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क्या कामयाब होगी जबरन चुनाव जीतने की कोशिश? | Lok Sabha Election 2019 fighting for ‘Victory’

Posted on: 24 Apr 2019 14:11 by rubi panchal
क्या कामयाब होगी जबरन चुनाव जीतने की कोशिश? | Lok Sabha Election 2019 fighting for ‘Victory’

लोकसभा चुनाव में मतदान का तीसरा चरण संपन्न हो गया। इसके साथ ही 302 सीटों पर उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में सील हो चुकी है। अब तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि कौन जीतेगा। विपक्ष बिखरा हुआ है। राज्यों में अलग-अलग गठबंधन हैं। भाजपा का प्रचार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भरोसे है और कांग्रेस राहुल गांधी के भरोसे चुनाव लड़ रही है।

राजस्थान में अवश्य अशोक गहलोत कांग्रेस को जिताने में लगे हुए हैं। वे राहुल गांधी के बाद कांग्रेस के दूसरे सबसे बड़े नेता माने जा सकते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस के लिए अशोक गहलोत की तरह सक्रियता से प्रचार नहीं कर पा रहे हैं। बाकी राज्यों में कांग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ जनता में फैले असंतोष के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास कर रही है, जबकि भाजपा के खिलाफ अन्य क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी भरोसे चुनाव लड़ रही हैं।

भाजपा के पास पहली बार नेताओं की बेहद कमी महसूस की जा रही है। मोदी और शाह ही बड़े नेता हैं। राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी को छोड़ दिया जाए तो बाकी भाजपा नेता मोदी और शाह के मोहरों की भूमिका में ही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को सरकार चलाने का शानदार मौका मिला था। वह हमेशा के लिए अपनी स्थिति मजबूत कर सकती थी, लेकिन मोदी सरकार ने जो लाइन पकड़ी, उससे भाजपा का बेड़ा गर्क होने की स्थिति बन गई। मोदी तरह-तरह के भाषण दे रहे हैं और लोगों को यह समझाते हुए थक गए हैं कि उनकी सरकार ने अच्छा काम किया, लेकिन ज्यादातर लोग मानने को तैयार नहीं हैं। भाजपा को इसका आभास है।

इस चुनाव में भाजपा के पास कई सीटों पर उम्मीदवारों की कमी पड़ गई है। वह इधर-उधर से उम्मीदवारों का जुगाड़ करके चुनाव लड़ रही है। दिल्ली में क्रिकेटर गौतम गंभीर को उम्मीदवार बना दिया। उप्र में गोरखपुर से फिल्म स्टार रवि किशन भाजपा के प्रत्याशी हैं। रामपुर में अमर सिंह के साथ सपा छोड़कर भाजपा में आई अभिनेत्री जया प्रदा भाजपा उम्मीदवार हैं। मथुरा से पिछले चुनाव में हेमा मालिनी ने भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था और इस बार फिर से उम्मीदवार हैं। पंजाब की गुरदासपुर सीट पर सनी देओल को टिकट देने की बात चल रही है, जो मंगलवार दोपहर विधिवत भाजपा में शामिल हो गए हैं। मप्र की भोपाल सीट पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के सामने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को ताबड़तोड़ पार्टी में शामिल कर उम्मीदवार बनाया गया है, जो मालेगांव बम धमाकों की आरोपी हैं। उनके खिलाफ अदालत में मामला लंबित है।

पिछले चुनावों में भी जिताऊ उम्मीदवारों का जुगाड़ करते हुए भाजपा यह तरीका अपनाती रही है, लेकिन तब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसे बड़े नेता हुआ करते थे और भाजपा सही मायने में एक राजनीतिक पार्टी मानी जाती थी। इस बार भाजपा का स्वरूप काफी बदला हुआ है। मोदी और शाह से वाजपेयी और आडवाणी की तुलना नहीं हो सकती। इन दोनों नेताओं ने खुद को येन केन प्रकारेण भाजपा के शीर्ष पर स्थापित कर लिया है, जिससे भाजपा के भीतर ही उसके खिलाफ असंतोष की लहर बनी हुई है। अब ये दोनों नेता पूरे देश के कर्णधार होने का दावा कर रहे हैं।

मोदी और शाह ने भाजपा के बाकी बड़े नेताओं को निबटाने की जो रणनीति अपनाई है, उसका उलटा असर होने की संभावना दिखने लगी है। पहले भाजपा एक टीम के रूप में काम करती थी। इस बार भाजपा मोदी और शाह के आदेशों पर चलने वालों का समूह ज्यादा दिख रही है। मप्र में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे नेता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद पहले जैसा उत्साहपूर्वक प्रचार नहीं कर रहे हैं, क्योंकि न तो उनकी पसंद के नेताओं को राज्य में टिकट दिए गए हैं और न ही इन नेताओं को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।

भाजपा के ज्यादातर नेताओं को आशंका होने लगी है कि अगर अगली बार भाजपा जीती तो पता नहीं क्या होगा? किसी भी पार्टी के नेता, कार्यकर्ता महत्व मिलने पर उत्साहपूर्वक कार्य करते हैं। पिछले चुनाव में भाजपा के नेता, कार्यकर्ता और आरएसएस के स्वयंसेवक उत्साहपूर्वक कार्य करते थे। इस बार मोदी और शाह के कृत्रिम प्रभामंडल का आकार बहुत बड़ा हो जाने से भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं का महत्व खत्म हो गया है और वे आधे मन से काम कर रहे हैं।

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में जो कुछ किया है, सबके सामने है। नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसलों से पूरी अर्थव्यवस्था उलट पलट हो गई है। बेरोजगारी की समस्या बहुत बढ़ गई है। सरकारी विभागों में स्वयंसेवकों का दखल बढ़ गया है। मंत्री, सांसद, विधायक तक इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि अपनी मर्जी से अपने क्षेत्र में जनता के काम नहीं करवा सकते। पूरा प्रशासन अफसरों के सुपुर्द कर दिया गया है और उसकी कमान मोदी ने मजबूती से संभाल रखी है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। मोदी देश के लोकतंत्र को एकतंत्र में तब्दील करने में लगे हुए हैं, जिसमें अमित शाह उनके प्रमुख सहयोगी हैं। क्या यह देश एकतंत्र को स्वीकार करेगा?

इस बार चुनाव में सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि देश में एकतंत्र चलेगा या लोकतंत्र? क्या पूरे देश को दो-तीन लोगों की मर्जी पर छोड़ा जा सकता है? लोगों के सामने राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे काल्पनिक मुद्दे उछाले जा रहे हैं। हिंदुओं को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि मोदी की सरकार बनने पर ही हिंदुओं के हित सुरक्षित रह सकते हैं। बहुत से लोग इस झांसे में आ चुके हैं, जिनमें युवाओं की संख्या ज्यादा है। अबकी बार, मोदी सरकार का नारा पूरे देश में गूंज रहा है। सोशल मीडिया के जरिए भी चुनाव जीतने की तमाम तिकड़में भिड़ाई जा रही है। इसके बावजूद क्या मोदी के नाम पर पिछले लोकसभा चुनाव की तरह भाजपा को जनता का समर्थन मिल सकता है?

मोदी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान साफ तौर पर देखा जा सकता है। कई बड़े भाजपा नेता अनमने ढंग से पार्टी का प्रचार कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि कई सीटों पर भाजपा के असंतुष्ट नेता, कार्यकर्ता ही भाजपा उम्मीदवार को हराने में जुटे हुए हैं। इसके बावजूद मोदी-मोदी का कानफोड़ू प्रचार जारी है। यह धनबल के माध्यम से हो रहा है। नोटबंदी के बाद जो नोटों की अदला-बदली हुई थी, उसमें भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए काफी धनबल अर्जित कर लिया है। बाहुबल उसके पास पहले से है। इसमें अब भारतीय जनता के खास तौर से हिंदुओं के बुद्धिबल की परीक्षा है कि वे कहां तक समझदार हो सकते हैं। अगर कोई खुद अंधी सुरंग में जाने को तैयार हो तो कौन क्या कर सकता है?

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