थूथन की बनावट ही ऐसी है कि जो एक बार जो उसकी पकड़ में आ गया, उसे भगवान भी मुश्किल से ही बचा पाता है। मगरमच्छ की कई खूबियों में से एक इसकी तेज आंखे, सूंघने की शक्ति और पानी में छुपकर शिकार के करीब आने का इंतजार करना और मौका पाते ही झपट्टा मार कर दबोच लेना है। और तो और यह अपने अस्सी दांत जीवन में 50 बार तक बदल सकता है। मगरमच्छ रात में देख पाते हैं। उनका यह डरावना लेकिन आकर्षक रूप और तेवर ही मनुष्य के कौतुहल का विषय सदियों से रहा है। इसीलिए इसे पुराणों और मिथकों में भी जगह मिली। हमारे यहां वारूणी का वाहन मगरमच्छ ही है तो गंगा और यमुना देवी भी मकर पर सवार होती है। मकर और घडि़याल मगरमच्छ के भाई हैं। इनके इस अनोखे रूप के कारण उन्हें राशियों में भी जगह मिली है।

बावजूद तमाम खूबियों के मगरमच्छ मनुष्य समाज में भी गाय या घोड़े की तरह अपनत्व से नहीं देखे गए। उनकी हर अदा से मनुष्य आशंकित और आतंकित रहा है। यही कारण है कि इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत में कुछ माह पूर्व स्थानीय लोगों ने एक व्यक्ति की मौत का बदला लेने के लिए 300 मगरमच्छ बेरहमी से मार डाले थे। जबकि इंडोनेशिया में मगरमच्छ संरक्षित प्राणी है। हालांकि मगरमच्छ के प्रति ऐसा व्यवहार सब जगह नहीं है। मेक्सिको में गांव और शहर की समृद्धि के लिए मादा मगरमच्छ के साथ शादी रचाने की परंपरा है। पांच साल पहले वहां एक कस्बे के मेयर ने मगरमच्छ के साथ धूमधाम से शादी की ताकि मछुआरों को खूब मछलियां मिलें।
लेकिन किसी मगरमच्छ का शाकाहारी होना वैसा ही है कि कोई नेता पूरी तरह सत्यवादी बन जाए। कहते हैं कि केरल के अनंतपुरा लेक टेंपल में भी बबिया नामक एक शाकाहारी मगरमच्छ रहता है। वह मंदिर के पुजारी के हाथ से गुड़ चावल से बना प्रसाद खाता है। किसी पर हमला नहीं करता। सो उस तालाब की मछलियां बखौफ जिंदगी जीती हैं।

आम तौर पर मगरमच्छ से खौफ खाने वाले मनुष्य के लिए मगरमच्छ या घडि़याल के आंसू कौतुहल और तिरस्कार का ‍विषय है। यह सचमुच अजीब है कि जब मगरमच्छ किसी को भी निर्ममता से अपना शिकार बनाता है तो उसे खाते हुए आंसू क्यों बहाता है? क्या ये खाना मिलने की खुशी के आंसू होते हैं या फिर एक जीवित प्राणी के ग्रास बन जाने के गम में निकलने वाले आंसू होते हैं? क्या मगरमच्छ सचमुच इतने संवेदनशील होते हैं ‍कि जिसे खाएं और उसी के दुख में अश्रु बहाएं? विज्ञान कहता है कि मगरमच्छ के आंसू निकलना एक जैविक प्रक्रिया है। इसका रोने-धोने से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे ही मगर कोई शिकार अपने जबड़े में जकड़ लेता है तो उसकी आंखों से पानी निकलने लगता है। वास्तव में यह अश्रु ग्रंथियों से निकलने वाला द्रव है, जो मगरमच्छ की आंखें और पलकें साफ करने के लिए नैसर्गिक रूप से निकलता है। इसे ही हम ‘घडि़याली आंसू’ कहते हैं। ये घडि़याली आंसू साहित्य से लेकर सियासत तक ऐसे रच बस गए हैं कि खुद घडि़याल भी जानकर चकित होंगे।

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के गंगाराम ने भी कभी मगरमच्छी आंसू बहाए होंगे या पता नहीं, लेकिन उसके चहेतों ने जरूर ऐसा किया। गंगाराम के बारे में जो कुछ बातें सामने आई हैं, उससे लगता है कि मूक प्राणियों के रूप में भी कभी इंसानियत जन्म लेती है। जिस प्राणी का नैसर्गिक स्वभाव कोई बड़ा शिकार खाकर हफ्तों आराम से धूप सेंकना हो, वह महज गुड़ चने पर दिन कैसे काटता होगा? हो सकता है कि गंगाराम बूढ़ा हो जाने से शिकार में इंट्रेस्ट खो चुका हो या फिर गांव वालों की देखा-देखी उसने भी प्राणियों को मारकर खाने का स्वभाव बदल लिया हो। उसने खुद को घास फूस खाने वाले शेर की तरह ढाल लिया हो,यह सोचकर कि मनुष्य समाज के शब्दकोश में काली स्याही से अधोरेखित ‘मगरमच्छी आंसू’ शब्द को कभी तो इज्जतदार जगह मिलेगी।

लेकिन गंगाराम को यह अहसास नहीं होगा‍ कि मनुष्य मगरमच्छ से कहीं ज्यादा चालाक और पाखंडी है। मगरमच्छ तो शिकार करने के बाद ही आंसू बहाता है, लेकिन इंसान ऐसे आंसू कभी भी, कहीं भी और किसी भी स्वार्थ के‍ लिए बहा सकता है। शिकार के बाद ठहाका भी लगा सकता है। मगरमच्छ का कपटीपन तो केवल शिकार तक सीमित रहता है। बाकी जिंदगी वह मस्ती में जीता है। लेकिन उसका यही गुण या दुर्गुण मनुष्य ने अपनी गांठ में बांध लिया है। यहां घडि़याली आंसू आगे बढ़ने, दूसरे की टांग खींचने, सच को झूठ और झूठ को सच करने के काम आते हैं। इसी वजह से मनुष्य, मनुष्य पर भरोसा करना भूल गया है। इतनी बेवफाई तो मगरमच्छ अपने समुदाय से भी नहीं करते। इन सबके बावजूद छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों ने मगरमच्छ गंगाराम के भीतर एक इंसान देखा तो मगरमच्छ की स्थापित छवि को बदलने की भावुक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए और वह भी खुशी के सच्चे आंसुअोंके साथ।

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