Breaking News

कमल गुप्ता विश्व बंधु की कविता | The poem of Kamal Gupta vishwa bandhu

Posted on: 09 Apr 2019 11:54 by shivani Rathore
कमल गुप्ता विश्व बंधु की कविता | The poem of Kamal Gupta vishwa bandhu

यारबाज है वो छोड़कर अपने आते है दौलतखाने।
आते ही यारोँ के बिछ जाती है जाजम,सज जाती है महफिल,

मय मयस्सर हो मुकामें मुकीम को तो नही जाते है मयखाने।
मेजबान का तो काम है, पेश आप करें कई लज़ीज़ खाने,

मेहमान जो लगाम नही देते जुबान को,बार बार जाते हैं तारतखाने।
जिन्दगी खुशहाली से जीना हो तो संभलकर जीये,

बेतरतीब जीने वाले के लिये ही खोले जाते है सफ़ाखाने।
आदमी बेवकूफ बनता है, शीशा, शोहरत और औरत के सामने,
जिन्हें जान जहाँन और जिन्दगी की समझ नहीं वही जाते है पागलखाने।

कमलगुप्ता “विश्वबंधु”

 

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com