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वेलेंटाइन डे और भारतीयों का दोगलापन, पागलपन एवं पाखंड की पराकाष्ठा

Posted on: 14 Feb 2019 13:57 by Ravindra Singh Rana
वेलेंटाइन डे और भारतीयों का दोगलापन, पागलपन एवं पाखंड की पराकाष्ठा

नीरज राठौर

ईसा के 270 साल बाद यूनान में एक सनकी राजा क्लाइडियस ने एक आदेश निकाला कि सैनिकों को प्रेम या शादी नहीं करनी होगी!
क्या सैनिक इंसान नहीं है! जो इंसान अपने देश समाज के लिए शहीद होता है, क्या उसे प्यार मुहब्बत बीबी बच्चों की आवश्यकता नहीं है! क्या उसकी कोई भावनाएं नहीं है!

राजा के सनकी आदेश के आगे सारा देश झुक गया, ऐसे समय में एक महान संत वेलेंटाइन ने अपनी जान की बाजी लगाकर सैनिकों की गोपनीय रूप से शादी करवाना प्रारम्भ की !राजा ने महान संत वेलेंटाइन को जेल में डाल दिया! जेलर की बेटी अंधी थी, उसकी आँखें उन्होंने ने अपने इलाज से ठीक कर दी! सैनिक की लड़की संत से प्रेम करने लगी! 14 फ़रवरी 269 ईसवी को फांसी से पहले संत ने जो पत्र अपनी प्रेयसी को लिखा था, उसमें अपना नाम वेलेंटाइन लिखा था!

जिस संत ने हमारे गृहस्थ जीवन सैनिकों के प्राकृत जीवन को बचाने के लिए मौत को गले लगा लिया हो! ऐसे अमर शहीद के शहीद दिवस को आज धर्म संस्कृति नैतिकता के ठेकेदार बदनाम करने पर तुले हुए हैं!

प्रेम और वासना के अंतर को समझें:-
प्रेम एक भावात्मक लगाव है जो धर्म, जाति, सम्प्रदाय, नस्ल, उम्र, रंग के बंधनों को तोड़कर किसी के प्रति तन, मन धन और जीवन के समर्पण का भाव है!
वासना एक शारीरिक भूख है, जिसे इंसान पैसों के बल पर या शादी के माध्यम से भी मिटाता है! कुल मिलाकर वासना का खेल एक सौदे बाजी है!

बिना प्रेम के शादी करना, एक सौदे बाजी है, एक समझौता है, एक थोपा गया कथित संस्कार है! हम ऐसे इंसान के साथ जीवन गुजारने को मजबूर होते हैं जिसे हम दिल से नहीं सामाजिक मजबूरियों के चलते झेलते हैं! जो आठ दिन पहले हमारे लिए अनजान था आज वह हमारा पति या पत्नी है! उससे हमारी भावनाएं रंग रूप खान पान शिक्षा- दीक्षा मिले या न मिले, बस उससे केवल एक बात जरूर मिलती है ,वह हमारी उपजाति का है, या की है! उससे जो संतान होती है वे अधिकांशत: अनचाही या बलात्कर की सन्तानें हैं!

प्रेम : परमात्मा, या प्रकृति ने सारी मानव जाति को एक मंच पर लाने का हमें एक अनमोल तोहफा दिया है! हम उस भावना का सादुपयोग करें न कि उसे देश और समाज को तोड़ने का या किसी के शोषण का माध्यम बनाएं! मान लो एक गाँव में दस जाति के लोग जाति बंधन तोड़कर एक दुसरे के रिश्तेदार बन जाए तब सारे गाँव में जाति द्वेष ही खत्म हो जाए!

हम कितने ही धर्म, संस्कृति, नैतिकता के बंधन लगाएं! प्रकृति इन्हें तोड़ती आई है तोड़ती रहेगी! आज दुनिया पूरी तरह बदल गई है, लड़के लड़कियाँ 30-35 साल तक अपने करियर के चक्कर में व्यस्त रहते हैं! स्वभाविक है उनके बीच प्रेम सम्बन्ध भी बनेंगे! उन्हें लिव इन रिलेशनशिप के नाम से कानून ने मान्यता भी दे रखी है!

वेलेंटाइन डे के विरोधी कहते हैं कि इससे समाज में व्याभिचार बड़ेगा, गर्भपात और कुँवारी माँओं की समस्या पैदा हो जाएगी!
वास्तव में यदि माँ बाप समझदारी से काम ले तो सब समस्या ही हल हो जाए बच्चों के प्रेम को हम सामाजिक धार्मिक मान्यता दे दें तो ये समस्याएं पैदा ही न हो!आज कुछ ठेकेदार कहते हैं कि 14 फ़रवरी को अमर शहीद भगतसिंह को फांसी हुई थी जबकि महामानव भगतसिंह को फांसी 23 मार्च 1931 को हुई थी!

कुछ लोग कहते हैं कि ये यूरोप की बीमारी है हम क्यों झेलें ! इन मूर्खों को ये नहीं पता कि जिस वाट्सप फेसबुक का वे ईस्तेमाल कर रहे हैं, वो भी कहाँ हमारे- बाप दादाओं की बपोती है जी! हमारे घरों में जो भी आधुनिक चीजें हैं वे सब यूरोप अमेरिका की देन है??
किस -किस से बचोगे?आओ हम सब मिलकर एक ऐसे सभ्य समाज की स्थापना करें ! जिसमें इंसान को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार हो और समाज, धर्म और कानून ऐसे सम्बन्धों को अपनी मान्यता दें!

आज हजारों लड़के- लड़कियों को पीटा जाएगा धर्म संस्कृति नैतिकता के ठेकेदारों द्वारा!हमारे पूर्वज कितने उदारवादी थे – प्रेम विवाह को गंधर्व विवाह के रूप में मान्यता देते थे! स्वयं वर में लड़की स्वयं अपने जीवन साथी का चयन करती थी! हमारा सारा पौराणिक इतिहास प्रेम विवाहों से भरा पड़ा है! हम तो यहाँ तक उदारवादी हैं कि मन्दिरों में भी लिंग और योनि की पूजा करते हैं, क्योंकि वही हमारा भग वान है, जिसने हमने जन्म दिया उसकी पूजा आदर सत्कार भी जरूरी है!!!

हमारे पूर्वजों ने जीवन के चार उद्देश्यों में काम (प्रेम) को भी तीसरे नम्बर पर स्थान दिया है! विश्व धरोहर खजुराहो के मन्दिरों में कामकला का जो अद्भुत चित्रण किया गया है, वह काम सम्बन्धों के ज्ञान के विषय में यूरोप अमरीका से हमारे हजार साल आगे होने का जिंदा सबूत है! हमारे पूर्वजो ने आज से 1000 साल पहले सम्भोग के 84 आसन खजुराहो के मंदिर पर अंकित कर दिए थे. तब पश्चिम देश भी काम-कला में हमसे इतने आगे नहीं थे. कामकला विज्ञान से सम्बन्धित विश्व की प्रथम वैज्ञानिक पुस्तक ‘कामसूत्र’ के लेखक को हमने अश्लीलता फैलाने वाला नहीं, उन्हें महर्षि ( वात्यायन) की उपाधि दी है!

कितने महान उदारवादी थे हमारे पूर्वज! हम उनकी नालायक संतानें बिना अपना इतिहास पढ़े ही लठमार में लगे हुए हैं! हाय रे अज्ञान!!!
यदि आप जवान है तो भूलकर भी आज किसी पार्क में या कहीं भी अपनी जवान बहन को लेकर भी उसे स्कूल कालेज या ट्यूशन लाने ले जाने का काम न करें! ऐसा करने पर आप पर हमला भी हो सकता है! आज छुट्टी रखें! उन अमर शहीदों को कोटि -कोटि नमन! जिन्होनें मानवीय प्रेम को बचाने के लिए अपने जीवन को कुर्बान कर दिया!

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