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युद्ध, सियासत और गैंडा

Posted on: 01 Mar 2019 08:56 by Pawan Yadav
युद्ध, सियासत और गैंडा

अमित मंडलोई

दंगल में गीता का कोच उसे सिखाता है कि लड़ाई सिर्फ ताकत से नहीं जीती जाती। ताकत तो गैंडे के पास भी होती है। शेर ताकत के साथ बुद्धि भी लगाता है, इसलिए अपराजेय होता है। वैसे भी युद्ध सिर्फ सरहद पर सैनिकों के द्वारा ही नहीं लड़ा जाता। एक युद्ध में कई युद्ध छुपे होते हैं। कई मोर्चों पर संगीन खुली होती हैं। हर हमले का जवाब देना होता है। पुलवामा से शुरू हुए इस छद्म युद्ध में भारत ने हर मोर्चे पर खुद को साबित किया है। युद्ध कम प्रोपोगेंडा ज्यादा के सिद्धांत पर चलते आए पाकिस्तान को अपने कटोरे में सहानुभूति बंटोरने का मौका तक नहीं दिया।

पुलवामा में 40 जवानों को खोने के बाद देश का लहू उबाल मार रहा था। हर कतरा बाढ़ बनकर पाकिस्तान को डुबो देने पर आमादा था। एक-एक मोमबत्ती बम से बड़ा दबाव बना रही थी। संदेश दे रही थी कि देश क्या चाहता है। उस वक्त सेना भावों के अतिरेक में नहीं बही। संयम से काम लिया। देश के जुनून को सतह पर आने दिया। दुनिया को यह समझाया कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकीस्तान है। कॉरिडोर के कारण हिमायत को विवश चीन अजहर मसूद के मसले पर भले ही औकात दिखाने से बाज नहीं आया, लेकिन खुलकर पाकिस्तान का साथ भी नहीं दे पाया। दुनिया के देश हिंदुस्तान के पक्ष में खड़े हो गए।

दबाव बढऩे लगा तो पाकिस्तान को मजबूरी में सामने आना पड़ा। बेतुके तर्क के साथ इमरान बोले, हमारे यहां सऊदी के क्राउन प्रिंस आए हुए थे। उनकी आवभगत में व्यस्तता के चलते समय नहीं निकाल पाए। अतिथि देवोभव का ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा। दुनिया आतंक के लिए सवाल खड़े कर रही थी और वे उन्हें लाहौर-कराची के लजीज व्यंजन परोस रहे थे। इधर फारिग होते ही याद आया कि दुनिया उन्हें आतंकी की नजर से देख रही थी। मासूमियत से बोले, जांच में हर संभव सहयोग के लिए तैयार हैं, पर पहले सबूत तो दें कि इसमें कहीं पाकिस्तान का हाथ था।

खैर इससे ज्यादा की उम्मीद बेमानी भी थी। इस बीच बदले की कार्रवाई के अंदेशे को देखते हुए जो कुछ समेट सकते थे, छुपा सकते थे, बचा सकते थे, वह सब कर लिया गया। इधर भारत अपनी तैयारी में लगा रहा और वायुसेना के जांबाजों ने घर में घुसकर आतंक के ठिकाने नष्ट किए। डर और बौखलाहट में पाकिस्तान ने ही सबूत जारी किए। यह बताने के लिए कि घर में घुसे जरूर हो, लेकिन नुकसान नहीं पहुंचा पाए। अगले दिन चेहरा बचाने के लिए पाकिस्तान ने घुसपैठ की कोशिश की, भागना पड़ा। जवाबी कार्रवाई में अभिनंदन उनके हत्थे चढ़ गए।

यहां भी पाकिस्तान ने उनका वीडियो जारी कर दिया। यह सोचकर कि शायद इससे ही सही उसे दुनिया की सहानुभूति मिल जाएगी कि देखो भारत घर में घुसकर वारकर रहा है, लेकिन ये दांव भी उलटा पड़ गया। भारत ने स्वीकार कर लिया कि हमारा एक विंग कमांडर मिसिंग है। जिनेवा समझौते के तहत उनकी सुरक्षा पाकिस्तान की जिम्मेदारी बन गई। यह भी साबित हो गया कि पाकिस्तान ने एलओसी का उल्लंघन किया और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की, जबकि हमने आतंक के अड्डों पर कार्रवाई की थी।

उसके झूठ भी सामने आ गए। पहले कहा तीन पायलट पकड़े हैं, फिर दो पर आया कि एक घायल है इसलिए अस्पताल में भर्ती है, दूसरे का वीडियो जारी कर रहे हैं। मिग-21 को मार गिराने और एफ-16 उड़ाया ही नहीं जैसी दलीलों की भी पोल खुल गई। इसके बाद उसके बाद कोई चारा ही नहीं था। अच्छे से जानता है कि भारत का मुकाबला करने की स्थिति में वह है ही नहीं और दुनिया से सहानुभूति भी नहीं मिल पा रही है। न खुदा मिला न विसाले सनम तो मरता क्या न करता बातचीत की पेशकश करके थोड़े नंबर बंटोरने की कोशिश की। कहीं तो यह संदेश जाए कि हम तो शांतिप्रिय हैं, शांति चाहते हैं।
मसूद और हाफिज टाइप के लोगों की फौज का पक्ष लेना भी तो मजबूरी है। इसलिए आखिरी दांव खेला कि अभिनंदन को सकुशल वापस भेज रहे हैं।

लोगों को लग रहा है कि इमरान और पाकिस्तान ने मानवता का परिचय दिया है, लेकिन एक बार सोचकर देखिए भारत ने उनके लिए कोई और रास्ता छोड़ा था। तीनों सेना प्रमुखों ने संयुक्त प्रेस कॉन्फे्रंस में उसके बचे-खुचे झूठ की बरात और निकाल ही दी है। चचा ट्रम्प कमेंट्री करने को विवश हो गए। भारत से बड़ी खबर आएगी, पाकिस्तान से अच्छी खबर मिलने वाली है। ऐसे में जाता कहाँ बेचारा। अभिनंदन की वापसी के साथ भारत के रणनीतिक कौशल का भी जश्न तो बनता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार

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