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एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे यौन कुंठिता का स्यापा

Posted on: 03 Feb 2019 11:31 by Ravindra Singh Rana
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे यौन कुंठिता का स्यापा

विनोद नागर

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारतीय समाज साल दर साल आधुनिकता की सीढियाँ भी चढ़ रहा है. बदलते जीवन मूल्यों ने इस विशाल भारत में अलग अलग पीढ़ियों के कई नये भारत गढ़ दिए हैं. हेयर कट, वस्त्र विन्यास, खान-पान, शिक्षा, रोजगार से लेकर संचार साधनों से सु-समृद्ध आज का युवा भारत मनोज कुमार के भारत से बिलकुल अलग है. पूरब और पश्चिम का द्वन्द भले ही हाशिये पर चला गया हो लेकिन रोटी, कपड़ा और मकान के साथ महंगाई और बेरोजगारी का संघर्ष जारी है.

पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के पीछे भागती हमारी युवा पीढ़ी उत्तर आधुनिक होने पर आमादा है. महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक सामाजिक वर्जनाएं टूट रहीं हैं. भौतिक प्रगति और स्वच्छंद जीवन शैली के चलते भारतीय समाज भी डेटिंग, लिव इन, रिलेशनशिप, गे, लेस्बियन सरीखे शब्दों से जुड़ी मानसिकता को समझने और स्वीकारने की चुनौतियों से जूझ रहा है.

हमारे देश में फिल्में आम तौर पर मनोरंजन के उद्देश्य से बनाई जाती हैं. लेकिन बौद्धिकता की आड़ में प्रबुद्ध फिल्मकार कई मर्तबा ऐसे विषयों पर हाथ आजमाते हैं जो प्रायः सामाजिक जीवन में वर्जनात्मक रहे हैं. समलैंगिकता भी एक ऐसा ही मुद्दा है, जिसे भले ही वैश्विक / विधाई मान्यता हासिल हो गयी हो पर समाज में सहज स्वीकार्यता से यह अभी कोसों दूर है. यौनिक कुंठा के इस फितूर पर हमारे यहाँ ‘फायर’ और ‘अलीगढ़’ जैसी गंभीर व ‘रफूचक्कर व ‘दोस्ताना’ जैसी हल्की फुल्की फिल्में पहले बन चुकी हैं. इस शुक्रवार प्रदर्शित ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ इसी कड़ी का भावनात्मक विस्तार है.

निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने 1994 में अनिल कपूर और मनीषा कोइराला को लेकर 1942: ए लव स्टोरी बनाई थी. इस फिल्म का कुमार शानू का गाया गीत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ बेहद लोकप्रिय हुआ था. गीतकार जावेद अख्तर ने इस गीत में अपनी कलम के जादू से अद्भुत छटा बिखेरी थी. गर्दिश में घिरे संगीतकार आरडी बर्मन तो इस फिल्म के संगीत की अभूतपूर्व लोकप्रियता का साक्षी बनने से पहले ही परलोक सिधार गए थे.

करीब 25 साल बाद विधु विनोद चोपड़ा की अमेरिका निवासी बहन शैली ने जब उन्हें फिल्म के लिये कहानी सुझाई तो विधु ने न केवल बहन को निर्देशन का दायित्व सौंपा बल्कि फिल्म का टाइटल भी अपनी ही फिल्म के गीत के मुखड़े को चुना. अब यदि दर्शक ढाई दशक बाद विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म में पुनः अनिल कपूर और उनकी सुपुत्री सोनम को रुपहले परदे पर बाप-बेटी की भूमिकाओं में देखने के इरादे से जाएँ तो अवश्य हर्षित होंगे. दरअसल ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फिल्म आज के समय के बजाय आने वाले दौर की फिल्म है.

फिल्म की कहानी पंजाब के मोगा में रहनेवाले रईस गारमेंट व्यवसायी बलबीर चौधरी (अनिल कपूर) के घर से शुरू होती है जो अपनी लाड़ली बेटी स्वीटी (सोनम कपूर आहूजा) के लिये उपयुक्त जीवन साथी की तलाश में है. सरसरी तौर पर स्वीटी साधारण युवतियों की तरह बर्ताव करती नज़र आती है. पर असल में उसके समलैंगिक होने का राज सिर्फ भाई वरुण ही जानता है, जो घर की मान मर्यादा की खातिर चुप रहता है. स्वीटी की मुलाकात नाटकीय ढंग से लेखक निर्देशक साहिल मिर्ज़ा (राज कुमार राव) से होती है. टेलेंट हंट पर चतरो (जूही चावला) के साथ मोगा पहुँचने पर बलबीर का परिवार यह समझता है कि स्वीटी मुस्लिम धर्मावलम्बी साहिल से शादी करना चाहती है.

मगर जब यह राज़ खुलता है कि स्वीटी वास्तव में अपनी बचपन की सहेली कुहू (रेजिना कैसेन्द्रा) से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है तो घर में बवाल मच जाता है. आगे की कहानी इसी कड़वे सच को परिवार एवं समाज द्वारा स्वीकारने की भावनात्मक जद्दोजहद से जुड़ी है.

निस्स्संदेह फिल्म में अनिल कपूर और सोनम ने पूरे मनोयोग से अपनी भूमिकाएँ निभाई हैं. लेकिन कई दृश्यों में अनिल फन्ने खां की तरह थके थके से नज़र आते हैं. सोनम अपने पूरे फार्म में है लेकिन राजकुमार राव की सहज अभिनय शैली साहिल मिर्ज़ा के किरदार को जीवंत बनाने में आड़े आती है. फन्ने खां वाली गलती उन्होंने यहाँ भी दोहराई है. भूमिकाओं के चयन में उन्हें इस तरह की गलतियों से बचना चाहिए. फिल्म में सबसे ज्यादा निराश करती हैं जूही चावला जो शायद लम्बे अरसे में मेथड एक्टिंग के गुर भी भूल चुकी हैं. सहायक भूमिकाओं में कंवलजीत, ब्रिजेन्द्र काला, सीमा पाहवा आदि भी दोहराव के शिकार हैं.

फिल्म की कथा पटकथा और शैली चोपड़ा धर का निर्देशन अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ता. यही हाल गीत संगीत का भी है. सिनेमाटोग्राफी, सम्पादन समेत अन्य तकनीकी पक्ष साधारण हैं. पंजाब का कैनवास हिन्दी फिल्मों में इतना अधिक दोहराया जा चुका है कि अब दर्शक इससे ऊबने लगे हैं. काश कि विधु विनोद चोपड़ा जैसे काबिल निर्माता निर्देशक इससे कुछ सबक लेकर अपनी नवाचारी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाएं.
फिल्म के कुछेक संवाद रोचक लगते हैं – शादी के लिये मुंडा क्या आसमान से टपकेगा..

वैसे मैं ज्यादा रोमांटिक टाइप का बाँदा हूँ नहीं पर जबसे इस लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. अंकल इतनी उर्दू तो मुझे भी नहीं आती.. डैडी आपको क्या लगता है इसका चक्कर उस लड़के के साथ में है.. आप मेरे नाल पार्टनरशिप करोगी प्रोफेशनल या पर्सनल.. हमारे यहाँ मर्द किचन में सिर्फ गैस सिलेंडर बदलने के लिये कदम रखता है.. उस दिन मैंने अपने आप से कह दिया कि मुझे हमेशा अपना सर छुपाना पड़ेगा.. तेरसे ये उम्मीद नहीं थी पर मेरी उम्मीद पर खरे तो आप भी नहीं उतरे डैडी.. तुम पहले बन्दे हो जिसे मैंने अपना सच बताया है.. ट्रू लव के रास्ते में कोई न कोई स्यापा होता ही होता है अगर ना हो तो लव स्टोरी में फील कैसे आएगी..

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।
फेसबुक वॉल से साभार।

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