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कौन बदलेगा? आयोग की नी‍ति या मंच की स्वदेशी की परिभाषा, अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 02 Jun 2018 10:22 by Ravindra Singh Rana
कौन बदलेगा? आयोग की नी‍ति या मंच की स्वदेशी की परिभाषा, अजय बोकिल की टिप्पणी

मोदी सरकार द्वारा गठित नीति आयोग ने हाल में आरएसएस के अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच को अपनी स्वदेशी की परिभाषा पर पु‍नर्विचार का नेक सुझाव दिया है। आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ राजीव कुमार ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में मंच से कहा कि वह स्वदेशी अर्थव्यवस्था को दो महत्वपूर्ण नजरिए से देखे। एक तो देश में नौकरियों के ज्यादा अवसर पैदा करना और दूसरे ऊंची ग्रोथ दर हासिल करना।

डाॅ कुमार का मानना है कि ऊंची वृद्धि दर ही देश में रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा करेगी। फिर चाहे ये नौकरियां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से आएं या देशी कं‍पनियों के निवेश से आएं। मतलब महत्व साध्य का है, साधन का नहीं। डाॅ. कुमार ने यह बात हाल में हुई वालमार्ट और फ्लिडपकार्ट डील का समर्थन करते हुए कही। स्वदेशी जागरण मंच इस ऐतिहासिक डील का विरोध इस आधार पर कर रहा है कि इससे आगे चलकर इससे छोटे दुकानदारों को नुकसान होगा। सरकार इस डील को रोके। क्योंकि मंच का मानना है कि बाजार को बेचा नहीं जा सकता।

उल्लेखनीय है कि भारत की सबसे बड़ी ई काॅमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट पिछले महीने विश्व की महाकाय रिटेल कंपनी वालमार्ट के हाथों 16 अरब डाॅलर ( 1 लाख करोड़ रू.) में बिक गई। तभी से यह अंदेशा जताया जा रहा है कि वालमार्ट के रूप में भारतीय खुदरा बाजार पर भी विदेशी कंपनियों का कब्जा होना शुरू हो गया है। ठीक उसी तरह कि जैसे कभी ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार करते-करते पूरे भारत पर अपना राजनीतिक आधिपत्य स्थापित कर लिया था। तब इस चाल को भारतीय ठीक से समझ ही नहीं पाए थे और देश देखते-देखते गुलाम बन गया था। हालांकि 21 वीं सदी में वैश्विक परिदृश्य बदला है, लेकिन वो खतरे खत्म नहीं हुए हैं, जिनकी वजह से देश को राजनीतिक-आर्थिक रूप से गुलाम होना पड़ा था।

स्वदेशी जागरण मंच की ‘स्वदेशी’ की परिभाषा में आत्मनिर्भर भारत के अलावा ‘विदेशी वस्तुअों के बहिष्कार के अलावा छोटे बाजारों और छोटे कारोबारियों के हितों का संरक्षण शामिल है। मंच की स्थापना दरअसल आर्थिक उदारवाद के नकारात्मक परिणामों के विरोध के लिए हुई थी। मंच वालमार्ट-फ्लिेपकार्ट डील को गैरकानूनी, अनैतिक और देशहित के खिलाफ मानता है। उसने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इस डील में हस्तक्षेप करने की मांग की है। मंच के सहसंयोजक अश्विनी महाजन का कहना है कि इससे टैक्स चोरी भी होगी। क्योंकि डील सिंगापुर में हुई और घोषणा बेंगलुरू में हुई। यह पिछले दरवाजे से वालमार्ट जैसी कंपनियों की भारत में एंट्री है। महाजन कहते हैं कि किसी भी देश का मार्केट वहां के स्थानीय लोगों के हाथ में होना चाहिए। वालमार्ट चीन से माल यहां लाकर बेचेगा तब ‘मेक इन इंडिया’ का क्या होगा? मल्टी ब्रांड रिटेल में भी विदेशी निवेश को मोदी सरकार की मंजूरी भारतीय उद्दयोगों को मारेगी और यहां नौकरियों को खत्म करेगी।

बात काफी हद तक सही है लेकिन मंच के इस विरोध का व्यावहारिक महत्व क्या है? क्या यह केवल खानापूर्ति है अथवा वह सरकार की नीतियों को बदलवाने में सक्षम है? यह सवाल इसलिए कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष ‍वालमार्ट-फ्लिपकार्ट डील को न केवल उचित ठहरा रहे हैं बल्कि मंच को ही अपनी स्वदेशी की परिभाषा पर पुनर्विचार की सलाह दे रहे हैं? दोनो में से कौन सही है? दोनो में से कौन सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है? डाॅ. राजीव कुमार की नजर में आर्थिक ग्रोथ ही सर्वोपरि है फिर चाहे वह किसी रास्ते से आए। यानी देशी लोगों को नौकरी मिलना ही स्वदेशी का अंतिम लक्ष्य है। यह बात दूसरी है कि जमीनी स्तर पर नई नौकरियां मिलना तो दूर उल्टे युवाअों और छोटे कारोबारियों को मिले हुए रोजगार भी गंवाने की स्थिति है। जहां तक मंच द्वारा डील रोकने की मांग है तो यह केवल रस्मी लगती है, क्योंकि डील तो पहले ही हो चुकी है।

अब सवाल भारतीय बाजारों और छोटे कारोबारियों को बचाने की बात है तो पूरा परिदृश्य चिंता से भरा है। वालमार्ट के आने से दस नए लोगों को रोजगार भले मिले, लेकिन वह सौ लोगों का काम छीन लेगी। बड़ी रिटेल चेन से छोटे कारोबारी वैसे ही हाशिए पर जा रहे हैं और जब पूरे रिटेल मार्केट पर वालमार्ट जैसी एक दो कंपनियों का कब्जा हो जाएगा तो बेचारे परचूनियों के पास मजदूरी या आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। छोटे कारोबारियों के धंधे बंद हो रहे हैं। डाॅ. कुमार चीन का उदाहरण देते हैं कि उसने विदेशी निवेश के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को सहेजे रखा तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? इसका जवाब यही है ‍कि चीन की तमाम घुड़कियों और नीचा दिखाने की हरकतों के बावजूद हम आज तक चीनी माल को लेकर उसे हड़का तक न सके, बहिष्कार तो दूर की बात है। ऐसे में आम भारतीय किसे सही माने ? आंखन देखी पर या आपबीती पर ? नीति आयोग को वालमार्ट डील को छोटे दुकानदारों के लिए बेहतर अवसर के रूप में देखता है।

कैसे, यह समझना मुश्किल है। दरअसल यह नीति आयोग और स्वदेशी जागरण मंच के बीच सीधे टकराव का मामला है। लेकिन इसकी परिणति किसी सकारात्मक पहल में होगी, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। कारण इस सरकार ने जितने भी जुमले छोड़े हैं, उसका ठीक-ठीक रोड मैप और मंशा क्या है, यह नीति आयोग तो क्या और भी किसी को शायद ही मालूम है। जो भी है, वह ज्यादातर विरोधाभासों और विसंगतियों से भरा है। उसकी सुविधानुसार कुछ भी व्याख्या की जा सकती है। मंच वालमार्ट डील का विरोध इस आधार पर कर रहा है कि यह देशहित के विरूद्ध है। लेकिन ऐसा न हो, इसका भी कोई प्रभावी तरीका उसके पास नहीं है। ऐसे में यह विरोध प्रतीकात्मक ज्यादा है। वैसे भी ग्लोबल होने की आंकाक्षा और ग्लोबलाइजेशन का ‍विरोध साथ-साथ नहीं चल सकते। अब देखना यह है कि क्या मंच अपनी स्वदेशी की परिभाषा को ‘दुरूस्त’ करता है या फिर नीति आयोग अपनी ‘नीति’ बदलता है?

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