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लोकप्रिय मोदी जी के लिए भीड़ ढोकर लाने की क्या जरूरत..? राजेश ज्वेल की कलम से….

Posted on: 22 Jun 2018 16:26 by krishnpal rathore
लोकप्रिय मोदी जी के लिए भीड़ ढोकर लाने की क्या जरूरत..?  राजेश ज्वेल की कलम से….

मोदी जी आपका इंदौर में स्वागत है… वर्तमान राजनीति में आपसे अधिक लोकप्रिय यानी जन नेता कोई और है भी नहीं… मगर सवाल यह है कि आपकी सभा के लिए भी जनता को ढोकर क्यों लाना पड़ रहा है..? मुख्यमंत्री से लेकर एक अदना सरकारी कर्मचारी इसी चिंता में दुबला हुआ जा रहा है कि नेहरू स्टेडियम को कैसे खचाखच भरें..? पार्टी के नेताओं का तो दम फूल गया और एक हजार से अधिक बसों की व्यवस्था के बाद भी जब वे भीड़ लाने में असहाय नजर आए, तब हर बार की तरह अफसरों को जिम्मा सौंप दिया, ताकि वे स्कूल, कॉलेजों से लेकर सरकारी कर्मचारियों की भीड़ जुटा सकें… तमाम विभागों के कर्मचारियों को फरमान जारी हो गए कि परिवार के साथ स्टेडियम में मौजूद रहें… इस चक्कर में कई स्कूलों की छुट्ट्यिां तो रहेगी, वहीं विश्वविद्यालय ने दो दर्जन से ज्यादा कोर्स की परीक्षाएं तक टाल दी और कुलपति 20 हजार से अधिक छात्रों को इस सफाई के साथ स्टेडियम भिजवा रहे हैं कि ये छात्र खुद ही मोदी जी के भाषण से मार्गदर्शन लेना चाहते हैं… यह बात अलग है कि मार्गदर्शन लेने के लिए स्टेडियम जाने की जरूरत क्या है, वह तो घर बैठे भी लिया जा सकता है, क्योंकि सारे ही माध्यमों से मोदी जी का भाषण प्रसारित तो होता ही है… सवाल यह भी है कि आखिर हमारे नेताओं को सुनने के लिए जनता खुद क्यों नहीं जमा होती..? एक जमाना था, जब पुराने नेताओं, जिनमें अटल जी भी शामिल रहे, उनके भाषण को सुनने के लिए ही जनसैलाब सिर्फ घोषणाभर से ही उमड़ पड़ता था और अब तो 24 घंटे कान पकाने के बावजूद लोग जमा नहीं होते, बल्कि उन्हें भीड़ की शक्ल में ढोकर लाना पड़ता है… इसकी जगह कोई फिल्म या क्रिकेट स्टार कई गुना अधिक भीड़ वैसे ही जुटा लेता है… मेरा तो उन तमाम भक्तों से भी दो टूक सवाल है जो 24 ही घंटे साहेब की माला जपते उन्हें देश और दुनिया का सबसे ताकतवर नेता बताते हैं… अपार लोकप्रियता और भरपूर सफलता के बावजूद मोदी जी की सभा के लिए भीड़ ढोकर क्यों लाई जाना चाहिए..? मुझे यहां जनकवि बाबा नागार्जुन की वो चर्चित कविता याद आ रही है जो उन्होंने इंदिरा गांधी के लिए लिखी थी… आओ रानी… हम ढोएंगे पालकी… आओ शाही बैंड बजाएं… आओ बंधनवार सजाएं… रफु करेंगे फटे-पुराने जाल की… आओ रानी हम ढोएंगे पालकी…
क्या आज स्थिति बदली है..?

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