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100 वर्ष एक शताब्दी 3 जून 1918 को जब महात्मा गांधी इंदौर आए थे

Posted on: 04 Jun 2018 03:17 by Ravindra Singh Rana
100 वर्ष एक शताब्दी 3 जून 1918 को जब महात्मा गांधी इंदौर आए थे

इंदौर: तब उन्होंने नेहरू पार्क में सभा को संबोधित किया था। उस महत्व को कायम रखते हुए यहां एक स्मारक बनाया गया है। इसके अलावा लाइब्रेरी के रूप में बापू की कुटिया भी बनाई गई है। यहां रोजाना कई लोग पत्र, पत्रिकाएं पढ़ने आते हैं। हालांकि बारिश में इस कुटिया की छत से पानी टपकता है। इस वजह से अब इसके पिछले हिस्से में बापू की नई कुटिया तैयार कर इसे शिफ्ट करने की योजना बनाई गई है।

दुर्दशा हो गई है बापू के इस स्मारक की।
शहर को स्मार्ट बनाने के लिए कंपनी बना दी गई है, लेकिन ये कवायद कैसे पूरी होगी। कंपनी के कार्यालय के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ज्ञान की अमूल्य धरोहर व करोड़ों रुपए की किताबें सीमेंट के हवाले कर दी गई हैं।

इंदौर. शहर को स्मार्ट बनाने के लिए कंपनी बना दी गई है, लेकिन ये कवायद कैसे पूरी होगी। कंपनी के कार्यालय के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ज्ञान की अमूल्य धरोहर व करोड़ों रुपए की किताबें सीमेंट के हवाले कर दी गई हैं।

पढऩे-लिखने के शौकीन इंदौरवासियों के शहर के बीच नेहरू पार्क में नगर निगम ने लाइब्रेरी ‘बापू की कुटिया’ बनाई थी। राष्ट्रपिता के अमूल्य ज्ञान से ओतप्रोत किताबों के साथ करोड़ों रुपए की अनूठी कृतियां हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व बने लाइब्रेरी भवन में अब निगम स्मार्ट सिटी कंपनी का दफ्तर बना रहा है। इसके चलते लाइब्रेरी को भवन के एक हिस्से में समेट दिया गया है, जहां किताबें सीमेंट के बीच धूल खा रही हैं।

मुख्य द्वार किया बंद
लाइब्रेरी के मुख्य द्वार को बंद कर कोने से रास्ता बनाया है। जिस जगह लाइब्रेरी को शिफ्ट किया है उसके ऊपर निर्माण किया जा रहा है। निर्माणस्थल तक जाने का रास्ता भी लाइब्रेरी से ही निकाला जा रहा है, जिसके कारण दिनभर मजदूर यहां से सीमेंट, गिट्टी, रेत, ईंटें लेकर निकलते हैं। लाइब्रेरी में कई किताबें खुले में रखी हुई है या उनकी रैक टूटी है। किताबों पर धूल और सीमेंट जम रही है।

पढ़कर बने पार्षद
लाइब्रेरी में रखी किताबें कई गरीब पढऩे-लिखने के शौकीनों के साथ ही विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन का साधन हैं। राजनीतिक शास्त्र सहित कई विषयों की किताबों का बड़ा संग्रह होने से न सिर्फ कॉलेज के छात्र बल्कि स्कूली छात्रों के लिए यह लाइब्रेरी बड़ा केंद्र है। यहां की किताबों को पढ़ते हुए ही यहां नौकरी करने वाले पार्षद रत्नेश बागड़ी ने राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया था। इस लाइब्रेरी के कई वरिष्ठ अभिभाषक, पूर्व जज और वरिष्ठ नगारिक नियमित पाठक थे।

खर्च हुए लाखों
यहां मौजूद कई पुरानी और बेशकीमती किताबों को संरक्षित करने के लिए नगर निगम ने आठ महीने पहले किताबों के जिल्दीकरण शुरू किया था। इस दौरान लगभग 20 लाख रुपए खर्च किए गए थे।

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