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पशु क्रूरता अधिनियम का पालन आखिर क्यों नहीं होता, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

Posted on: 23 May 2018 09:03 by Ravindra Singh Rana
पशु क्रूरता अधिनियम का पालन आखिर क्यों नहीं होता, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

जनसत्ता अखबार से जुड़े मेरे पत्रकार मित्र श्री सुरेंद्र बंसल जी ने यह सवाल उठाया है की।रंगाड़े जिसमें बैलों को जोता जाता है और लगभग दो ढाई टन याने २००० से २५०० किलो लोहा , सीमेंट,अनाज आदि वजन लाद कर भरी और तपती दुपहरी में उन्हें चाबुक से मार मार कर मजबूरन पदाया, भगाया या ढोया जाता है।

ये चार पैर वाले मूक मेहनतकश हैं, जो थक हार कर भी सिर्फ हरे चारे के लिए मार खाते हैं ,माल ढोते हैं और निर्दयी मालिक को कमा कर देते हैं … जीव वह भी हैं ,कभी उन पर विचार करियेगा. सुरेंद्र जी आपकी बात से सहमत होते हुए मैं यही कहना चाहूंगा की हमारे देश में पशु क्रूरता अधिनियम लागू है लेकिन लेकिन उसका कहीं कोई पालन नहीं होता । इस अधिनियम के तहत यह भी तय किया गया है की रँनगाड़े में बैलों को जोतने के बाद कितना वजन उस पर लादा जाएगा।

यही नियम अन्य पशुओं पर भी लागू है लेकिन इसका कहीं कोई पालन नहीं किया जाता पुलिस चाहे तो इस अधिनियम का पालन करा सकती है और पशुओं के कल्याण के लिए कई NGO काम करते हैं लेकिन वह भी सिर्फ ग्रांट लेते हैं सड़क पर उनकी कोई कार्यवाही नहीं दिखती।

पशु कल्याण बोर्ड का गठन हर राज्य में किया जाता है लेकिन यह कल्याण बोर्ड सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने के लिए बनते हैं बेचारे पशुओं को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाता पशुओं के नाम पर सुविधाभोगी लोग अपनी नेतागिरी करते हैं और उन्हें यह पता ही नहीं होता कि सड़कों पर इन पशुओं के साथ क्रूरता की जा रही है। आवश्यकता इस बात की है कि पशु क्रूरता अधिनियम का पालन सख्ती के साथ हो तभी इन पशुओं के प्रति अन्याय हो सकेगा।

अर्जुन राठौर

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