क्या पाश एक शापित कवि थे ?

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poet pash

23 मार्च 1988 का दिन समकालीन हिन्दी कविता के इतिहास का सबसे काला दिन था । इस दिन हिन्दुस्तान के सबसे होनहार और प्रतिभाषाली कवि पाश की खालिस्तानी आतंकवादियों व्दारा हत्या कर दी गई । पाश की दर्दनाक हत्या इस बात का सबूत थी कि हिन्दी और पंजाबी कविता के सर्वाधिक धारदार लेकिन निहत्थे कवि से आतंकवादियों को भी खतरा उत्पन्न हो गया था ।

अपनी कविता “सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना” से प्रसिद्ध हुए पाश को जब हिन्दी के प्रख्यात आलोचक नामवरसिंह ने श्रद्धांजलि दी तो उन्होंने कहा कि पाश शापित कवि थे, किसी शापित यक्ष की ही तरह जिन्दगी से भरे इस कवि को कभी भी अपने मन लायक जीवन या दुनिया नहीं मिली । हालांकि हत्या से पहले भी 1969 में पाश को झूठे आरोपों में फंसाकर जेल भेजा गया था । पाश अपने निजी जीवन में बहुत बेबाक थे| चाहे इश्क हो या नशा, सब उन्होंने खूब खुलकर किया| अपनी कविताओं में तो वे अपने जीवन से भी अधिक बेबाक रहे|

विचारों या जीवन में उन्हें किसी तरह की मिलावट पसंद नहीं थी| घुट-घुटकर, डर-डरकर जीनेवालों में से पाश बिलकुल नहीं थे| उन्हें किसी अंतहीन समय में आनेवाले सुरक्षित दिन के इंतजार में दुबककर जीना भी मंजूर नहीं था| पाश को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए शोषण, दमन और अत्याचारों से मुक्त समतावादी दुनिया चाहिए थी| यही उनका सपना था और इसके लिए लड़ाई मजबूरी थी | उनके पास कोई बीच का रास्ता नहीं था| पाश की जिंदगी का सबसे बड़ा गम था ‘उच्च शिक्षित’ नहीं होने का हालांकि अपने बेहतर कवि होने को वे अपने विधिवत शिक्षित न होने के बहुत ऊपर रखते थे|

उनकी कविताएं लोगों के दिल में जीती रहीं| हर गलत वक़्त में उन्हें ताकीद करती रहीं – ‘सबसे खतरनाक होता है / सपनों का मर जाना / न होना दर्द का / सब कुछ सहन कर जाना / सबसे खतरनाक वे आंखें होती हैं / जो सबकुछ देखते हुए भी जमा हुआ बर्फ होती हैं’|

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