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कांग्रेस को मीसा बंदियों से इतना परहेज क्यों

Posted on: 12 Jan 2019 19:35 by mangleshwar singh
कांग्रेस को मीसा बंदियों से इतना परहेज क्यों

डॉ सुभाष खंडेलवाल

सन् 1975 के आपातकाल को 43 वर्ष हो गए हैं। पेंशन लेने वाला कोई भी 65 वर्ष से कम का नहीं है। अधिकांश तो दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। आजादी की लड़ाई के जेलयात्रियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहते हैं। इन मीसाबंदियों से इतना परहेज क्यों? आपातकाल एक गलती थी, यह तो कांग्रेस भी कबूल कर चुकी है। जिन लोगों को बगैर किसी गुनाह के 19 माह जेल में डाला गया, आंदोलन और जेल यात्राओं से उन्हें और उनके घर परिवार को हुई नुकसानी या तबाही के बदले मिली सम्मान निधी है।

मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने पूर्व की भाजपा सरकार द्वारा मीसाबंदियों को दी जा रही पेंशन पर रोक लगा दी है। कमलनाथ सरकार का यह कदम जनोपयोगी मुद्दों से हटकर एक बेवजह का निरुद्देश्य काम है। यह 2019 मई लोकसभा चुनाव के पहले अच्छे-भले सोये 3000 के करीब पुराने राजनैतिक कार्यकर्ताओं को उनकी सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करने को बाध्य कर रहा है। जबकि कमलनाथ सरकार को मई 2019 की तैयारी के लिए जनता को राहत देने वाले अच्छे ठोस कदम उठाने चाहिए। किसानों की ऋण माफी की घोषणा उनका शुरूआती अच्छा कदम था।

लेकिन मंत्रिमंडल बनाने में हुई फजीहत ने उनकी सरकार की छवि पर प्रश्न उपस्थित किये। वंदे मातरम् पर रोक और फिर बाजे गाजे के साथ पुन: शुरूआत बेवजह की फजीहत बनी। इसके बाद पुलिसकर्मियों को सप्ताह में दी गई एक छुट्टी की घोषणा, किसान की ऋण माफी के बाद उनकी सरकार द्वारा मानवीय संवेदना की दिशा में दूसरा ठोस कदम है। वहीं कन्या विवाह में शिवराज सरकार के 21 हजार के बदले 43 हजार पुन: एक गैर उपयोगी अनुत्पादक कदम है।

शिवराज बार-बार बांटकर भी जनता का भला नहीं करवा सके। वैसे किसानों की ऋण माफी भी उनकी समस्या का हल नहीं है। कमलनाथ सरकार को फालतू के टोटकों को छोड़कर गांव-किसान की असल परेशानी का हल ढूंढना पड़ेगा। कमलनाथ सरकार को शपथ ग्रहण के साथ ही भाजपा के शासन में जिन मंत्री, अधिकारी या अन्य लोगों ने जनता को लूटकर करोड़ों अरबों कमाये हैं। व्यापम में 2000 से अधिक छात्रों आदि को जेल में डाला गया। जबकि असल गुनाहगार बाहर रह गए, उन पर निश्चित समयावधि की जांच बैठाकर दोषियों पर तुरन्त कार्यवाही करना चाहिए थी।

सन् 1975 के आपातकाल को 43 वर्ष हो गए हैं। पेंशन लेने वाला कोई भी 65 वर्ष से कम का नहीं है। अधिकांश तो दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। आजादी की लड़ाई के जेलयात्रियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहते हैं। इन मीसाबंदियों से इतना परहेज क्यों? आपातकाल एक गलती थी, यह तो कांग्रेस भी कबूल कर चुकी है। जिन लोगों को बगैर किसी गुनाह के 19 माह जेल में डाला गया, आंदोलन और जेल यात्राओं से उन्हें और उनके घर परिवार को हुई नुकसानी या तबाही के बदले मिली सम्मान निधी है।

आज आपातकाल के मीसाबंदियों का मजाक उड़ाया जा रहा है। बीते हुए कल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भी पेंशन लेने पर इसी तरह मजाक उड़ाया जाता था। लोग आजादी की लड़ाई और आपातकाल की लड़ाई में भी फर्क करते हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि आजादी की लड़ाई विदेशी गौरों से थी, उनके खिलाफ पूरा मुल्क एक था। जबकि आपातकाल की लड़ाई मुल्क के ही काले अंग्रेजों से थी। जिनसे लड़ना कठिन था। एक बात और भी ध्यान रखना चाहिए कि राजनीति में जो मंत्री विधायक बन जाते हैं, वे तो मंदिर के कलश बन जाते हैं, लेकिन उनके नीचे ना मालूम कितने कार्यकर्ता, नेता नींव के पत्थर बन दफन हो जाते हैं।

जिन कमलनाथ ने मीसाबंदी पेंशन पर रोक लगाई है, वे भूल रहे हैं कि देश में बहस तो सांसद, विधायक, पार्षद की पेंशन बंद होने पर की जाना चाहिए। इसमें भी मेरा तर्वâ यह रहेगा कि ये लोग एक पेंशन ले सकते हैं, जबकि ये पार्षद, विधायक और सांसद यदि तीनों बन जाते हैं, तो तीनों तरह की पेंशन लेते हैं। यदि औसत निकाला जाए, तो इन बनने वालों की बनने के बाद इतनी सेहत तो बन ही जाती है कि ये खुद के लिए तो ठीक, दूसरों को भी पेंशन बांट सकते हैं।

आजादी की लड़ाई में सन् 1942 में सर्वाधिक एक लाख लोग जेल गए थे। जबकि देश 36 करोड़ का था। इसलिए अंग्रेजों ने 200 वर्ष राज किया। आपातकाल में तो देश 50 करोड़ का था और बंद 50 हजार भी नहीं हुए थे। आजादी के बाद और आपातकाल के बाद इन बंद होने वालों की कोई पूछ परख या खबर नहीं ली गई। इनकी कीमत पर जो बन गए, वे जिन्दगी भर खुद ही बनते रहे। इंदौर जेल में करीब 500 मीसाबंदी थे। इनमें से मध्यप्रदेश के तीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, कैलाश जोशी और सुन्दरलाल पटवा यहीं बंद थे। 28 विधायक और 12 सांसद भी बने।

बाकी का क्या हुआ, इसकी कोई खबर नहीं। इसलिए देश में धीरे-धीरे राजनैतिक आंदोलन और सत्याग्रह बंद हो गए। लड़ने और मरने वालों को जीते जी अपमान और मरने के बाद सम्मान हमारे देश की परम्परा है। इसलिए हजारों साल की गुलामी ने हमारे चेतन अचेतन में ये संस्कार डाल दिए हैं कि लड़ने वाले का मजाक बनाओ। मीसाबंदी पेंशन पुराने संघर्षशील लड़ाकों की सम्मान निधी है। साथ ही कहा जा रहा है कि मीसाबंदी पेंशन असामाजिक तत्वों को भी दी गई है। उसे बंद करना चाहिए।

सवाल उठता है कि क्या संविधान में ऐसी व्यवस्था है कि बगैर सजा के सिर्फ फौजदारी प्रकरण दर्ज होने पर किसी को भी अपराधी घोषित कर दिया जावे। मीसाबंदी पेंशन जिन राजनीतिक लोगों को दी गई है, उन सब पर फौजदारी के प्रकरण चलते रहे हैं। कारण कि राजनीतिज्ञ आंदोलन करते हैं तब आंदोलन के हिंसक होने पर या तोड़-फोड़ होने पर उन पर प्रकरण आपराधिक ही दर्ज होते हैं। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने अपनी सुविधानुसार अपराधी और गैर अपराधी तय कर दिए है।

हकीकत में बहुत से लोग जो अपराधी थे, उन्हें पेंशन दी गई। मैं उनको देने का विरोध नहीं कर रहा हूं, वरन् यह कह रहा हूं कि वो भी सबको मिलना चाहिए थी। क्योंकि उन्हें 19 माह बगैर कसूर के जेल में रखा गया था। जिन्होंने बंद रखा था, उन्होंने कल भी सत्ता भोगी और आज भी भोग रहे हैं। मीसाबंदी पेंशन की शुरुआत शिवराज सरकार ने ठीक की थी। उसके कुछ निश्चित नियम थे, बाद में उसमें नए-नए प्रलोभन डाल दिए गए। जो लोग जेल नहीं गए, उन्हें एक दिन की जेल के आधार पर शपथ पत्र बनवाने पर पेंशन दी जाने लगी।

यह गलत बटोत्री उन मीसाबंदियों को, जिन्हें बेवजह १९ माह जेल में बंद रखा गया, नुकसान पहुंचा रही है। अत: कमलनाथ सरकार को इसकी समीक्षा कर उचित-अनुचित में फर्क कर जल्द से जल्द पेंशन शुरू करना चाहिए।

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