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प्रसिद्ध क्रांतिकारी मंगल पांडे को श्रद्धांजलि | Tribute to Famous Revolutionary Mangal Pandey

Posted on: 12 Apr 2019 12:37 by rubi panchal
प्रसिद्ध क्रांतिकारी मंगल पांडे को श्रद्धांजलि | Tribute to Famous Revolutionary Mangal Pandey

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले महा नायक मंगलपांडे का सोमवार को बलिदान दिवस था ।चुनाव के शोर में हम अपने इस सुपरस्टार को एक तरह से भूल गए । इस अवसर पर हम इलाहाबाद से जा पहुंचे बांदा ज़िले की एक नदी विषहरणी के उदगम स्थल पर । विषहरणी की कहानी अलग से बताऊंगा । अभी तो यह जानिए कि मंगल पांडे को याद करने हम बुंदेलखंड के अतर्रा की इस पवित्र धरती पर क्यों पहुँचे ?

हममें से कितने लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी और विनोबा भावे की अनुयायी निर्मला देशपांडे के पसंदीदा स्थानों में से एक अतर्रा भी था । सन 1966 में निर्मलाजी ने यहाँ मंगल पांडे की याद में सालाना कार्यक्रम शुरू किया था । याद की इस मशाल को जलाए रखा लेखक, समाजसेवी,पत्रकार,गांधीवादी चिंतक ,सर्वोदयी और विनोबाभावे के अनुयाई उमा शंकर पांडे ने । इलाके के लोग उन्हें जल पुरुष की तरह जानते और मानते हैं ।किसी गुमनाम नायक की तरह वे योद्धा की तरह एकला चलो रे ! वाले अंदाज़ में अपनी झोली से तमाम रत्न समाज के ख़ज़ाने में जमा कर रहे हैं । पैर टूटने के बाद एक लोहे की रॉड पर सवार होकर कुलांचें भर रहे हैं । वे कैंसर को परास्त कर चुके हैं । अपनी संकल्प शक्ति और माँ के आशीर्वाद से । बिना किसी दवा के । सारे डॉक्टर हैरान हैं ,जिन्होंने ढेर सारी जाँचें करने के बाद इस जानलेवा बीमारी से उनका रिश्ता जोड़ दिया था ।

निर्मला देशपांडे की याद में स्कूल चला रहे हैं । एक पैसा उसमें से नही लेते । बारहों महीने खादी का झोला उनके कंधे पर रहता है । इसमें दो तीन प्याज़, नमक की पुड़िया ,पानी की एक बोतल और सत्तू रहता है । जहाँ भूख लगी — सत्तू ज़िंदाबाद । ऐसा फ़क़ीर आपने कहीं देखा है ?

बहरहाल । उनके मंगलपांडे वाले कार्यक्रम में राष्ट्रपति से लेकर केबिनेट मंत्री आ चुके हैं।पिछले बरस मालिनी अवस्थी जी आईं थीं। इस बार मैं और यायावर मित्र सुधीर सक्सेना बांदा जा पहुँचे और एक तरह से जंगल में मंगल को गाँव वालों के साथ विष हरणी नदी के किनारे भावभीनी श्रद्धांजलि दी । बांदा के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल गोयल और पांडे जी भी साथ थे । आस पास के गांववाले भी वहां आए थे । यक़ीन मानिए । दो दिन पहले इलाहाबाद में चन्द्रशेखर आज़ाद के बलिदान स्थल पर इलाहाबाद में जो अवसाद और पीड़ा घनीभूत हुई ,वह यहाँ आकर ग़ायब हो गई ।शहीदों की चिंताओं पर हर बरस मेले लगें या न लगें, दिलों में उनकी शहादत के दीप जलते रहने चाहिए । चित्र इसी अवसर के हैं ।

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