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विश्व हिंदी सम्मेलन तो कर लिया, हिंदी की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है- मणि गुप्ता की टिप्पणी….

Posted on: 17 Sep 2018 21:56 by krishnpal rathore
विश्व हिंदी सम्मेलन तो कर लिया, हिंदी की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है- मणि गुप्ता की टिप्पणी….

हिन्दी साहित्य 150 रुपये किलो” ये वाली तस्वीर लगभग आज सबने शेयर की है। सबको बहुत अफ़सोस हो रहा है कि साहित्य रद्दी के भाव सड़क पर बिक रहा है पर मुझे कोई अफ़सोस नहीं हो रहा…अगर यह दुकान लखनऊ शहर में होती तो मैं अभी जाकर कम से कम दस किलो किताबें खरीद लाती। देश और समाज के आज हालात हो रहे हैं ऐसे में हर भाषा, हर जॉनर, हर टॉपिक की किताबें मुफ्त में उपलब्ध होनी चाहिए…जगह जगह स्टॉल लगे होने चाहिए जैसे पान की गुमटी हर दो कदम पर मिलती है ठीक किताबों की ऐसे ही गुमटी होनी चाहिए…मनपसंद किताब उठाओ, पढ़ो वापस स्टॉल पर रख दो वरना घर लिए जाओ…

आज कल लोगों में किताबें पढ़ने का शौक़ नगण्य हो चुका है। सब मोबाइल, टीवी, कम्प्यूटर में घुसे रहते हैं। मैं खुद भी दिनभर मोबाइल में घुसी रहती हूँ… बहुत कोशिश करती हूं, मन को लाख क़ाबू करती हूं तो किताबें उठाकर पढ़ पाती हूँ। आज के समय मे जीवनशैली इतनी अस्त व्यस्त और विलासी हो गयी है कोई भी चाह कर किताबों पर ख़र्च नहीं कर सकता। जीवन जीने के तौर तरीकों में इतना बनावटीपन और दिखावा हावी है कि हम किताबों के अलावा सब खरीदते हैं क्योंकि किताबें आपके मानसिक स्तर को तो ऊंचा करती है लेकिन आपके दिखावटी जीवन स्तर को ऊँचा उठा पाने के समर्थ नहीं हैं।

हमारी ही मानसिकता में कमी है क्योकि हाथ में किताब पकड़ा हुआ व्यक्ति हमें बेफकूफ (चूतिया लिखकर हटा दिया) और मोबाइल-लैपटॉप पकड़ा स्मार्ट लगता है। हम स्वयं पढ़ने लिखने वालों से ज़्यादा बोलने वाले को तवज्जो देते हैं। । क्योंकि जो पढ़ेगा वो बोलेगा… इतनी महंगाई में आदमी रोटी खरीदे कि किताबें? अपने आप में बड़ा प्रश्न है। अगर हिन्दी साहित्य की बात करें तो लेखक और पब्लिकेशन हाउस किताबों को इतना मंहगा रखते हैं कि आम आदमी किताबें खरीद ही नहीं सकता।

लेकिन फिर भी इतनी विषमताओं के बावजूद देश में किताबें बिक रही हैं…और बड़े पैमाने पर बिक रही हैं… क्या हुआ जो 150 रुपये किलो बिक रही है, लोग कम से कम किताबें पढ़ तो रहे हैं। किताबों के इतना सस्ता होने पर अफ़सोस नहीं बल्कि खुशी होनी चाहिए… क्योंकि सस्तेपन के कारण ही सही लोग किताबें उठाकर पढेंगे तो। क्योंकि जो समय चल रहा है ऐसे में मुझे वाक़ई डर है और आशंका भी है कि किसी दिन कोई टीवी पर आकर सारी किताबों को निष्क्रिय कर सकता… लाइब्रेरियों में ताला लगवा सकता है। इसलिए जितना हो सके किताबें पढ़ ली जाय..

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