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ये प्रतिक्रिया की पराकाष्ठा है “साहब”

Posted on: 04 Jul 2019 09:07 by Mohit Devkar
ये प्रतिक्रिया की पराकाष्ठा है “साहब”

भोपाल: कल साहब ने प्रतिक्रिया दी। साहब सुप्रीम हैं, लेकिन पत्रकारिता में मेरे बड़े भाई राघवेंद्र सिंह जी ने कई साल पहले कहा था- भाजपा वो बिल्ली है जो अपने बच्चे को खाती है। भाईसाब की वो बात अब पूरी तरह सच लग रही है। साहब सर्वोच्च पद पर हैं। नैतिकता और ईमानदारी की तमाम मिसालें है, लेकिन कई बार व्यक्ति खुद की बात को जस्टिफाई करने किसकी बलि ले लेता है, समझ नहीं पाता। साहब भी इंसान है। उनसे भी यही भूल हुई।

मैंने मप्र की राजनीति को बहुत बचपन से देखा है और करीब से भी। शिशु मन्दिर में नैतिकता, सच ओर ईमानदारी के इतने पाठ पढ़ें की आज की दुनिया मे Practical य professional नहीं बन पाया। खैर बात साहब की। आकाश के बल्ले की बात साहब दिल पर ले गए। साहब आपका फीडबैक चैनल ठीक काम नहीं कर रहा। पूरे मप्र में कैलाश विजयवर्गीय ही वो नेता है, जिन्होंने पार्टी य विचार के लिए हर चुनौती को स्वीकार किया। जब कांग्रेस 1980 के दशक में जादू विखेर रही थी, तब नंदा नगर में एक मजदूर का बेटा वार्ड स्तर से उसका तिलिस्म तोड़ने की कोशिश कर रहा था। सुरेश सेठ ओर महेश जोशी के खिलाफ इंदौर में तत्कालीन संगठन मंत्रियों को ऊर्जा नजर आई तो कैलाश में। इंदौर प्यारेलाल जी के जिम्मे ही था। पहले इंदौर 4,फिर 2 फिर महू।

कैलाश हर उस सीट पर चुनाव लड़े जो कांग्रेस का गढ़ थी। हर लहर में हारने वाली महू भी उस व्यक्ति ने खुद के लिए चुनी। अभी उनका बेटा इंदौर 3 से जीता, लेकिन “साहब” 2003 की लहर ओर 2008 की आंधी में भी यह सीट कांग्रेस के पास थी। यहीं से उसने अपने बेटे को लड़ाकर चुनौती स्वीकार की। वह भी तब जब पूरी मप्र भाजपा के नेता खुद के लिए य अपने छर्रो के लिए सुरक्षित सीट तलाश रहे हों।

मुझे लगता है बेटे को चुनोती पूर्ण सीट से चुनाव लड़ाने से ज्यादा खराब बात ये है कि कम्बल ओढ़कर बेटों के भविष्य के लिए भ्र्ष्टाचार किया जाए। आप कहते रहे हैं न न खाऊंगा न खाने दूंगा। मप्र में नजर डाल लीजिये। 2003 से अब तक। कितने जमींदार के बेटे थे, अब उनकी आर्थिक हालत देख लीजिए। मप्र भाजपा के हर नेता का बेटा उद्योगपति है। खैर … आप ये भी पता कर लीजिए कि आपकी पार्टी में पार्षद से लेकर विधायक और सांसद के टिकिट बेचे जा रहे हैं। यदि ये फीडबैक आपतक नहीं पहुंच रहा तो आपका इंटेलीजेंस ठीक काम नहीं कर रहा। सिस्टम दुरुस्त करने की जरूरत है, देश ओर विचार के लिए।

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