Breaking News

क्या है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पीछे का सच | What is the truth behind the electronic media

Posted on: 28 Mar 2019 16:27 by Surbhi Bhawsar
क्या है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पीछे का सच | What is the truth behind the electronic media

द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर

भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पिछले पच्चीस सैलून में लम्बा सफर तय किया है। आज यह मीडिया कहाँ पहुँचा यह बताना तो कठिन है लेकिन कैसे किस राह किस डगर पर चलते हुए पहुँचा और उन रास्तों की क्या कठिनाइयाँ क्या तनाव रहे यह जानना रोचक है। खबरों के पीछे का सच उनकी महत्ता उनकी उपेक्षा मीडिया हाउस की विचारधारा किसी रिपोर्टर को किस तरह प्रभावित प्रताड़ित करती है यह जानना भी कम रोचक नहीं है। यूँ तो गाहे बगाहे कुछ ख़बरें सामने आती हैं लेकिन इन ख़बरों का दस्तावेजीकरण करना भी कम जीवट का काम नहीं है वह भी तब जबकि आज कोई सच सुनना नहीं चाहता खुद मीडिया भी नहीं।

पुष्पेंद्र वैद्य की किताब द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शैशवकाल से अब तक की ऐसी कई सच्चाई सामने लाती है जो कभी हैरान करती हैं कभी वितृष्णा पैदा करती हैं तो कभी एक सहानुभूति की लहर पैदा करती है।

must read: सड़क पे फेंक दी तो ज़िंदगी निहाल हुई, प्रसिद्ध शायर दुष्यंत कुमार की गजल | Throwing it on the road, life Got it

सबसे पहले बात करें इसके कवर पेज की जिसमे कैमरे के सामने एक तार इस मीडिया की बंदिशे बताता हुआ सशक्त चित्र है। आज सभी प्रकार के मीडिया ऐसी ही किसी तारबंदी के शिकार हैं कुछ मजबूरी में कुछ मर्जी से।

अपनी बात में पुष्पेंद्र वैद्य ने बदलते ट्रेंड की बात की है तो इस क्षेत्र की चुनौतियों की बात भी की है। किताब अलग अलग अध्यायों में अलग अलग ख़बरों से जुड़े किस्से उसके पीछे की मंशा मानसिकता जद्दोजहद को रोचक तरीके से पेश करती है।

गोफन और फायरिंग के बीच आधी रात का सफर

यह उस समय की घटना है जब मैदानी रिपोर्टर का बहुत सम्मान हुआ करता था। उनके पास साधन नहीं थे लेकिन ख़बरों को कवर करने की जिजीविषा उन्हें जान जोखिम में डालने को प्रेरित करती थी। मीलों का सफर बगैर दिन रात देखे मोटर बाइक पर तय किया जाता था और खुद की जान की जिम्मेदारी भी खुद ही उठाना पड़ती थी। जलेबी घाट के घुमावदार रास्तों पर आधी रात का सफर और प्रदेश को हिला देने वाले मेहन्दीखेड़ा हादसे की रिपोर्टिंग बेहद रोचक है और पाठक फिंगर क्रॉस किये सुकूनदायक खबर की आस में पढता चला जाता है।

भगोरिया में वायरलेस सेट पर केरीऑन

उस समय जबकि न मोबाइल थे न हर हाथ में इंटरनेट सुदूर इलाके में एक भगोरिया में कवर करने को इतना कुछ था कि रिपोर्टर खुद को भूल जाये और ऐसे में जब पुलिस के वायरलेस सेट पर हेड ऑफिस से फोन आये तो वह भी काम रोमांचक तो नहीं है और उसके बाद क्या हुआ यह जानना भी।

गरीबों के हक़ के लिए लड़ने वाला मीडिया अपने नाम के अलावा रिपोर्टर की खुद की रूचि के सहारे भी आगे बढ़ता है तो कई दुखद हादसे में यही रिपोर्टर किस तरह बॉस ऑफिस और अप्रिय स्थिति की भावनाओं के बीच पिसते हैं और किस मनोदशा में काम करते हैं यह जहाँ द्रवित करता है वहीँ एक आक्रोश भी पैदा करता है लेकिन फिर भी इस सच को जानना बेहद जरूरी है।

ऐसे ही 31 अध्यायों में लिखी गई एक रिपोर्टर की जिंदगी उसकी कठिनाइयाँ रोमांच और संतुष्टि जिन्हे पढ़ना रोचक है।
पुष्पेंद्र वैद्य जी को एक बेहतरीन पुस्तक के लिए बधाई। कलमकार मंच को ऐसी पुस्तक का चयन करने के लिए साधुवाद।

लेखक पुष्पेंद्र वैद्य
प्रकाशक कलमकार मंच
मूल्य 150 रुपये

must read: विश्व रंगमंच दिवस पर मिली मार्फोसिस की अनोखी भेंट | Marfosis gets unique gift on ‘World Theater Day’

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com