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सरकार बच्चों को कब रंगीन सपनों के बोझ और अवसाद से मुक्त करेगी?सतीश जोशी की कलम से….

Posted on: 06 Jun 2018 08:42 by krishnpal rathore
सरकार बच्चों को कब रंगीन सपनों के बोझ और अवसाद से मुक्त करेगी?सतीश जोशी की कलम से….

हमारी शिक्षा पद्धति के बारे में नए सिरे से सोचने की जरुरत है। मेकाले की इस शिक्षा ने महज कुछ प्रतिशत बच्चों के लिए राजयोग और अधिकांश बच्चों का सुख चैन छीन लिया है। बोर्ड परीक्षाओं में उच्च अंकों के जाल ने उनसे उनका यौवन छीन लिया है। माता-पिता ने अपने बड़े-बड़े सपनों के बोझ तले उनको डिप्रेशन में डाल रखा है। हर साल डिप्रेशन का यह भूत देश के हर घर में मई-जून में दस्तक देता है। कुछ प्रतिशत मेधावी बच्चे समृद्ध देशों को और समृद्ध बनाने चले जाते हैं और अधिकांश बच्चे देश के महानगरों में सुबह से देर रात तक कारकूनी करने को मजबूर हैं।

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   यह शिक्षा पद्धति आखिर देश में एेसी फौज खड़ी कर रही है, जो अमीर को और अमीर, गरीब को और गरीब ही बना रही है। पड़ोसी देश नेपाल हमारे जैसे देश के लिए मजदूर, चौकीदार की फौज खड़ी कर रहा है तो हम बड़े पूंजीपतियों के लिए ब्रेन उत्पादन में लगे हैं। किसी को बेहतरीन साफ्टवेयर डेवलपर चाहिए तो किसी को बेस्ट ब्रेन चाहिए, किसी को इंजीनियर तो किसी को वैघ्यानिक । हमारे शिक्षा कारखाने धड़ल्ले से उत्पाद कर रहे हैं और पूंजी की मंडी में वे अपने माता-पिता के सुख चैन की कीमत पर नीलाम हो रहे हैं।

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मानसिक रुप से रुग्ण व्यवस्था, माता-पिता को भी रंगीन सपनों के दलदल में एक तरह की बीमारी से ग्रस्त कर रहे हैं। बचपन के कोमल मन पर माता-पिता बच्चों के अंकुरित होते ही सपनों की फसल बोने लगते हैं। नए नए सपने गढ़ते माता-पिता उस दिन धड़ाम से नीचे गिरते हैं  जब कोई मई-जून अधिकांश बच्चों की सही प्रतिभा के दर्शन करा देता है। डिप्रेशन से ग्रस्त बच्चा छोटे शहर से निकलकर बड़े शहर की एक कोठरी में रहकर अवसाद की नौकरी करने को मजबूर होता है। हमारे कई बच्चे विदेश में नौकरी पा जाते हैं, वे भी उस देश के सपनों के लिए अपनी बुद्धि का सौदा करते हैं, कठिन परिश्रम, घर का सुख, माता-पिता का सान्निध्य इन सबकी कीमत पर पूरा यौवन उनको देने के लिए मजबूर हैं।

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हम बच्चों के कोमल मन पर अपने सपनों का बोझ लादना कब बंद करेंगे? इस बोझ तले शिक्षा प्राप्त करते बच्चा पीढ़ि दर पीढ़ि इस बोझ को उत्तराधिकार में देने के अलावा कुछ नहीं कर रहा। दरअसल टाप करने वाला बच्चा, खुशी मनाने वाले माता-पिता और मिठाई बांटने, खाते मुस्कराते कुछ  चेहरे हजारों हजार आम बौद्धिक बच्चों को अवसाद बांटने की ही कसरत कर रहे हैं। हमारे शिक्षा शास्त्री, शिक्षा विद्, शिक्षा नीति बनाने वाले नीति नियंता, राज्य एवं देश की सरकारें कब सोचेगी, विचारेगी, कब देश को रंगीन सपनों के बोझ और अवसाद से मुक्त करेगी?

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