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ऐ मां तेरी ‘सीट’ से अलग लोकसभा की सीट क्या होगी? | What will be the seat of the Lok Sabha different from your mother’s seat?

Posted on: 01 Apr 2019 16:19 by shivani Rathore
ऐ मां तेरी ‘सीट’ से अलग लोकसभा की सीट क्या होगी? | What will be the seat of the Lok Sabha different from your mother’s seat?

मां-बेटे का रिश्ता शब्दों की सीमा में बांधना कदाचित संभव नहीं। किसी गीत की पंक्ति है ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी…। मां-बेटे राजनीति के मैदान में हो तो सूरत की जगह सीट शब्द रखना ज्यादा मुनासिब होगा। ऐसी अनेक मिसालें भारतीय लोकतंत्रर में उपलब्ध हैं जब मां ने बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए अपनी जीतने के लिहाज से सुरक्षित सीट तक छोड़ दी हो। ताकि बेटे का कैरियर प्रभावित न हो। ताजा मामला मेनका गांधी और उनके पुत्र वरुण गांधी का है। वैसे तो ये उसी गांधी खानदान से हैं, जिसके वंशवाद को कोसने में भाजपा कभी पीछे नहीं हटती, लेकिन यदि यह सबकुछ भाजपा में हो तो क्षम्य है। बीते दिनों जब उत्तर प्रदेश के लोकसभा टिकट बंट रहे थे तो भाजपा नेन दिग्गज नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी को भी घर बैठा दिया, लेकिन दोनों गांधियों के साथ ऐसा नहीं कर पाए।

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हालांकि मेनका केंद्रीय मंत्री रहते भी राजनीति की मुख्यधारा से लगभग दूर ही है। बतौर भाजपा नेता न उनकी पूछपरख है न बेटे वरुण की। पार्टी ने इसी बेरूखी का सबूत दिया टिकट वितरण में। पार्टी ने वरुण को पीलीभीत और मेनका को सुलतानपुर से टिकट दिया था। जो उनके ही आग्रह पर अदला-बदली किया गया। दरअसल सुलतानपुर सीट पर संजय गांधी के चाहने वाले आज भी है। संजय गांधी ने पहला चुनाव अमेठी से लड़ा था जो सुलतानपुर जिले का हिस्सा थी। इस बार सुलतानपुर से कांग्रेस ने डॉ. संजय सिंह को खड़ा किया है।

वैसे इस सीट से उनकी पत्नी अमिता तीन बार हार चुकी है, लेकिन संजय सिंह का बतौर राज परिवारर भी यहां कुछ वर्चस्व रहा है। ऐसे में उन्हें भारी उम्मीदवार माना जा रहा है। फिर भी मेनका चाहती थी कि वरुण अपना दूसरा चुनाव वहीं से लड़ें। उनके सुल्तानपुर से लड़ने पर संजय गांधी के जमाने के समर्थक भी सक्रिय हो जाएंगे। वैसे भी पिछला चुनाव वरुण ने चार लाख से भी ज्यादा मतों से जीता था।

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वहां वे लगातारर सक्रिय भी रहे। जाहिर है उस सीट से चुनाव लड़ना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान रहेगा। उधर, मेनका ने पुत्र मोह में एक कठिन चुनौती का सामना करना तय कर ही लिया है। वे बीते चुनाव में मोदी लहर के बाद भी महज आठ हजार मतों से जीते थी। वैसे इससे पहले उन्होंने आधा दर्जन लोकसभा के चुनाव(lok sabha election) डेढ़ से ढाई लाख मतों के अंतर से जीते हैं। मां का बलिदान चुनावी मैदान में कितना काम आता है, इसका फैसला मतदाता ही करेंगे।

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