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सावित्री फुले का इस्तीफा: अवसरवाद से ज्यादा मोहभंग की बेचैनी

Posted on: 07 Dec 2018 10:03 by Ravindra Singh Rana
सावित्री फुले का इस्तीफा: अवसरवाद से ज्यादा मोहभंग की बेचैनी

अजय बोकिल

यूपी के बहराइच से फायरब्रांड दलित सांसद सावि‍त्री बाई फुले का भाजपा से इस्तीफा राजनीतिक अवसरवाद से कहीं ज्यादा बड़ा झटका इस मायने में है कि यह दलित समुदाय के भाजपा से हो रहे मोहभंग का खुला ऐलान है। हालांकि बसपा से भाजपा में आईं सावि‍त्री पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में जीत भी गई थीं। लेकिन ऐसे तमाम ‘आयातित’ नेता अब अपने पुराने डेरों में लौटने लगे हैं।

शायद उन्हें अहसास हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में या तो उन्हें भाजपा टिकट ही नहीं देगी और दिया भी तो पहले सी मोदी या हिंदुत्व की लहर अब नहीं चलने वाली। माना जा रहा है ‍‍कि सावि‍त्री बाई के बाद चार और दलित सांसद भाजपा का साथ छोड़ सकते हैं। इनके अलावा बाकी के दलित सांसद भी भीतर से बैचेन हैं। उन्हें लगता है कि मंदिर और गाय ने सामाजिक न्याय की उनकी लड़ाई को कहीं राख में दबा दिया है।

सावि‍त्री बाई फुले नाम से 19 वीं सदी की उन महान समाज सुधारक, शिक्षा विद और कवियित्री साबित्री बाई फुले का स्मरण हो आता है, जिन्होने उच्च वर्णीय हिंदू समाज के घोर विरोध के बाद भी अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ पुणे में पहला महिलाअों का स्कूल खोला था। इस नाते वे देश के पहली महिला शिक्षक भी थीं। जबकि इन सांसद सावित्री बाई के बारे में कहा जाता है ‍कि वे अपनी बात बेबाकी से कहती हैं और दलितों को संगठित करने का काम करती रही हैं। सांसद सावि‍त्री का यह भी कहना है ‍कि वे भाजपा में नहीं आई थीं बल्कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ही उन्हें बुलाकर टिकट दिया था। क्योंकि भाजपा के पास प्रत्यािशयों का टोटा था।

सांसद सावि‍त्री पिछले एक साल से लगातार अपनी पार्टी भाजपा को निशाना बना रही थीं। उन्होंने राम ‍मंदिर को देश की तीन फीसदी ब्राह्मणों का धंधा करार दिया था। साथ ही यह भी कहा था ‍कि अगर भगवान राम में शक्ति होती तो वे अपना मंदिर खुद बनवा लेते। उन्होंने दलित हनुमान को मनुवादी राम का गुलाम बताया। सावित्री ने भाजपा पर जाति वादी होने का आरोप लगाया और कहा कि जातिवादी सोच से ऊपर उठने के लिए जाति का मोह छोड़ना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वे दलित हैं, इसलिए भाजपा में उनकी उपेक्षा हो रही थी। साथ ही यह वादा भी ‍किया कि जब तक जिंदा हूं, कभी भाजपा में नहीं लौटूंगी। हालांकि सावित्री ने सांसद पद से इस्तीफा अभी नहीं दिया है।

सावि‍त्री बाई तो एक उदाहरण है। भाजपा के अन्य दलित सांसद भी पार्टी में घुटन महसूस कर रहे हैं। यूपी में ही भाजपा के 17 दलित सांसद हैं। इनमें से इटावा के अशोक दोहरे,नगीना के यशवंत सिंह, राबत्त्गगंज के छोटेलाल खरवार तो खुलकर अपनी पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे हैं। दिल्ली से भाजपा सांसद उदितराज भी कई बार पार्टी लाइन से हटकर अपनी बात रखते रहे हैं। आशय यही कि भाजपा से जो उन्हें अपेक्षाएं थीं, वो पूरी नहीं हुईं। पार्टी का दलित प्रेम केवल बाबा साहब अंबेडकर प्रतिमा पूजन तक ही सीमित है। वास्तविक दलित कल्याण और सामाजिक समता उसकी प्राथमिकता नहीं है। बावजूद इसके कि भाजपा ने सवर्णों और पिछड़ों की नाराजगी को दरकिनार कर एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट को फिर से सख्त बनाया है।

कहा जा सकता है कि ये वो सांसद हैं, जिन्हे इस बात का पूर्वाभास हो चुका है कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा उन्हें टिकट नहीं देने वाली है। ऐसे में उन्होने नए ठिकाने तलाशने शुरू कर दिए हैं। निश्चय ही यूपी में दलितों की पहली पसंद मायावती की बहुजन समाज पार्टी ही है। इसका मुख्य कारण यह है कि अंबेडकर गुणगान के बाद भी व्यवहार में दलितों को यह यकीन दिलाने में भाजपा नाकाम रही है कि हिंदुत्व की छतरी में उनके हित पूरी तरह सुरक्षित हैं और वह सचमुच सामाजिक समता और समरसता के रास्ते पर चलना चाहती है।

गोहत्या पर पाबंदी से पशु चमड़े के धंधे में लगे दलितों का कारोबार ठप होना, गोरक्षकों द्वारा दलितों की आए दिन बेरहम पिटाई और जातीय भेदभाव ने दलितों की भाजपा से दूरी बढ़ती जा रही है। इसकी एक झलक देश में एट्रोसिटी एक्ट के शिथिलीकरण के विरोध में इस साल अप्रैल में आयोजित भारत बंद के दौरान हुई हिंसा से मिल चुकी है। हालांकि इसके बाद डेमेज कंट्रोल के रूप में भाजपा ने यूपी में अपने दलित सांसदों को दलित मोहल्लों में भेजकर यह बताने की कोशिश की कि एससी/एसटी एक्ट में हो रहे बदलाव के लिए केन्द्र सरकार और बीजेपी जिम्मेदार नहीं है। साथ में यह भरोसा दिलाने की कोशिश भी कि भाजपा सरकार न तो संविधान को बदलने जा रही है। लेकिन इस समझाइश का कोई खास असर नहीं हुआ।

भाजपा से नाखुश दलित सांसदों की नाराजगी को अवसरवाद मानने वाले तर्क दे सकते हैं कि ये सब राष्ट्रवादी संस्कार वाले लोग नहीं हैं। मसलन सावित्रीबाई, अशोक दोहरे बसपा से आए थे तो यशवंत सिंह रालोद से भाजपा में आए थे। उदित राज ने अपनी इंडियन जस्टिस पार्टी का ही भाजपा में विलय कर दिया था। अब चूंकि भाजपा से घबराए बसपा और सपा अगले लोकसभा चुनाव में हाथ मिला सकते हैं, ऐसे में ये अपने मूल दलों में राजनीतिक संभावनाएं ढूंढने में अभी से लग गए हैं। इन नेताअों की कोई राजनीतिक निष्ठा नहीं है। इनकी निष्ठा केवल कुर्सी के प्रति है। भाजपा में भी वो इसीलिए आए थे और जाएंगे भी इसी लालच में। और अगर भाजपा से इनकी इतनी नाराजी थी तो ये साढ़े चार साल तक चुप क्यों थे?

मामला इतना आसान नहीं है। दलित सांसदों का भाजपा से जाना सामान्य बात नहीं है। यह वास्तव में हिंदू एकता की बुनियाद को ही लगने वाला बड़ा धक्का है, जिसकी आस में पिछले लोकसभा चुनाव में हिंदू समाज ने जाति वर्ण को नजर अंदाज कर भाजपा को वोट किया था। दलितों की परेशानी यह है कि उनकी संख्याय देश में 20 फीसदी होने के बाद भी वे कुछ ही संसदीय क्षेत्रों में निर्णायक हैं। वे केवल अपने दम पर सत्ता न तो हासिल कर सकते हैं और न ही उस पर काबिज रह सकते हैं। सत्ता परिवर्तन के ‍लिए उन्हें दूसरी जातियों और समुदायों का भी सपोर्ट चाहिए। वह कई बार मिला भी है, लेकिन जाति विनाश और सामाजिक समता की वेदी पर यह सपोर्ट अक्सर दम तोड़ देता है।

कांग्रेस से नाउम्मीद दलितों को भाजपा से अास थी, लेकिन भाजपा प्राथमिकताएं धर्म ध्वजा से तय होती हैं न कि कर्म ध्वजा से। वह बाहरी बदलाव की बात तो करती है, लेकिन हिंदू समाज में आतंरिक बदलाव में उसकी भी रूचि नहीं है। जबकिि दलितों का पहला आग्रह ही सामाजिक बराबरी और सम्मान का है। ‘राम राज’ में वही उन्हें महसूस नहीं हो रहा है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ का हनुमान को दलित बताना और उसी को दूसरे अर्थ में सावित्री फुले द्वारा दलित हनुमान को मनुवादी राम का गुलाम बताना अपने आप में गहरा राजनीतिक और सामाजिक अर्थ लिए हुए है। दलित भी राम भक्त होना चाहते हैं, लेकिन हनुमान की तरह निष्काम भक्त नहीं होना चाहते। सावित्री बाई फुले का इस्तीफा इसी खदबदाहट का परिणाम है।

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