रामलला भूमि विवाद का पूरा कानूनी इतिहास क्या है

यह जानना बेहद जरूरी है कि रामलला की जमीन का विवाद कब शुरू हुआ और इसका अंतिम फैसला आज 9 नवंबर को 2019 को किया गया।

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ayodhya

इंदौर :यह जानना बेहद जरूरी है कि रामलला की जमीन का विवाद कब शुरू हुआ और इसका अंतिम फैसला आज 9 नवंबर को 2019 को किया गया। इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई 1885 में जब पहली बार मामला अदालत में पहुंचा महंत रघुवर दास ने विवादित इमारत से लगे राम चबूतरा पर राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए फैजाबाद सिविल जज के यहां अपील दायर की।

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद में फैजाबाद के सिविल जज जूनियर डिविजन के यहां मुकदमा दाखिल कर रामलला की मूर्ति ना हटाने और पूजा करने के हिंदुओं के अधिकार को बरकरार रखने की मांग की।

इसके बाद 5 दिसंबर 1950 को रामचंद्र दास परमहंस ने सिविल जज की अदालत में वाद दाखिल कर रामलला के पूजन तथा दर्शन का अधिकार मांगा 17 दिसंबर 1959 को निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल रिसीवर से अपने हाथ में हस्तांतरित करने के लिए सिविल जज के यहां मुकदमा दायर किया।

18 दिसंबर 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड में मालिकाना हक के लिए सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर किया। इसके बाद 1989 में भगवान रामलला विराजमान नाम से सिविल कोर्ट में पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया और 2002 में अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों ने सुनवाई शुरू की।

इसके बाद 30 दिसंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया – अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा आज दिए गए फैसले से इस पूरे मामले का अंत हो गया है। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राम मंदिर यहीं पर बनेगा कोर्ट ने केंद्र से एक ट्रस्ट बनाकर 3 महीने में काम शुरू करने का भी आदेश दे दिया है।

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