उत्तम स्वामी: शक्ति परीक्षण से नाराज गुरु ने दिया संकेत,इन कामों मत उलझो

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One day Guruji got a signal that what he is doing is not getting entangled in these works

जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर पराड़कर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।

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दो प्रयोगों के बाद भी उत्तम को संतोष नहीं था। लोहगांव की एक महिला अस्वस्थ हुई। रोग के बारे में परिजनों तक को नहीं बताया। कष्ट सहन करने लगी लगभग 5 वर्षों तक रोग को शरीर पर निकाला। एक दिन सहनशक्ति जवाब दे गई। तब तक रोग चरमावस्था प्राप्त कर चुका था। चिकित्सक को दिखाया गया। चिकित्सकों ने परीक्षा कर बताया, पहले आते हैं तो ठीक किया जा सकता था। रोग भीषण रूप धारण कर चुका है। अब निदान संभव नहीं। चिकित्सालय से घर भेज दिया गया। कुछ ही दिनों में स्थिति यह बनी कि रोगी ने खटिया से लग गई। एक दिन उर्ध्वस्वांस चलने लगा। आस छुटती नहीं है।

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सब कुछ जानने के बाद भी चिकित्सालय ले गए। परीक्षण के बाद चिकित्सक ने बताया दो-तीन घंटे का मामला है। जिन्हें भुलाना है बुला लो। रिश्ते नातेदार को सूचना कर दी गई। एक परिजन यह बात उत्तम को बताइ। उत्तम ने स्त्री का छायाचित्र मंगवाया। छायाचित्र आने पर उस पर ध्यान केंद्रित कर स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना की। प्रार्थना का सुपरीणाम हुआ। महिला ठीक होने लगी। कुछ समय पूर्व यमदूतों की प्रतीक्षा थी। पर अब वह पूर्णता चेतना ही नहीं थी, अपितु सबसे अच्छी तरह से बातचीत कर रही थी। पीड़ा व कष्ट का नामोनिशान नहीं था।

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रुग्ना की परिवर्तित स्थिति के बारे में चिकित्सक को बताया गया। चिकित्सक भागे भागे आए। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। मगर सत्य आंखों के सामने था। अचंभित चिकित्सकों ने एक बार फिर से यंत्रों के माध्यम से रुग्णा की परीक्षा की, यंत्रों में भी वही बताया शरीर से रोग के लक्षण समाप्त हो चुके थे। सब कल्पनातीत था। सावधानी की दृष्टि से आठ दस दिन चिकित्सालय रख रुग्णा को छुट्टी दे दी गई।

उत्तम अपनी अलौकिक शक्ति के परीक्षण के प्रयोग कर रहा था। एक दिन गुरूजी से संकेत मिला कि यह क्या रहे क्या कर रहे हो। इन कामों में मत उलझो। निर्जन स्थान में रहकर एकांत साधना करो। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर उत्तम लहूगांव छोड़ दिया। लोहगांव छोड़ अमरावती आया। इस बार वास्तव्य घर पर ही था। ध्यान करना जारी थी। साधना कभी घर पर करता तो कभी वन चला जाता। दिन भर वन में रह रात को घर लौटता। परिजन समझ नहीं पा रहे थे यह आगे क्या करेगा। उत्तम से बात करने पर उत्तर मिलने की संभावना नहीं थी। अतः पिता ने उसके मित्रों से पूछताछ की उन्होंने बताया कि उसका कठोर साधना के निमित्त जाने का विचार है।

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पुत्रमोह अभी छूटा नहीं था। पिता पुत्र को पकड़ कर रखना चाहते थे। उस पर सतत ध्यान रखते। उत्तम एक दिन अपने ननिहाल अमरावती गया था। पिता जी साथ में थे वह उसे अकेला छोड़ना नहीं चाहते थे। मेल मुलाकात के पश्चात रात को सब सोए। सावधानीवश पिताजी अपना एक हाथ पुत्र के शरीर पर रखे हुए थे, ताकि उसकी हलचल का पता चल सके। मगर उन्हें ऐसी गहरी निद्रा आई की पुत्र कब उठ कर चला गया पता ही नहीं चला। नींद खुलने पर देखा पुत्र अपने बिस्तर पर नहीं है। घर में खोज की कुछ पता नहीं चला। पंछी उड़ चुका था। तुरंत रेल स्थानक की ओर दौड़ लगाई। एक रेल प्रस्थान की तैयारी में थी। अंतिम संकेत हो चुका था। एक डिब्बे में बैठा हुआ उत्तम दिखाई भी दिया, मगर उस तक पहुंचने के पूर्व रेल चल पड़ी। इस प्रकार पुत्र एक बार फिर हाथ से निकल गया और हतबल पिता को खाली हाथ लौटना पड़ा।

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