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उत्तम स्वामी जी: जब गुरु जी ने कराए ‘अद्भुत दर्शन’

Posted on: 14 Sep 2018 17:01 by shilpa
उत्तम स्वामी जी: जब गुरु जी ने कराए ‘अद्भुत दर्शन’

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जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।

एक बार गुरु जी ने स्वामी जी से कहा कि अपने को अयोध्या चलना है। साथ ही यह भी कहा कि टिकट मत लेना रेल स्थानक पर पहुंचकर शिष्य को आदेश दिया कि प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठना है। मथुरा तक निर्भीकता से यात्रा संपन्न हुई। मथुरा के बाद टिकट चेकर आया । उत्तम ऊपर की शायिका पर सो रहा था। चेक करने के लिए गुरुजी से टिकट मांगा गुरुजी ने कहा टिकट नहीं है। फिर क्या था टिकट चेकर उन्हें अपमानास्पद शब्द बोलने लगा। टिकट चेकर की ऊंची आवाज सुन उत्तम की निद्रा भंग हुई और वह सहायता के लिए नीचे उतरा और टिकट चेकर को रोकते हुए कहा आप इस प्रकार ना बोले जो शुल्क है वह ले लीजिए।

वह जेब से पैसे निकाल रहा था कि गुरु जी ने टिकट चेकर को संबोधित करते हुए कहा “अरे श्याम तू बहुत अहंकारी है तुझे टिकट चाहिए टिकट ले” अपना नाम सुनकर वः चौंका। इनको को मेरा नाम कैसे मालूम हुआ उसके कोट पर नाम पट्टिका भी नहीं थी। गुरुजी ने शरीर पर से शाल उतारी और झटकारने लगे। शाल से झरझर कर टिकट बरसने लगे। देखते ही देखते टिकटों का ढेर लग गया।गुरूजी बोले – “ले कितने टिकिट चाहिए कितने टिकट चाहिए” टिकिट चेकर की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली हो गई फिर क्या था। उनके पैरों पर लौटने लगा, तिरस्कार के साथ गुरुजी ने कहा तूने संतो को बहुत कष्ट दिया है। अब कभी किसी को कष्ट मत देना। तुझे सुधारने आया था। गुरूजी से टिकट चेक करने भोजन करने का बहुत आग्रह किया भोजन तो दूर गुरुजी ने उसकी चाय पीना तक स्वीकार नहीं किया।

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अयोध्या पहुंचकर दोनों ने विभिन्न मंदिरों के दर्शन किए। अयोध्या की ही बात है एक रात गुरु शिष्य लेटे थे। लेटने पर भी मन तो शांत रहता नहीं है। उत्तम के मन में कुछ शंकास्पद विचार उठ रहे थे गुरु जी अपने शिष्य के मन की सारी बात जान जाते थे वह बोले, “क्या फालतू बातें सोचता रहता है मन का संदेह जाता नहीं है.”

गुरुजी की बात सुन उत्तम का चौंकना स्वाभाविक था। गुरु जी की आज्ञा के अनुसार आंखें खोली देखता क्या है कि कमरे में दो अति सुंदर युवक बैठे थे उनकी सुंदरता का वर्णन करना कठिन था। कोमल ऐसे ही हाथ से छूने भर से मिले हो जाए। गुरुजी का उन दोनों युवकों से संवाद चल रहा था। उत्तम को उनकी बातचीत सुनाई नहीं दे रही थी पर तीनों के होंठ हिलते दिखाई दे रहे थे। उत्तम स्वामी जी बताते हैं कि वह अद्भुत दर्शन आज भी आंखों के सामने दिखाई देता है।

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