सत्ता और प्रतिपक्ष के स्वर आम आदमी के जीवन दर्शन से जुदा हैं | The voices of power and opposition are different from the life of a common man

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70 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस अधिवेशन में कहा था कि राष्ट्र का इतिहास किसी एक चुनाव से नहीं बनता, वह बनता है वहां के लोगों के जीवन मूल्यों से…प्रतिपक्ष की हार पर उन्होंने सबक सीखने का संदेश देते हुए कहा था कि कोई राजनीतिक दल अपने लोकतांत्रिक इतिहास में चुनाव(election) हार जाए, इससे उसके लक्ष्य मार्ग पर प्रभाव नहीं पडना चाहिए, बल्कि हार से सीखते हुए आम लोगों से जुड़कर सत्ता के माध्यम से सेवा प्राप्ति का लक्ष्य पाना चाहिए, यह बात आज के राजनीतिक वातावरण में सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच कर्कश संवाद को लेकर सीखने के लिए काफी है।

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राहुल गांधी(RahulGandhi) की कांग्रेस जोकि आज नेहरू के बाद चौथी पीढ़ी द्वारा संचालित है अपने पूर्वजों की बात कर 2014 में पराजय से सीखती तो उसे चौकीदार चोर के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरने की जरूरत नहीं होती, चुनाव पराजय किसी भी राजनीतिक दल के जीवन में आती रहती है, यह अलग बात है कि स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस(congress) की अग्रणी भूमिका की वजह से और उसके पुण्य के बल पर वह लगातार देश पर राज करती रही है। नेहरू जी ने सही कहा था कि आम आदमी के जीवन मूल्यों से इतिहास बनता है, गरीबी हटाओ के नारे से लेकर गरीब आदमी के खाते में प्रतिवर्ष 72 हजार रुपए देने के वादे तक कांग्रेस की सरकारों ने यदि भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी प्रशासन दिया होता तो आज उन्हें सत्ता प्राप्ति के लिए इस सस्ते रास्ते की जरूरत नहीं होती।

चुनाव से पहले किसी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र में कही गई बातें, आने वाली सरकार यदि उनको जनता सत्ता सौंपती है तो कैसे चलेगी, इसका दर्शन होता है, यदि कांग्रेस सत्ता में आ जाती है तो गरीब के खाते में 72 हजार रुपए साल पहुंच जाएंगे और जिनकी मासिक आय आज यदि छह हजार रुपए है तो वह काम क्यों करेगा? क्योंकि उसका आज भी इसी आय पर जीवन यापन हो ही रहा है।

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सवाल जीवन यापन का नहीं है, सवाल जीवन दर्शन का है, एक ऐसा जीवन दर्शन जिसमें वह किसी के फेंके गए टुकड़ों पर दो जून रोटी ना पाकर स्वाभिमान की जिंदगी जिए, गरीब के सत्व और स्वाभिमान को राजनीतिक कुटिलताओं ने कभी सस्ती थाली, टेलीविजन, स्कूटी और पता नहीं क्या क्या प्रलोभन से नीलाम किया है, जब तक राजनीति आम आदमी को खैरात देने पर चलती रहेगी और नेहरू के जीवन दर्शन भाव की उपेक्षा करती रहेगी, तब तक गरीबी इस देश से जाने वाली नहीं है।

चुनावी मैदान में कर्कश संवादों के बीच जो कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(pmnarendramodi) के मुखारविंद से भी निकल रहा है, वह भी प्रधानमंत्री की गरिमा को कतई नहीं बढ़ाता। राजनीति के कलुषित वातावरण और चुनाव को गालियों का विशेषण देने वाले भाषणों के बीच राजनीति वोट पाने के लिए देशद्रोह कानून समाप्त करने की बात तक आ गई है। यही नहीं आतंकवाद से जूझते जम्मू कश्मीर को अफस्पा कानून से मुक्त करने के वादे भी किए जा रहे हैं। कांग्रेस का यह वादा जम्मू कश्मीर के लिए किया गया दिखाई देता है पर एक वर्ग विशेष को देशभर में वोट बनाने की लालसा इसके पीछे छिपी है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को लेकर सत्ता और प्रतिपक्ष के भिन्न स्वर देश की सेहत के लिए अच्छे नहीं है। किसी को ये स्वर चुनाव जिता और हरा सकते हैं पर दुनिया के सामने राष्ट्रीय एकता को खंड-खंड करते यह स्वर हमारी कूटनीति और सामरिक ताकत को भी कमजोर करते हैं। नेहरू से लाख असहमत हो नरेंद्र मोदी, लेकिन गरीब को चूल्हे, गरीब को मकान, गरीब को बिजली और गरीब के जनधन खातों के साथ संबल बनाने की उनकी योजना गरीब के जीवन दर्शन को बदलती जरूर लगती है। यही नेहरू का जनदर्शन भाव था। राहुल गांधी और उनकी पूरी कांग्रेस आत्मावलोकन करे कि 2014 की पराजय के बाद उनके घोषणा पत्र में अपने पूर्वजों के स्वर क्यों नहीं सुनाई देते?

-सतीश जोशी

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