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यूरोपियन कंट्री से 25 साल पीछे चल रहे हैं हम: भालू मोंडे

Posted on: 07 Jun 2018 06:39 by hemlata lovanshi
यूरोपियन कंट्री से 25 साल पीछे चल रहे हैं हम: भालू मोंडे

इंदौर: घमासान डॉटकॉम आज मिलवा रहा है इंदौर शहर की ​शख्सियत भालू मोंडे से। अपने जीवन के 32 साल पर्यावरण को समर्पित कर चुके मोंडे जी आज भी निरंतर पर्यावरण के लिए काम कर रहे हैं।bhalun monde 6

द नेचर वॉलंटियर प्रेसीडेंट भालू मोंडे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। मोंडे जी ने बताया कि जर्मनी, इंग्लैंड आदि यूरोपियन कंट्री में 15 साल रहने के बाद भारत आया तो अजीब घटना हुई। विदेशों में हिप्पी कल्चर था। मेरा भी गेटअप वैसा था। मेरे ही मोहल्ले के लोग मुझे हिप्पी समझकर पत्थर मारने लगे थे। असल में लोग किसी चीज को समझना ही नहीं चाहते। जो दिखता है उसे ही मान लेते हैं।

फॉरेन कंट्री में 100 प्रतिशत ईमानदारbhalu monde 4

भारत और यूरोप के देशों में बहुत फर्क है। विदेशों में लोग 100 प्रतिशत ईमानदार हैै। वहां के.जी क्लॉस से ही बच्चों को डिसिप्लिन और प्लानिंग सिखाई जाती है। घर से शुरू होकर प्रोफेशन तक लोग आॅनेस्ट होते है। विदेशों में नेता भी आते हैं तो लोग एक जगह खड़े रहते है। लेकिन भारत में सब उल्टा होता हैै। भारत यूरोपियन कंट्री से 25 साल पिछे है।

दो सौ साल पुराना ​पीपल का पेड़bhalu monde 5हम लोग यंशवत सागर, सिरपुर तालाब सहित शरह की कई जगहों पर काम हो रहा है। शहर के दो सौ साल पुराने पीपल के पेड़ को हम सहेज रहे हैं। हमारी संस्था द्वारा पिछले चार सालों से हर साल दो हजार कॉटन बेग बांटे जाते हैं। प्रकृति को बचाने के लिए जानकारी बहुत जरूरी है। इसलिए हमारी संस्था द्वारा कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, ताकि सभी लोगों को प्रकृति और पर्यावरण की जानकारी दे सकें।

यूथ तोड़ रहे नियमbhalu monde 5भालू मोंडे जी ने बताया कि मुझे बड़ा दुख होता है यह देखकर की यंगस्टर्स ही नियम तोड़ रहे हैं। सिग्नल की बात हो या यहां-वहां कचरा फेकने की। परिवार बालों ने मंहगी बाइक और कार तो दे दी पर संस्कार नहीं दिए। अब स्कूल, कॉलेजों में पेड़-पौधों के बारे में सेम्पल के तौर पर बता देते हैं। जबकि सही चीज तो फिल्ड वर्क से पता लगती है। साफ-सफाइ के साथ ही यदि पौधे बच्चों से लगवाएं तो इससे अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता।

सिग्नल पर ढूढ़ते हैं पेड़ की छाव

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आज स्थिति यह कि लोग सिग्नल पर पेड़ की छाव देखते हैं। सिग्नल के पहले ही काफी दूर खड़े होते हैं, केवल छाव के लिए। लेकिन उस पेड़ को बचाने को प्रयास नहीं करते। छाव तो अच्छी लगती है पर एक पौधा नहीं रोपते।

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