Breaking News

बेटी आशा की पासवान के खिलाफ इस बगावत के मायने..!

Posted on: 14 Jan 2019 09:22 by Mohit Devkar
बेटी आशा की पासवान के खिलाफ इस बगावत के मायने..!

अजय बोकिल

इसे शुद्ध राजनीति या परिवार में आंतरिक मतभेदो के दर्शन से हटकर देखा जाना चाहिए कि एक बेटी अपने ही रसूखदार पिता ‍के खिलाफ इसलिए सड़क पर धरना दे रही है कि उसने बिहार की एक पूर्व महिला मुख्यमंत्री को ‘अंगूठा छाप’ कह कर पूरे महिला समाज का मजाक उड़ाया। पासवान का व्यंग्य बाण राजनीतिक था लेकिन जहां लगा वो जमीन एक अबला की थी, जो विपरीत हालात में भी जद्दोजहद कर सबला बनने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। यह महिलाओं  के बढ़ते आत्मविश्वास और हकों के लिए लड़ने का अटूट संकल्प भी है। मामला जातिवादी राजनीति के अभेद्य गढ़ बिहार का है। वहां केन्द्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के सुप्रीमो रामविलास पासवान ने राजनीतिक विरोधी राष्ट्रीय जनता दल द्वारा देश में सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने की तीखी आलोचना का प्रत्युत्तर इस ताने के साथ दिया कि वे ( राजद) एक तरफ सवर्ण आरक्षण का विरोध करते हैं और दूसरी तरफ एक ‘अंगूठा छाप’ को मुख्येमंत्री बनाते हैं। पासवान ने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन निशाना सीधा लालू प्रसाद यादव की पत्नी राबड़ी देवी पर था। यह सच है कि राबड़ी देवी अनपढ़ हैं और देश में पहली अनपढ़ मुख्यमंत्री होने का रिकाॅर्ड भी उन्हीं के नाम है। लेकिन वास्तव में राबड़ी समझदार हैं और अपने अनपढ़ होने को लेकर उनमें कोई हीन भाव नहीं रहा। यानी न पढ़ पाईं तो न पढ़ पाईं। दोष है तो हालात का और किस्मत का। लेकिन भाग्य ने उनकी वैवाहिक गांठ खांटी राजनीतिज्ञ लालू प्रसाद यादव से बांधी। सो राबड़ी अशिक्षित होकर भी सज्ञानों पर राज करती रही हैं।
अब रामविलास पासवान की बात। पासवान देश के बड़े दलित नेता होने के साथ-साथ राजनी‍ति के मौसम वैज्ञा‍निक भी हैं। साथ ही अपने अतीत को याद करने से भी बचते रहे हैं। उनकी दूसरी और वर्तमान पत्नी रीना मूलत: पंजाबी ब्राह्मण हैं। लेकिन पासवान रीना के इश्क में ऐसे गिरफ्ताार हुए ‍िक अपनी पहली और अनपढ़ पत्नी राजकुमारी को शादी के 21 साल बाद तलाक दे बैठे। राजकुमारी आज भी बिहार के खगाडिया जिले के एक गांव में रहती हैं। राजकुमारी से पासवान की दो बेटियां हैं। आशा और उषा। ये दोनो ही दलित हैं और आशा की शादी राजद नेता साधू पासवान से हुई है। पासवान की सवर्ण पत्नी से एक संतान चिराग है, जो रामविलास की पार्टी का राजनीतिक चिराग भी है। पासवान राजनीतिक रूप से अपने दामादों को भी साधने की ‍कोशिश करते रहते हैं। लेकिन इस बार दांव कुछ उल्टा पड़ा। क्योंकि सियासी शाॅट खेलने के चक्कर में वो ऐसी बात कह गए जो खुद उन्हें ही सामाजिक रिश्तों को नकारने और अमानवीयता के कटघरे में खड़ा करती है। रामविलास ने जोश में राबड़ी को ‘अंगूठा छाप’ तो कह दिया, लेकिन इसी के साथ सवाल यह भी उठा कि उन्होने अपनी पूर्व पत्नी को अंगूठा छाप क्यों रहने दिया? 1969 से राजनीति में रचे बसे पासवान क्या अपनी पत्नी को साक्षर होने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते थे या फिर उनके मन में दलित होने की छुपी कुंठा थी, जिसे उन्होंने सवर्ण स्त्री से विवाह कर दूर करने का प्रयास किया?

यह सही है कि लालू की पहली और दलित पत्नी ने कभी सत्ता के महाकेन्द्र दिल्ली का मुंह नहीं देखा या उन्हें दिखाने लायक नहीं समझा गया। यहां तक कि पासवान 2014 तक यह भी छुपाते रहे कि उनकी कोई पहली पत्नी भी है। एक दलित नेता का अपनी ही पूर्व दलित पत्नी के साथ यह कैसा अमानवीय व्यवहार? दूसरों से सामाजिक न्याय की अपेक्षा रखने वाले अपनों के साथ ही सामाजिक अन्याय करके भी भोले कैसे बने रह सकते हैं ?

पासवान की बेटी ने अपने सगे बाप से माफी मांगने का झंडा उठाकर उस पीड़ा को भी रेखांकित किया, जो दलितों पर अत्याचार की राजनीति करके तो आगे ब़ढ़ते हैं और बढ़ते ही अपनों के मानवीय अधिकारों को बेशर्मी से अगूंठा दिखाने में नहीं हिचकते। बेटी आशा पासवान पर यह आरोप तो आसानी से जड़ा जा सकता है कि वह पासवान की प्रतिद्ंदद्वी पार्टी राजद के उकसावे पर ऐसा कर रही है। लेकिन यह पूरे घटनाक्रम को हल्के में आंकना है। बेटी आशा ‘राबड़ी देवी’ पर अन्याय के बहाने अपनी मां के साथ अपने ही बाप ‍द्वारा ‍की गई नाइंसाफी को बेनकाब कर रही हैं।

सवाल यह है कि दलित नेता (सभी नहीं) अमूमन निजी जिंदगी में अपनी दलित और अनपढ़ पत्नियों को स्वीकारना क्यों नहीं चाहते? क्या अनपढ़ अथवा असुंदर पत्नियां दलित नेताअों के ‍दलित हितों के संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं? अगर नहीं है तो उनकी दलित राजनीति का असली चेहरा क्या है? खबर तो यह भी है कि 72 वर्षीय रामविलास पासवान स्वास्थ्य कारणों से अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते। उनकी जगह उनकी वर्तमान पत्नी रीना पासवान को उतारने की चर्चा है। चूंकि पासवान की हाजीपुर सुरक्षित सीट है और रीना सवर्ण हैं। ऐसे में नया फंडा यह दिया जा रहा है कि रीना पूर्व में शर्मा भले रही हों, लेकिन आती वो दलित समाज से ही हैं। इस हिसाब से किसी शर्मा के ‘दलित’ होने का यह शायद पहला ही उदाहरण होगा।

बहरहाल बेटी आशा पासवान ने अपने ही पिता से एक महिला (प्रकारांतर से उनकी मां राजकुमारी को भी) को अंगूठा छाप कहकर अपमानित किए जाने पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है। क्योंकि यह केवल राबड़ी देवी का नहीं, उन तमाम महिलाअों का भी अपमान है, जो पुरूष प्रधान समाज में अपनी इच्छा से पढ़ नहीं पाई और इसी निरक्षरता की सजा वह उपहास के रूप में भुगतने को विवश है। हो सकता है कि पासवान ने इतनी दूर तक शायद सोचा भी नहीं होगा कि राबड़ी देवी के प्रति उनके कटाक्ष की मार यहां तक होगी। लेकिन ऐसा कहते वक्त पासवान ने केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ देखे, महिलाअों और खासकर अपने ही समाज की दलित महिलाअों के प्रति भीतर छिपी हिकारत को नहीं देखा। आशा की बाप से बगावत के पीछे राजनीतिक नीयत कुछ भी हो, लेकिन वह महिलाअो के उपहास के खिलाफ अपने ही पिता से दो-दो हाथ कर रही है, यह सराहनीय है। इस हिसाब से लालू प्रसाद यादव की सोच रामविलास पासवान से कहीं ऊंची है कि लालू अपनी पत्नी राबड़ी के अगूंठा छाप होने की बात जानते हुए भी उनका दर्जा कभी उन्नीसा नहीं होने‍ दिया। इसको लेकर उन्हें कभी शर्म महसूस नहीं हुई। उलटे उन्होंने उस राबड़ी को राज्य का सीएम बना ‍िदया, जो ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पातीं। यही फरक है सामाजिक न्याय और दलित उत्थान की बातें करने और हकीकत में उस पर अमल करने का। रामविलास अपने कमेंट के लिए माफी मागेंगे या नहीं पता नहीं, लेकिन बेटी आशा ने महिलाअो के प्रति उनकी सोच को जिस तल्खी के साथ बेनकाब किया है, वह भारतीय राजनीति में याद रखा जाएगा। क्योंकि ‘परिवारवाद’ हमेशा सत्ता की विरासत झटकने तक सीमित नहीं होता, कभी-कभी वह परिवार पर अपनों द्वारा हुए अन्याय को सार्वजनिक करने और इंसाफ ‍हासिल करने के लिए भी होता है।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com