नमस्कार इंदौर,

भारत की आजादी के सूत्रधार ऐसे कई महान क्रांतिकारी रहे हैं, जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। भारत माता के इन अमर बलिदानी सपूतों ने अपने बलिदान से देश की आज़ादी तथा लोकतंत्र को एक नई राह प्रदान कर समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया है।

ऐसे ही भारत माता के सपूत उग्र राष्ट्रवादी आदरणीय नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, जिनकी देशभक्ति ने उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बना दिया। भारतीय सिविल सेवा में चयनित होने के बावजूद उन्होंने सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया, क्योंकि सिविल सेवा में रहकर वे देश के लिए तथा देशवासियों के लिए वे कुछ विशेष नही कर पा रहे थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षाओं से अत्यधिक प्रभावित थे तथा उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। वहीं अपने राजनीतिक गुरु  चित्तरंजन दास जी की प्रेरणा से उन्होंने स्वराज पार्टी द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र फॉरवर्ड के सम्पादक का कार्यभाल भी संभाला।

वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जापान के सहयोग से ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया था। नेताजी सुभाष चंद बोस द्वारा दिया गया ‘जय हिंद’ का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा है। ‘किसी राष्ट्र के लिए स्वाधीनता सर्वोपरि है’ इस आदर्शवाक्य से संचालित होकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजीवन भारत की आजादी के लिए प्रयासरत रहे।

“ तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा ” के जय उद्घोष से उन्होंने देश के युवाओं को अपने सशक्त सैन्य अभियान में शामिल कर “ आज़ाद हिंद फौज ” को देश की आजादी के उद्देश्यों से संचालित किया। उन्होंने नारिशक्ति के महत्व को समझते हुए “रानी लक्ष्मीबाई ब्रिगेड” की स्थापना की। इससे स्पष्ट होता है कि हमारी नारीशक्तियों के अदम्य साहस से नेताजी सुभाषचंद्र बोस न सिर्फ परिचित थे अपितु वे इसका सदुपयोग करना भी जानते थे।

नेताजी ने युवाओं को स्वाधीनता का संकुचित अर्थ यानि कि केवल गुलामी के बंधन से मुक्ति नहीं, बल्कि स्वाधीनता के वृहद अर्थ के अंतर्गत राष्ट्रीयता की भावना, आर्थिक समानता की प्राप्ति, जातिगत भेदभाव की समाप्ति, सामाजिक समानता की प्राप्ति, सांप्रदायिक संकीर्णता त्यागने का मूलमंत्र भी दिया। क्योंकि वे भारत देश को केवल स्वतंत्र ही नही बनाना चाहते थे अपितु वे भारत देश को विश्वगुरु के रूप में स्थापित करना चाहते थे।

साथियों! आज नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की जन्मजयंती के शुभावसर पर उनसे हमें उन गुणों को आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए, जिनके बल पर हम “सुभाष” बनने की प्रेरणा प्राप्त कर राष्ट्रहितों से संचालित होकर देश को स्थायित्व प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान निभा सकें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के अविस्मरणीय योगदानों को याद करते हुए स्वयं को देश की समृद्धि के लिए समर्पित करते हुए भारत देश को विश्व गुरू बनाने हेतु अवश्य ही सार्थक प्रयास करेंगे।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।

जयहिंद!

आपका मित्र

पुष्यमित्र भार्गव
महापौर, इंदौर

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