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आज बड़ा कर नाटक, वरिष्ट पत्रकार कीर्ति राणा की टिप्पणी

Posted on: 19 May 2018 07:52 by krishna chandrawat
आज बड़ा कर नाटक, वरिष्ट पत्रकार कीर्ति राणा की टिप्पणी

अपने उज्जैन में हर साल कार्तिक माह में क्षिप्रा किनारे गधों का मेला भी लगता है। मेले में बिक्री के लिए लाए जाने वाले गधों के नाम हीरो-हीरोइन के नाम पर रहते ज़रूर हैं लेकिन उस मान से क़ीमत नहीं मिलती क्योंकि रहता तो वह गधा ही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शनिवार की शाम 4 बजे तक येदियुरप्पा को बहुमत सिद्ध करना है, उनके विधायक हैं 104, चाहिए 8 और। जब से वहाँ सारे दल नाटक करने में लगे हैं रह रह कर मुझे कार्तिक मेले की याद आ रही है।
मुझे तो लगता है ये कांग्रेस, जदस वाले ज़बरन अपने विधायकों के भाव सौ सौ करोड़ बता रहे हैं बंगारु लक्ष्मण जैसे सीधे सच्चे भाजपा अध्यक्ष तो बहुत कम में मान गए थे, संसद में प्रश्न पूछने का रेट कहाँ है इतना? शायद सौ करोड़ की अपनी क़ीमत तय करके एक तरह से विरोधी विधायक मोटा भाई की परीक्षा लेना चाह रहे हैं कि अब बताओ नक़द आठ सौ करोड़ का इंतज़ाम कर के। आरबीआई तो दो हजार के इतने नोट फटाफट छापने से रही, एक तो वह नोटबंदी के बाद से जमा हुए पुराने नोट गिनने में लगी है, दूसरे देश में वैसे ही करेंसी क़िल्लत चल रही है। पता नहीं कल अंतरात्मा की आवाज़ किस तरह विधायकों के कानों में गूंजेगी लेकिन भाजपा के पुराने वित्त-विदेश मंत्री यशवंत सिंहा ने धरने पर बैठने का निर्णय लेकर अपनी आत्मा की पवित्रता दर्शाने की कोशिश तो की है।

रही बात कर नाटक की तो अपना अमित भाई और राहुल भाई की क़ाबिलियत पर और विश्वास बढ़ा है। राहुल गांधी पर इसलिए कि भाजपा जो चालें बाक़ी राज्यों में सरकार बनाने के लिए चलती रही उसी चाल को चल कर नथुनों में लाल मिर्च भरने जैसा काम कर दिखाया है।अन्य राज्यों बिहार, गोवा, मेघालय आदि में भी अधिक संख्या बल वाले दल को शपथ के लिए बुलाने का खेल भी यहाँ के नाटक को देख कर ही शुरु हुआ है। मोटा भाई पर इसलिए अपना विश्वास है कि राज्यपाल वजूभाई वाला का जहाँ रोल खत्म हुआ वहाँ से अब उनकी कारीगरी शुरु होती है। येदियुरप्पा की शपथ में मुँह दिखाई से ज्यादा ज़रूरी है डेमेज कंट्रोल। वो सब कहीं दूर बैठ कर ही हो सकता है।कमल का अंग्रेजी नाम सोचते हुए लोटस की याद आई, फिर दिल्ली का लोटस टेंपल (बहाई धर्म) और पिछली बार कर्नाटक सीएम रहते येदियुरप्पा ने फ़ेमस किया ऑपरेशन लोटस भी याद आया । तब भी येदियुरप्पा ने ऐसा ही किया था, ऑपरेशन लोटस के तहत उन्होंने विधायकों को इस्तीफा दिलवाकर अपनी पार्टी में शामिल किया था और फिर चुनाव लड़वाकर जितवाया था । अभी भी ऐसा हो सकता है कि कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायक टूट कर भाजपा का समर्थन करें और दल बदल कानून के तहत बाद में इस्तीफा देकर चुनाव लड़ कर फिर जीत कर आएं। रही लोकतंत्र की बात तो कांग्रेस को इस ताबूत में कीलें ठोकनें का बेहतर अनुभव भले ही हो पर ताबूत में कील किस नफासत से ठोंकी जाती है यह ज़रूर सीखना चाहिए उम्रदराज़ पार्टी के लोगों को। रही बात भाजपा की तो ये अटलजी के ज़माने वाली तो है नहीं कि एक मत कम पड़ने पर इस्तीफा देने दौड़ पड़े थे अटल जी।अब तो विरोधी दलों की ग़लतियों से सीखने का नहीं, उनसे बढ़कर ग़लतियाँ दोहराने और चिल्ला चिल्लाकर खुद को लोकतंत्र के प्रहरी साबित करने का ज़माना है। कांग्रेस ने गोबर खा कर हाथ गंदे किए यह ज़माने को बताएँगे कि हम ने चम्मच से खाने की समझदारी दिखाई, हाथ और चेहरा भी साफ़ रहा । हाल के वर्षों में राजनीति ने इतनी गुलाटी लगाई है कि अब तो पार्टी विद डिफ़रेंस भी कई बार पार्टी विद डिफ़ेंस सुनाई पड़ता है।वैसे भी भाजपा की सदस्यता लेने के लिए कांग्रेस के लोगों को मिस कॉल तो करना नहीं पड़ता जैसे ही चुनाव की घंटी बजी, मोटा भाई का आगमन हुआ कि तोहफ़े पेश करने की होड़ लग जाती है, यूँ तो चाल, चरित्र और चेहरा ही पहचान था लेकिन कांग्रेस होती भाजपा को उस पहचान पर दुपट्टा डालना पड़ रहा है।

इस बहुमत परीक्षण में मुस्कुराते गांधी ही भारी पड़ जाएँ तो अचरज नहीं होना चाहिए। दरअसल अचरज तो कांग्रेस के कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी को होना चाहिए कि जिन सीजेआई को कोस रहे थे एक रात में ही इन सब के हृदय परिवर्तन हो गए। राज्यपाल वजूभाई वाला की तत्परता पर भी अचरज है कि वो सात दिन की मोहलत माँग रहे और ये पंद्रह दिन की उदारता दिखा रहे। इस नाटक में कम से कम सुप्रीम कोर्ट को गंगा स्नान करने और धब्बे छुड़ाने का अवसर मिल गया। सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार का ही दिन तय करके न्यायाधिपति शनिदेव का तो मान बढ़ाया ही सही, शनि की दृष्टि किस पर कैसी रहेगी शाम तक पता चल जाएगा । कोर्ट की इस तत्परता ने कांग्रेस-जदस को पंद्रह दिन के भारी भरकम बिलों के भुगतान से भी बचा लिया है। कल सदन में पानीपतरे के सौदे जैसी स्थिति बन जाए, उठापटक या विरोधी दलों के विधायक येदियुरप्पा पर मोहित हो जाएँ तो बड़ी बात नहीं। फिर भी येदियुरप्पा पर न्यायालय की तलवार लटकी रहेगी, दस सप्ताह बाद राज्यपाल वजूभाई के फ़ैसले पर सुप्रीम कोर्ट विचार करेगी। वैसे भी राज्यपाल ने समर्पण के मामले में अब तक के तमाम राज्यपालों का रिकार्ड तोड़ने और संवैधानिक पद की गरिमा को नए तरीक़े से परिभाषितकरने का कीर्तिमान बनाया है।

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