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भरी जवानी में सरवटे बस स्टेण्ड होगा जमींदोज तो फिर निर्माण कार्यों की उम्र कौन बताएगा, महावीर अग्रवाल जी की टिप्पणी

Posted on: 19 May 2018 06:45 by krishna chandrawat
भरी जवानी में सरवटे बस स्टेण्ड होगा जमींदोज तो फिर निर्माण कार्यों की उम्र कौन बताएगा,  महावीर अग्रवाल जी की टिप्पणी

मन्दसौर। यह आश्चर्य की बात है। ताज्जुब है, यह पढ़कर की इंदौर के मात्र 42 वर्ष पुराने सरवटे बस स्टेण्ड को किया जाएगा जमीदोज। यह भी स्थिति तब सामने आई जब इंदौर नगर निगम के आयुक्त आशिषसिंह ने सरवटे बस स्टेण्ड का निरीक्षण किया। 1973 में जब यह बस स्टेण्ड इंदौर शहर के मध्य बनकर जनता के उपयोग के लिये शुरू हुआ था तब इसकी भव्यता व इस इमारत की गुणवत्ता की शान में कसीदे पढ़े गये थे। भारत का तकनीकी ज्ञान यदि महज 40-42 वर्ष की गुणवत्ता का है तो इस देश की प्रगति में चार चांद लग भी पाएंगे या मांत्र इतने वर्षों के निर्माण तोड़े जाते रहेंगे। भारतीय इंजीनियरिंग के इतिहास में इस जवान भवन को जमीदोज किया जाना यह वे ही तय करे। जनता के धन की बर्बादी जनता खुद देखेगी। मंदसौर में भी उसी दौरान का नेहरू बस स्टेण्ड बना था। जिसे कुछ वर्षों पूर्व जनता के लिये अनुपयोगी बताकर उसे तोड़कर उसे आज के स्वरूप का नया दो मंजिला बस स्टेण्ड खड़ा है।

ऐसा लगता है कि देश के लोकतंत्र के दो पहिये मनमाने तरीके से चल रहे है। इन्हें रोकने वाला अभी तो कोई माई का लाल नजर नहीं आ रहा है। नेता और अधिकारी लोकतंत्र के नाम पर बेलगाम है। कही ग्रीन बेल्ट में कॉलोनियों और. निर्माण कार्यों की अनुमति दे दी जाती है, तो कही जल संवर्धन के देश में सबसे बड़े स्त्रोतों तक की सीमाओं को छोटे करने के गुपचुप तरीके से कागजों पर निर्णय दे दिये जाते है। कहीं गंदे नालों पर कॉलोनियां काट दी जाती है तो कही जीनिंग फेक्ट्रीयों को लीज पर दी गई जमीनों पर कॉलोनियों काट दी जाती है। गांधी सागर बांध में मिट्टी बहकर नहीं जाए इसके लिये केन्द्र ने अलग से विभाग बनाकर वर्षों तक उसके माध्यम से इतनी राशि खर्च कर दी कि दो-तीन गांधीसागर जैसे बांध बनकर तैयार हो जाते पर  मिट्टी बहकर जाने से नहीं रोक पाये। ये मात्र ऐसे उदाहरण जो लोकतंत्र के दो पहियों की मनमानी को उजागर जरूर कर रहे है लेकिन कौन इनका क्या बिगाड़ लेगा। आखिर निर्णय लेना और मूर्तरूप देना दोनो ही तो इनके हाथो में है।

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यह सुनकर जानकारों और देशप्रेमियों, समाजसेवियों को बड़ा दुख हुआ होगा जब उन्हें पता चला होगा कि उनकी आंखों के सामने लाखों की कीमत से सुंदर बना सरवटे बस स्टेण्ड अब मांत्र 42 वर्षों में इतना घटिया निर्माण कार्य साबित हुआ कि उसे जमींदोज किया जाएगा। यह तो भला हो निगम आयुक्त आशीषसिंह का कि उन्होंने इस बस स्टेण्ड का निरीक्षण कर स्थिति को जान लिया। वरना कब क्या स्थिति बनती है यह एमएस होटल के दृश्य को सामने रखकर जो कुछ कहा वह इस भवन के लिये जरूरी माना जा रहा है।

इंदौर का सरवटे बस स्टेण्ड जब बना तब क्या सीमेंट गुणवत्ता पूर्ण नहीं आ रही थी या जो आ रही थी उसकी उम्र इतनी ही होती थी । यदि इतनी ही थी तो उस समय जनता को क्यों नहीं बताया गया। जनता की ओर फिर गरीब जनता की कड़ी मेहनत की कमाई को क्या इसी प्रकार ढहाया जाता रहेगा। तो वास्तव में इस देश की आजादी की उम्र 100 वर्ष हो जाएगी तब भी यह अपनी प्रगति के झंडे पश्चिम के देश हो या चीन के सामने नहीं गाढ़ सकेगा। अब मैं यहां भारी कमीशन खोरी भ्रष्टाचार की चर्चा तो नहीं कर रहा हॅू क्योंकि इसके बिना एक निर्माण कार्य भी खड़ा कर उदाहरण अभी तक तो पेश हुआ नहीं बल्कि इस सबके बावजूद मात्र 42 साल की भरी जवानी में सरवटे बस स्टेण्ड को जमींदोज करने की बात सामने आई है।सरवटे बस स्टैंड इंदौर के लिए इमेज परिणाम

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मध्यप्रदेश में राज्य परिवहन निगम की बसों का कुशलता पूर्वक संचालन नागरिकों की बेहतर सेवा का उदाहरण बनी हुई थी। राज्य परिवहन निगम की बसों से सरवटे बस स्टेण्ड कभी सुशोभित होता था वहीं अब निजी बसों की सेवा के लिये खड़ा है। नागरिकों को उस समय से लेकर कुछ वर्षों पूर्व तक निजी बस मालिकों की ज्यादतियों से लोकतंत्र के नेताओ ने बचाये रखा था लेकिन यकायक राजनीति के दिग्गजों को पूरा लाभ पहुंचाने के लिये परिवहन निगम की बसे बंद की गई या ये शासन से बेलगाम हो गई थी यह वे नेता ही जाने लेकिन वर्तमान में निजी बस मालिकों की ज्यादतियों, मनमानियों, भारी ओव्हरलोडिंग या यात्रि बसों की दशा मालवाहन वाहनों के रूप में संचालन की जो छूट देकर नागरिकों के साथ छल कपट व परेशानियां खड़ी कर रखी है वह देश में एक उदाहरण है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जनता व देश हित के निर्णय लेते है किन्तु लगता है वे भी ऐसे नेताओं के सम्मुख मजबूत दिख रहे है। यह तो ठिक है विपक्ष को क्या हो गया। क्या वह केवल सत्ता की कुर्सी चाहता है। विपक्ष ने भी कभी राज्य परिवहन निगम की बस सेवा शुरू करने की मांग तक नहीं की। आखिर क्यों ? तो फिर यह सरवटे बस स्टेण्ड जैसे और भी बस स्टेण्ड अब निजी बस मालिकों के लिये शोभायमान होंगे।

जी बात है उस सुंदर सरवटे बस स्टेण्ड की जो कभी इंदोर नगर की शान के रूप में तैयार हुआ था लेकिन उस समय उसकी उम्र नहीं बताई गई थी लेकिन अब जो बनेगा उसकी उम्र भी बताई जाएगी या नहीं यह भारतीय इंजीनियरिंग का ज्ञान ही जाने। लेकिन इस देश के सम्मुख वह प्रश्न यक्ष खड़ा है जो आजादी के पूर्व बने बड़े भवन शान से आज भी बेबाक रूप से अपने गुणगान आज के तकनीकी ज्ञान को बता रहे है। क्या यह गलत है या आज के भवन निर्माण का ज्ञान सही है। बड़े बड़े महल, किले कितने शान से आज की तकनीकी ज्ञान को ललकार नहीं रहे है। हमारे देश में 500 वर्षों की गुणवत्ता का इंजीनियरिंग ज्ञान कब मूर्त रूप लेगा या यह ज्ञान तो उनकी डिस्शनरी में ही नहीं। हम जितेंगे तभी हम तेजी से विकास के कामों को मूर्त तभी दे सकेंगे जब 500 वर्षों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर 500 वर्षों की गुणवत्ता निर्माण कार्यों को करने में सफल होंगे। वर्ना तो देश की जनता की मेहनत की कमाई से चंद कमीशन खोर व भ्रष्टाचारी अपनी जेबे भरकर बाजार में चकाचौंध पैदा कर अव्यवस्था फैलाते रहेंगे और लड़खड़ाता लोकतंत्र ऐसे ही चलता रहेगा।

जब सरवटे बस स्टेण्ड राज्य परिवहन निगम की बसे जनता को भरपूर सेवा दे रही थी। उसी दौरान प्रदेश में ओर कई बस स्टेण्ड भी बने। उसमें मंदसौर व नीमच का बस स्टेण्ड भी है। मंदसौर के नेहरू बस स्टेण्ड को तोड़कर नया बस स्टेण्ड कुछ ही वर्ष पूर्व बना लेकिन यह बस स्टैण्ड जनता के लिये कितना उपयोगी या वह पुराना कितना नालायक हो गया था यह सत्ता की राजनीति ही जाने। निर्माण कार्यों को लेकर देश दुःखी है, परेशान है, करोड़ों-अरबों रूपये इन पर खर्च हो रहा है लेकिन न तो इनकी उपयोगिता की उम्र बताई जा रही है और न ही बनाने के पूर्व उस निर्माण कार्य की उम्र 500 वर्षों की उपयोगिता को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है। ताजा उदाहरण मंदसौर को पेयजल प्रदान करने वाले काला भाट बांध की दशा ही देख लो। करोड़ों रूपये लागत से बने इस बांध के बनने के समय बताया गया था कि मंदसौर नगर की जनता को 25 वर्षों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर यह बनाया गया है। लोग खुश हुए चलो अब नलों से दोनों समय पानी मिलेगा ही। साथ ही 40 वर्ष पूर्व जिस प्रकार से दूसरी और तिसरी मंजिल पर पानी नलों से होकर पहुंच जाता था वैसा दृश्य अब फिर उपलब्ध होगा। वह सब धारणाएं पहले वर्ष में काफूर हो गई और किसने क्या कर लिया क्योंकि लोकतंत्र के दोनों पहिये के हाथों में जो है यह। अब फिर नये स्त्रोत की तलाश की गई और करोड़ों रूपये इस पर खर्च हो गये। फिर चर्चा में सुना योजना के पाईंट की जगह सही नहीं चुनी गई। लो फिर मंदसौर की जनता का पर्याप्त पेयजल का सपना अभी तो सपना ही है। देखो आखिर कब कोई परिवर्तन भ्रष्टाचार व कमीशन खोरी पर आता है या यह बेलगाम सत्ता-विपक्ष के लिये कमाऊपूत बना रहेगा।

अब सरवटे बस स्टेण्ड की जगह कौन सा किस प्रकार का कितने वर्षों की उपयोगिता का बस स्टेण्ड बनेगा यह उसका चित्रण सामने आने पर पता चल सकेगा।

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