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वे सिर्फ तालियां बजाने नहीं आए हैं, अमितमंडलोई की कलम से….

Posted on: 25 Jun 2018 10:16 by krishnpal rathore
वे सिर्फ तालियां बजाने नहीं आए हैं, अमितमंडलोई की कलम से….

प्रधान सेवक इंदौर में 16 जिलों के चुनिंदा लोगों से रूबरू हुए। ये वे लोग थे, जिन्हें किसी न किसी सरकारी योजना का लाभ मिला था। कोई सरकारी आवास पा गया था तो किसी के इलाके में पेयजल की कोई योजना शुरू हुई थी। समझ सकते हैं कि जो लोग खड़े किए गए थे, उन्हें अच्छे से समझाया गया होगा। क्या कहना है, कैसे कहना है, कितना कहना है, सब बताया गया होगा। इसके बाद भी आंखों से उनकी मासूमियत टपक रही थी। आवाज की झिझक से खुशी झांक रही थी। कुछ मिलने से बढक़र वह पल था, जिसमें कोई उनकी बात सुन रहा था। इतना ही तो चाहते हैं, थोड़ी ही सही लेकिन कोई उनकी भी सुन ले। वे नपे-तुले शब्दों में बस यही कह पा रहे थे कि उन्हें कुछ मिला है। वे खुश हैं कि जिंदगी की गाड़ी किसी पटरी पर आई है। कच्चे घरों से वे पक्के मकान में आ गए हैं। पानी की किल्लत से निजात मिलने का भरोसा जागा है। उन्हें देखकर महसूस हुआ कि जिंदगी के अंधेरों में डूबे लोग रोशनी की एक किरच मिलते ही कैसे उछल पड़ते हैं। जब लगता है, कोई सुन रहा है तो कैसे गला भर आता है, आंख भीग जाती है। पैर खुद ब खुद कांपने लगते हैं। किसी की आवाज लरज रही थी तो कोई बार-बार कृतार्थ हो रहा था। सबके पीछे उत्सव चल रहे थे, लेकिन सबसे बड़ा और असली जलसा तो उनके भीतर चल रहा था।

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एक-एक कर जिले जुड़ते जाते, माइक पकड़े महिला-पुरुष अपनी बात कहते। मोदी सुनते और मुस्करा देते। न किसी ने इनसे सवाल पूछा और न ही इन्होंने किसी से और कुछ जानने की चेष्टा की। बावजूद इसके ये क्षण उन सब जिंदगियों में एक लकीर खींच गया है। क्या मिला, कैसा मिला, कितना मिला, इसका हिसाब उम्रभर चलता रहेगा। मन की बात और साध पूरी भले न हो, लेकिन कहने का मौकाभर मिल जाए तो भी बड़ा सुकून मिलता है। वही तसल्ली आज उन अनाम चेहरों पर मोटे-मोटे अक्षरों में दमक रही थी।वजह साफ है कि लोग बोलना चाहते हैं। बहुत कुछ है सीने में दफन उसे उडेल देना चाहते हैं। वे कुछ करना चाहते हैं। बाजुएं फडक़ती हैं, आंखों में अरमान मचलतेे हैं। जो भी जिंदगी उनके हिस्से में आई है, उसे और बेहतर और बेहतर करना चाहते हैं। वह तड़प, वह बेसब्री किसी ठौर तो पहुंचे। कोई दर तो मिले जहां आवाज उठा सकें। कोई हाथ तो बढ़े जो इन्हें खींच लें। कोई बात तो चले जो इनके अरमानों को सींच दे। उम्मीदों से भरे लोगों से पंडाल खचाखच था।

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उनकी आवाज, उनकी तालियां, उनके चेहरों की रौनक पीठ पर लद गई हैं। सवाल खड़े करती हैं कि ये जश्न किस बात का है, ये खुशी, ये रौनक किस खयाल से उन्हें यहां तक खींच लाई है। कैसी उम्मीद और कैसे अरमान हैं, जो हर सीने में धडक़ रहे हैं, अहसासों में मचल रहे हैं। क्या बात उन तक पहुंच रही है, जो वहां दूर बैठे हैं। दरअसल इस भीड़ में खिलखिलाता हर चेहरा एक सवाल है, एक उम्मीद है। वह इसी साध में यहां तक चला आया है कि कोई हवा का झोंका है, जो सुकून देगा। उनकी जिंदगियों को बदल देगा। वे सिर्फ तालियां बजाने नहीं आए हैं। वे अपने हालातों को बदलने आए हैं।जिन लोगों को कुछ मिला है उनके लिए ये क्षण इसलिए अधिक कीमती हैं, क्योंकि ये मुट्ठीभर लोगों के हिस्से में आते हैं। हजारों लोग कागज का कटोरा फैलाते हैं, जूतियां घिस जाने तक दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं। चापलूसी करते हैं, शब्दों से उनके हाथ-पैर दबाते हैं। तब जाकर ही तो कुछ लोगों के नसीब में वजीफे आते हैं। इसलिए वे कागज के हर टुकड़े ही कीमत जानते हैं। पसीने से सींचे हुए दस्तखत का मतलब पहचानते हैं।

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उन सब के जानिब से एक ही दुआ करना चाहता हूं कि ये मुट्ठियां और बढ़ें। खिड़कियां खुलें, ताजा हवा आए। बेदम होती उम्मीदों को फिर नए पंख मिले। बहुत मासूम हैं, जरा सी बात पर नाराज होते हैं, जरा सी खुशी में फैल जाते हैं। हम फैलकर बिछ जाने को तैयार हैं। इन दामन पर चुनिंदा ही सही सितारे बिखेर दो।

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