चौथ माता का एक प्राचीन मंदिर, जहा मिलता है अखंड सौभाग्‍य का वरदान

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chauth mata mandir

कार्तिक कृष्ण की चतुर्थी को करवा चौथ किया जाता है। इस व्रत में चंद्रमा का काफी महत्व होता है। गौरी माता का एक रूप चौथ माता का है। करवा चौथ के दिन मां पार्वती की पूजा करने से अखंड सौभाग्‍य का वरदान प्राप्‍त होता है। मंदिरों में चौथ माता के साथ श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। करवा चौथ माता सुहागन स्त्रियों के सुहाग की रक्षा करती हैं।

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आइए जानते है भारत के राजस्थान में मौजूद सबसे प्राचीन, चौथ माता के इस अनोखे मंदिर के बारे में। चौथ माता का एक मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गांव में स्थित है। ये चौथ माता का सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर माना जाता है। कहते हैं इस मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी। बरवाड़ा का नाम 1451 में चौथ माता के नाम पर चौथ का बरवाड़ा घोषित किया गया था।

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ये स्थान पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर करीब एक हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर शहर से करीब 35 किमी दूर है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोहने वाला है। मंदिर में वास्तुकला की परंपरागत राजपूताना शैली देखी जा सकती है। यहां तक पहुंचने के लिए करीब 700 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाराजा भीम सिंह पंचाल के पास एक गांव से चौथ माता की मूर्ति लाए थे। देवी की मूर्ति के अलावा, मंदिर परिसर में भगवान गणेश और भैरव की मूर्तियां भी हैं। 1452 में मंदिर का जीर्णोद्घार किया गया था।

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चौथ का बरवाड़ा शहर में हर चतुर्थी को स्त्रियां माता जी के मंदिर में दर्शन करने के बाद व्रत खोलती है एवं सदा सुहागन रहने आशीष प्राप्त करती है। चौथ माता को हिन्दू धर्म की प्रमुख देवी मानी जाती है, जिनके बारे में विश्वास है कि वे स्वयं माता पार्वती का एक रूप हैं। करवा चौथ एवं माही चौथ पर यहां लाखों की तादाद में दर्शनार्थी पहुंचते है। चौथ माता के दर्शनों के लिए स्त्रियों की भीड़ पुरुषों की अपेक्षा अधिक रहती है।

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करवा चौथ माता सुहागन स्त्रियों के सुहाग की रक्षा करती हैं। उनके दाम्पत्य जीवन में प्रेम और विश्वास की स्थापना करती हैं। सुहागिनों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। अर्घ्य देते समय पति-पत्नी को भी चन्द्रमा की शुभ किरणों का औषधीय गुण प्राप्त होता है। दोनों के मध्य प्रेम एवं समर्पण बना रहता है।

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