सबसे गरीब प्रत्याशी हैं सीकर के स्वामी सुमेधानंद सरस्वती | The poorest candidates are Sikandar Swami Subodhannand Saraswati

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राजनीति में संतों का आगमन हमेशा से ही चर्चा का केंद्र रहा है। इन्हें आना चाहिए या नहीं यह बहस भी कभी खत्म होने वाली नहीं। बहरहाल राजनीति का मैदान पकड़ने वाले हर संत का अपना रंग है। साध्वी उमाश्री भारती 2003 में ही मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बन गई थीं तो योगी आदित्यनाथ ने दो साल पहले उत्तर प्रदेश की कमान संभाली। अनेक साधु-साध्वी केंद्रीय मंत्रिमंडल की और राज्यों के मंत्रिमंडलों की शोभा बढ़ा चुके हैं।

ऐसे ही एक साधु हैं सुमेधानंद सरस्वती। फिलवक्त राजस्थान के सीकर से सांसद हैं और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें वहीं से दोबारा प्रत्याशी बनाया है। उनकी सकल संपत्ति पचास हजार रुपए तक भी नहीं पहुंचती। पिछले चुनाव के नामांकन पत्र के साथ तो उन्होंने महज ३४ हजार ३११ रुपए के दस्तावेज दाखिल किए थे। मूलतः रोहतक (हरियाणा) में जन्में स्वामी सुमेधानंद २३ साल से यहां बसे हैं औऱ उन्होंने बीते चुनाव में कांग्रेसी प्रताप सिंह जाट को ढाई लाख से कुछ कम मतों से परास्त किया था। करीब 2.39 लाख वोटों से हराया था। इतनी कम संपत्ति के बारे में सवाल किया जाए तो जवाब मिलता है- मैं संन्यासी हूं। मेरी कोई प्रॉपर्टी, जायदाद, परिवार कुछ भी नहीं है।

सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते मेरी कोई उम्मीदें नहीं है और न ही मुझे पैसों की जरूरत है। मुझे सिर्फ एक जोड़ी कपड़ों और पर्याप्त भोजन की जरूरत है। जब मुझे जरूरत होती है तो लोग मुझे एक जोड़ी कपड़े दे देते हैं। चुनाव भी मैं अपने समर्थक और पार्टी कार्यकर्ताओं की मदद से लड़ता हूं। वे जितना कर सकते हैं, मुझे सहयोग करते हैं। स्वामी आर्य समाज के सदस्य हैं और सीकर के ही पिपरैली गांव में एक वैदिक आश्रम में मामूली जीवन बिताते हैं। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में उनका मुकाबला कांग्रेस के सुभाष महरिया के साथ होगा। उन्हें बीते चुनाव में करीब १.८९ लाख मत बतौर निर्दलीय प्रत्याशीमिले थे। वे यहीं से २००४ में भाजपा सांसद थे और २००९ में पराजित हो गए थे।

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