इस वैज्ञानिक उपलब्धि पर ‘सियासी टैटूगिरी’ के क्या मायने?

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अजय बोकिल

‘आअो तुम्हें चांद पे ले जाएं, प्यार भरे सपने दिखाएं, छोटा सा बंगला बनाएं…’ शायर गौहर कानपुरी ने जब ये पंक्तियां लिखी थीं, तब इसे एक बालगीत माना गया था। शायर का वो सपना काफी हद तक आज पूरा होता दिख रहा है, क्यों‍कि साल के पहले श्रावण सोमवार को लांच हुए ‘चंद्रयान 2’ ने चांद पर जल की खोज और गहराई करने के लिए अपनी सफलता पूर्वक रवानगी डाल दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह हर भारतवासी के लिए गर्व का क्षण है। गर्व उन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के प्रति जो 130 करोड़ भारतीयों के सपने को साकार करने में अहोरात्र जुटे हैं। चंद्रयान 2 मिशन चांद के उन अंधेरे और ऊबड़ खाबड़ हिस्से में जीवन की खोज का हिस्सा है, जहां हमारे चंद्रयान 1 ने जल की संभावना के संकेत दिए थे।

यह गर्व का क्षण इसलिए भी है क्योंकि अंतरिक्ष में चल रही स्पेस रेस में अब हम भी शामिल हो गए हैं। इस दौड़ में शामिल देश ही धरती और मानव सभ्यता के भविष्य की दास्तान लिखेंगे। भीतर से उजाड़ दिखने वाले चांद पर यदि पानी के पक्के प्रमाण मिल जाते हैं तो आज धरती को उजाड़ने पर पर तुले हम मनुष्यों को अपनी कारगुजारियों के लिए नया ठौर मिल सकता है। इस स्पेस रेस’ में शमिल चीन तो पानी के साथ-साथ चांद के गर्भ में दबे खनिजो को कब्जाने की योजना पर अभी से काम शुरू कर चुका है तो प्रतिस्पर्द्धी अमेरिका चांद को अपना भावी उपनिवेश मानकर उसकी रक्षा के लिए स्पेस फोर्स (अंतरिक्ष सेना) के गठन का ऐलान कर चुका है।

हम भारतीयों की अभी नीयत इतनी खराब नहीं है। हम संसाधनों पर एकाधिकार के पक्षधर नहीं हैं। फिर चाहे वह चांद के संसाधन ही क्यों न हों। हालांकि धरती और उस पर बसे भारत में जीवन के तमाम क्षेत्रों और अनुशासनो में एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां ‘एकीकरण’ के आवरण में मजबूत हो रही हैं। चांद उससे अछूता कैसे रह सकता है?

हैरानी की बात है कि इस खुशी के क्षण में भी हमारे राजनेताअों ने सियासी टैटूगिरी से परहेज नहीं किया। लोकसभा स्पीकर ने जिस अंदाज में चंद्रयान की महान उपलब्धिप पर वैज्ञानिकों के साथ-साथ प्रधानमंत्री को भी बधाई देने हड़बड़ी दिखाई और उसी तर्ज पर कांग्रेस प्रवक्ता रणजीतसिंह सुरजेवाला ने इस मौके पर याद दिलाया कि चंद्रयान 2 को मंजूरी तो पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने दी थी, से संदेश यह गया कि ‘मेहनत करें वैज्ञानिक, मलाई खाएं नेता।‘ इस प्रवृत्ति से निर्मल खुशी के मौके पर बचा जा सकता था। अगर भारत के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा पर दूसरी बार सफलता से यान भेजने की तकनीक विकसित कर ली है, समय रहते ‍इस महत्वाकांक्षी मिशन की त्रुटियां खोजकर उन्हें वक्त रहते सुधारने की क्षमता हासिल कर ली है तो यह पूरे देश की आत्म शक्ति के लिए गर्व का विषय है।

याद रखें कि गर्व का क्षण तो वो भी था, जब श्रीहरिकोटा में पहली बार वैज्ञानिकों ने राकेट का सफल परीक्षण किया था। इस राॅकेट को वे साइकिल पर रखकर ले गए थे। जिस परीक्षण की नींव पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। गर्व का क्षण वह भी था जब भारत ने अपना उपग्रह, पहला परमाणु विस्फोट और पहला अं‍तरिक्ष यात्री स्पेस में भेजा था। उन सपनो की उत्प्रेरक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। गर्व का क्षण वह भी था, जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय भारत घोषित परमाणु ‍शक्ति बना था। गर्व का क्षण वो भी था, जब पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह के कार्यकाल में चंद्रयान 1 ने चांद की भीतरी टोह लेने का सिलसिला शुरू किया था। अब नरेन्द्र मोदी के समय में जो हो रहा है, वह भी गर्व का विषय है। क्योंकि यह ‘गर्व’ किसी व्यक्ति विशेष के विजन, चमत्कार या सपनो का परिणाम नहीं है बल्कि यह सपनो, संकल्पों को साकार करते जाने के सामूहिक जज्बे का नतीजा है। वो जज्बा जो इसरो के वैज्ञानिकों के चेहरे पर साफ पढ़ा और महसूस किया जा सकता है। यह एक ऐसी श्रृंखला है, जो करोड़ो भारतीयों की इच्छाशक्ति से संचालित होती है और आगे भी होती रहेगी।

दरअसल चांद पर बंगला बनाने की चाहत केवल हमारी ही नहीं है। चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसका इरादा अंतरिक्ष में रेशम मार्ग बनाने का है। मुमकिन है कि चांद पर जाने वाला अगला इंसान कोई चीनी ही हो। उसकी नजर चंद्रमा के साउथ पोल पर पाए जाने वाले पानी और हीलियम-3 पर भी है। पानी चांद पर बस्तियां बसाने के लिए और हीलियम-3 से धरती की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी है। चीन का इरादा चांद के खनिज संसाधनों पर लाल झंडा गाड़ने का है तो अमेरिका उसे अकेले ऐसा नहीं करने देना चाहता। हमारा चंद्रयान मिशन चांद के चमकते चेहरे के उस दूसरे पहलू को उजागर करेगा, जो अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है। इसी अंधेरे कोने में पानी यानी जीवन होने की क्षीण संभावना है। दरअसल चंद्रमा की सतह क्षुद्र ग्रहों और उल्का पिंडों के लगातार टकराने से गड्ढेदार बन गई है। इसे अंग्रेजी में क्रेटर कहते हैं। चंद्रयान 2 भी उजाले से वंचित क्रेटरों, वहां के वातावरण और चांद की पुरातनता का वैज्ञानिक अध्यायन करेगा, जहां तापमान माइनस 13 डिग्री रहता है।

हम चांद पर इसलिए रीझे जाते हैं क्योंिक हमे इसका उजला हिस्सा ही दिखता है। उजाले से ही कविताएं जन्म लेती हैं। उजाले से ही राष्ट्र लौह शक्ति में तब्दील होता है। बंगले भी बनते हैं। वैज्ञानिक चंदा मामा और बहन पृ‍थ्वी के उस रिश्ते की भी भौतिक और तार्किक विवेचना करने की कोशिश रहे हैं, जिसके तहत चांद और धरती में समानताएं खोजी जा सकें। चंदा मामा के यहां सशरीर आना- जाना आसान हो सके और चांद के खजानो पर भतीजे- भतीजियों ने नाते अपना हक जताया जा सके।

इस मायने में चांद पर जाने की यह रेस वाकई रोमांचक है। चीन और अमेरिका की तरह भारत की नजरें भी पानी और हीलियम-3 पर टिकी हैं। अनुमान है कि चंद्रमा पर हीलियम-3 का भंडार एक मिलियन मीट्रिक टन तक हो सकता है। इससे 500 साल तक पृथ्वीक की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। इसरो के चेयरमैन के सिवन ने पिछले दिनों कहा था, कि जो देश चांद से हीलियम ला सकेगा, वही पूरी दुनिया पर राज करेगा।

गर्व की इस घड़ी में भी चिंता और अफसोस के कुछ बिंदु है। और वो यह कि इस वैज्ञानिक कामयाबी जैसा आग्रह जीवन के दूसरे क्षेत्रों में क्यों नहीं है? उस वैज्ञानिक सोच और समझ के प्रति क्यों नहीं है, जो हमे चांद पर ले जाती है? चांद से बड़े अंध श्रद्धा, अंध विश्वास और अंध भक्ति के गड्ढे भारत भूमि पर हैं, इन्हें पूरने का संकल्प कहां है? चांद पर जाने का वास्तव में कोई अर्थ नहीं है यदि हमारी जीवन शैली के ‘क्रेटरों’ पर प्रामाणिकता, तार्किकता और तथ्यावत्मकता की कालीन न बिछे। तर्क में पगी आस्था जीवन के सत्य के करीब ले जाती है। करीब 4 लाख किलोमीटर दूर बैठा चांद अरबों सालों से हम भारतीयों को यही समझाने की कोशिश कर रहा है। क्या चंद्रयान इसकी शुरूआत बनेगा?

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