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थिरकते पांव में कांटे की चुभन, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

Posted on: 16 May 2018 11:07 by Ravindra Singh Rana
थिरकते पांव में कांटे की चुभन, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

कर्नाटक जीत लिया, तो जश्न तो होगा ही बीजेपी के हर कर्ताओं के पांव इसी तरह थिरक रहे थे लेकिन शाम होते होते जैसे थिरकते पांव में कांटे चुभ गए। होता है, जब पूर्ण बहुमत मिल जाने की बढ़ती हुई उम्मीद कुलांचे मार रही हो बदन अपने आप थिरकने लगता है। और ऐसी जगह जहां चुनाव रणनीतिक आधार पर संग्राम की तरह लडा जा रहा हो जीत का जश्न झूमने को मजबूर कर देता है।

बहरहाल कुछ सैकड़े के अंतर से गंवाई सीटें बीजेपी के लिए अचानक ऐसे कांटें बन गए जिसकी चुभन ने न केवल थिरकना रोक दिया अपितु मंज़िल तक पहुंचने के लिए बीजेपी को लंगड़ा दिया। यह स्थिति परिणामों की विषम परिस्थितियाँ है जिसमें एक बड़ा दल लंगड़ा कर राजभवन जा रहा है तो दो छोटे पराजय भाव के दल जोर लगाकर हैय्या बोल रहे हैं।

महामहिम वजुभाई वाला इन संवैधानिक हालात में मैं समझता हूँ अपने विवेक से निर्णय लेने के लिए अधिकारसम्मत है। ऐसी परिस्थितियों में कई परिपाटियां पिछली सरकारों ने शुरू की है और राज्यपाल तदनुसार ऐसे निर्णय लेते रहे हैं जो संवैधानिक से ज्यादा राजनैतिक परिलक्षित होते थे। कालांतर में उन सरकारों को अपनी ही बनाई परिपाटियों का खामियाजा भोगना पड़ा और ऐसे में राज्य के चुनाव में केंद्र के भाव का असर दिखने लगा।

मैं नहीं समझता कि कांग्रेस जिसने उहापोह में ब्रह्म विचार से जेडीएस रूपी पंचर टायर में हवा भरकर कुमारस्वामी को बेशर्त मुख्यमंत्री बनाने की जो गाड़ी राजभवन भेजी है उसे राजभवन में पार्किंग होने दी जाएगी। दरअसल पेंच सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना या नहीं बुलाना एक फैसला है जिसे राज्यपाल को लेना है। राज्यपाल वजूभाई वाला इस लिए स्वतंत्र है आज सब पूछ रहे हैं ” वजूभाई केम छो”, आप पूछते रहिये केम छो और वजूभाई जल्द बतला भी देंगे केम छो, लेकिन तब तक बीजेपी अपने दल को जरूरी समर्थन के आंकड़े तक पहुंचा चुकी होगी।

बीजेपी को आठ विधायक चाहिए तो संभव है आठ मंत्री लाना ही होगा , यह शर्त पूरी करना असंभव कहीं नहीं है । इसलिए भी कि महत्वाकांक्षाएं हर राजनेता के संस्कार होते हैं और आते हुए अवसरों को कोई खोना नहीं चाहता। लिंगायत नेता येदुरप्पा के लिए यह मुश्किल भी नहीं है, इधर के उधर के जुगाड़ तो वे पूरे कर ही लेंगे ऐसी खास रात गुजर चुकी है।

कांग्रेस बहुत बदनाम हो गयी, इस दयनीयता के लिए किसे दोष दिया जाए । बहुत जल्दबाज़ी में बीजेपी को निपटाने के उपक्रम जो आज़ाद हिंदुस्तान के सबसे बड़े शासक दल ने किया वह राजनैतिक शुचिता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से भिन्न है।हालांकि सभी दल इस तरह की कुटिलताओं से राजनयिक बनने ,बनाने के उपक्रम में लगे हैं।
जल्दी परिदृश्य में नई सरकार आ जायेगी ,जैसे भी बहरहाल थिरकते पांव कांटे की चुभन को सहजता से लेने को मजबूर है।
सुरेंद्र बंसल

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