लोकसभा चुनाव के परिणाम ने परिवारवाद के वृक्ष की जड़ों को झकझोर कर दी एक नई दिशा

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pm narendra modi

एन के त्रिपाठी-

मोदी 2.0 की श्रृंखला की यह आखिरी कड़ी है। पूर्व में Modi as a political leader, जातिवाद का चुनाव में घटता प्रभाव, Predicament of Indian Muslims एवं The economic front पर अपनी बात कह चुका हूं। 2019 के चुनाव के कुछ सार्थक बिंदुओं की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा।

इस चुनाव के परिणाम ने परिवारवाद के वृक्ष की जड़ों को झकझोर कर एक नई दिशा दी है। परिवारों के लिए प्राइवेट कंपनी बनी पार्टियों कांग्रेस,सपा,राजद को करारा झटका लगा है। गनीमत है कि तमिलनाडु में परंपरागत राजनीति के फलस्वरूप DMK के स्टैलिन को भारी सफलता मिली है तथा दूसरी तरफ आँध्र प्रदेश के जगन रेड्डी एवं ओडिशा के BJD के नवीन पटनायक ने स्वयं के परिश्रम से विजय प्राप्त की है। सबसे अधिक दयनीय स्थिति राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की हुई है जो इस बार अपनी पराजय के लिए कोई कारण भी नही ढूंढ पा रही है।

2014 में हार के लिए UPA II के घोटालों का महत्वपूर्ण स्थान था परन्तु इस बार कोई ऐसा कारण पार्टी बताने में असमर्थ है। सीधी बात है कि इस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अर्थात राहुल गांधी एवं उनकी सहायता में आईं प्रियंका गांधी कार्यकर्ताओं और देश की जनता को उत्साहित करने में असफल रहे हैं। मोदी चोर है का नारा बुरी तरह से विफल रहा है। कांग्रेस अब एक ऐसी कंपनी बन चुकी है जिसमें राजनीतिक प्रतिभा को पनपने का कोई अवसर संभव ही नहीं है। फिर भी देश को सशक्त विपक्ष की आवश्यकता होने के कारण आज भी आशा है कि यह पार्टी परिवारवाद को दरकिनार करके एक ऊर्जावान राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देश की सेवा के लिए आगे आएगी।

विपक्षी पार्टियां क्षत विक्षत हो चुकी हैं। कांग्रेस अपने परम्परावादी क्षेत्रों से विलुप्त हो चुकी है।सपा बसपा गठबंधन टूट चुका है तथा बिहार का गठबंधन छिन्न भिन्न हो गया है। लेफ्ट का देश से लगभग सफाया हो चुका है तथा बंगाल में ममता का मायावी तिलस्म मद्धिम पड़ चुका है। जो क्षेत्रीय दल बचे हैं वे केंद्र के साथ तालमेल की आशा में घूम रहे हैं। तथाकथित वाम पंथी एवं मध्यमार्गी उदारवाद एवं धर्मनिरपेक्षता के महानायक लुटियन दिल्ली के ख़ान मार्केट में अपना नया संदर्भ ढूंढ रहे हैं।

मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकार की पुनर्स्थापना से भारत को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी साख बढ़ाने में काफी सहायता मिलने वाली है। विदेश नीति में निरंतरता का लाभ भारत को मिलेगा।मोदी की कुछ सफल तथा कुछ असफल योजनाओं को जारी रखने का अवसर मिलेगा। अल्पसंख्यकों से बहुत दूर BJP को हिंदू धर्म की सभी जातियों को साथ लेकर चलने की राजनीतिक बाध्यता होगी। वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए BJP को सभी जातियों विशेष कर निम्न जातियों का विश्वास बनाए रखना होगा तथा गुजरात के ऊना जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना होगा। मुस्लिम वोट बैंक के बिना सशक्त बहुमत पाने में सफल BJP को इस बात के लिए सतर्क रहना होगा कि मुस्लिमों के साथ पूरा न्याय हो तथा वे अपने को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग न कर लें।मुस्लिम समाज में सुधार लाने का अति उत्साह भयावह सिद्ध हो सकता है।

मोदी और अमित शाह भारत में चुनाव जीतने का सफल मंत्र भली भाँति समझ चुके हैं। पहला मंत्र है विकास। विकास की बातें करते रहना और में यथासंभव प्रयास करते रहना उनकी मुख्य नीति होगी। आर्थिक विकास के लिए कठिन परिश्रम भी किया जाएगा।बजट के माध्यम से तथा अन्य नीतिगत कदमों से जैसे मॉनिटरी पॉलिसी,बैंकिंग तथा NBFC में सुधार , NPA का और बेहतर मैनेजमेंट, कुछ पब्लिक सेक्टर का डिसइनवेस्टमेंट आदि के द्वारा वित्तीय प्रवाह बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन इन प्रयासों से केवल आंशिक सुधार ही हो पाएगा। किसी बड़े परिवर्तन के लिए लेबर तथा भूमि कानूनों में सुधार के अतिरिक्त और कोई अन्य मार्ग उपलब्ध नहीं है। इन सुधारों को लाने से सरकार सूट बूट की सरकार कहलाएगी और उसे कुछ राजनीतिक क्षति भी हो सकती है। परन्तु ये सुधार ळक्च् को 9 से 10 फिसदी तक ले जा सकते हैं। यह भी संभव है कि विपक्ष सरकार को कोई भी अच्छा काम न करने देने की अपनी नीति के अंतर्गत राज्यसभा में पूर्ण अड़ंगा लगा दे। व्यक्तिगत रूप से मुझे बड़े सुधारों की संभावना प्रतीत नहीं होती है।

मोदी सरकार का दूसरा मंत्र राष्ट्रवाद के रूप में चलता रहेगा।राष्ट्रवाद हिंदू मानसिकता को बहुत सुख पहुँचाता है। पुलवामा और बालाकोट जैसी घटनाओं से वोटों की बरसात होते देख चुकी मोदी सरकार पाकिस्तान के प्रति और कश्मीर में और कठोर नीतियां अपनाएगी। अंतिम मंत्र के रूप में मोदी सरकार मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों को सीधे लाभ पहुँचाने वाली योजनाओं को और सक्षम तरीके से चलाने का प्रयास करेगी जिसका विवरण मैं पहले दे चुका हूँ। सभी घरों को नल का पानी पहुँचाने की घोषणा कर के मोदी ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिये है।

मोदी अपना काम तो निष्ठा से करते रहेंगे परंतु उन्हें नियंत्रित करने के लिए मीडिया,विपक्षी पार्टियां एवं सिविल सोसाइटी के लचर हो जाने के कारण नोटबंदी तथा सामाजिक विद्वेष जैसी परिस्थितियों की नियति बनी रहेगी।

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