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उत्तम स्वामी जी: नैया का खेवैया…रामदास स्वामी

Posted on: 13 Sep 2018 12:13 by shilpa
उत्तम स्वामी जी: नैया का खेवैया…रामदास स्वामी

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उत्तम लोहगाव का मठ छोड़ के निकल तो आया मगर कोई निश्चित गंतव्य नहीं था। तीर्थ यात्रा करते घूमता रहा। घूमते-घामते एक दिन पुणे पहुंचा। पुणे विमानतल के पास एक छोटा सा गांव है, गांव में हनुमान जी का मंदिर था। उत्तम बालपन से हनुमान जी का अनन्य भक्त था। हनुमान जी के दर्शन कर मंदिर में बैठा ही था, कि उसने देखा कि एक सन्यासी उसकी ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है। उसने सन्यासी से पूछा ‘महाराज क्या चाहते हैं कोई सेवा हो तो बताएं’।

सन्यासी ने अप्रत्याशित उत्तर दिया ‘मुझे तू चाहिए’उत्तम सन्यासी की अपेक्षा सुन हतप्रभ रह गया। क्रोध भी आया, उसने कहा ‘मैं आपका सम्मान कर रहा हूं इसका अर्थ यह नहीं कि आप कुछ भी बोले, इस जीवन में मैं आपके पास नहीं आ सकता’ सन्यासी मुस्कुराते हुए बोले तेरे कहने से क्या होगा एक दिन मेरे पास आएगा इसी जीवन में आएगा। सन्यासी की बातों से उद्विग्न उत्तम ने उस स्थान को तुरंत छोड़ दिया। गणपति के दर्शन की अभिलाषा से वह रांजन गांव गया। रांजणगाव महाराष्ट्र प्रदेश के अहमदनगर जिले में है। यहां अष्टविनायक में से एक गणपति का मंदिर है। उत्तम अभी बस से उतरा ही था कि पुणे के हनुमान मंदिर में मिले सन्यासी दिखाई दिए उनको देखते ही उत्तम का दिमाग खराब हो गया। इस सन्यासी के कारण ही तो पुणे का हनुमान मंदिर छोड़ा था।

सन्यासी पहुंचे हुए संत थे। अंतर्यामी से कोई बात कहां छुप सकती है, उत्तम के मन के भाव जान गए संदेह दूर करने के निमित्त उन्होंने एक चमत्कार किया। मार्ग में पास से एक महिला गुजर रही थी गठिया के कारण उसका शरीर टेढ़ा मेढ़ा था, कष्ट के कारण ठीक से चल नहीं पा रही थी सन्यासी ने उस महिला को स्पर्श किया। स्पर्श करते ही वह पूर्ण रूप से ठीक हो गई और सीधी होकर चलने लगी। चलते समय होने वाला कष्ट भी नहीं था। अब चकित होने की बारी उत्तम की थी। वह उनके साथ हो लिया।

गोस्वामी जी दशनामी अखाड़े के खालसा संप्रदाय के रामदास स्वामी थे उनकी आयु 130 वर्ष थी रामदास स्वामी अलग प्रकार के सन्यासी थे वह सारी सिद्धियों के स्वामी थे लेकिन किसी आश्रम मठ मंदिर से बंधे नहीं थे। उनका कोई एक निश्चित स्थान नहीं था और ना ही उन्होंने किसी को अपना शिष्य बनाया था। सांसारिक लोगों के व्याप से अलिप्त रहा करते थे सामान्यता किसी को अपने पास फटकने भी नहीं देते थे पास आने वाले को गालियां दिया करते थे इसी कारण गांव के लोगों ने पागल बाबा कहते थे। उत्तम रामदास स्वामी के सानिध्य में रहकर आध्यात्मिक साधना करने लगा उन्होंने उसे सब प्रकार से परिपूर्ण कर दिया स्वामी जी के साथ रहने और साधना का परिणाम यह हुआ कि उत्तम के विचार बदल गए। उसके मन की साध थी की वह भागवत का बड़ा प्रवचनकार बने। बड़ा आश्रम बनाएं, अब वह सब व्यर्थ लगने लगा, सब कुछ भूल अपने को पूरी तरह गुरुजी के अस्तित्व में मिला दिया। उत्तम स्वामी जी का मानना है कि गुरु जी का अवतार मेरे लिए ही हुआ था। वह उनसे अत्यंत प्रभावित थे केवल इस कारण नहीं कि वह उनके गुरु है अपितु इसलिए कि उनके जैसा श्रेष्ठ, निर्लेप, निर्मोही, अनिकेत सन्यासी दूसरा नहीं देखा। रामदास स्वामी ने अपना स्थान बनाया ही नहीं बनाया था। किसी को अपना शिष्य भी नहीं बनाया था किसी को अपने साथ नहीं रखते थे। उनकी शक्तियां अद्भुत थी। इसका अनुभव उत्तम स्वामी जी को बार-बार आता था। रामदास स्वामी उत्तम स्वामी के लिए चिंतामणि थे कामधेनु थे.

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