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देश के भविष्य का सबसे निर्णायक चुनाव | The most decisive election of the country’s future

Posted on: 05 Apr 2019 13:45 by Mohit Devkar
देश के भविष्य का सबसे निर्णायक चुनाव | The most decisive election of the country’s future

आलोक श्रीवास्तव की कलम से

जनता ने तय कर लिया है। अब किसी प्रचार, टीवी, अफवाह का कोई असर नहीं पड़ना है। शहरी मध्यवर्ग के बाहर भारत के किसान, मजदूर, युवा, आमजन इस बात को भली-भांति जान चुके हैं कि यह चुनाव भारत के भविष्य को और प्रकारांतर से उनके भविष्य को तय करने वाला है। यही एकमात्र मुद्दा है। दूसरा कोई मुद्दा नहीं है।

कोई कांटे की टक्कर नहीं, कोई रणनीति कोई गणित काम नहीं आएगा। यह ठीक 1977 की सर्दियों का माहौल है, सत्ता को पता भी न था, कि लोगों ने मन बना लिया है और जब नतीजे आए तो सत्ता और विपक्ष दोनों हैरत में थे कि इतना बड़ा उलट-फेर। 2019 का यह चुनाव राजनीतिक पार्टियों के हाथ से निकल चुका है, वे जो कुछ भी आने वाले दो महीनों तक करेंगे, वह सिर्फ एक खानापूरी है।

हम भारत को जिन स्रोतों और माध्यमों से जानते हैं, उसकी पहुंच से परे इस देश का वह अंतर्मन है, जो इतिहास की हर चोट के बाद खुद को संजोता है और नए सिरे से उठ खड़ा होता है। भारत फिर खड़ा हो रहा है, विश्व-इतिहास की सबसे खतरनाक फासिस्ट शक्तियों के खिलाफ!

यह चुनाव आजादी के बाद के भारत का सबसे बड़ा चुनाव साबित होने जा रहा है, और मई के बाद भारत की राजनीति और सत्ता कतई वह नहीं रह जाएगी, जो ठीक अब तक थी।

भारत के लोग, जिन्होंने साम्राज्य को उठा फेंका और जब भी इतिहास ने उनकी देहरी पर दस्तक दी, अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद उसका ठीक प्रत्युत्तर देने से वे चूके नहीं, फिर एक बार इतिहास के ऐन सामने हैं, उन्हें यह पता चल चुका है कि यह चुनाव न प्रधानमंत्री का चुनाव है, न पार्टी का, न किसी घोषणापत्र या वायदों का, यह हत्या और जीवन, मानवता और पशुता, सत्य और असत्य, कुंठा और उदारता, बर्बरता और सभ्यता, लूट और ईमानदारी, मेहनत और चोरी… के बीच का चुनाव है, भारत का आम जन यह भी जानता है कि सत्य, उदारता, सभ्यता, ईमान, मेहनत किसी विपक्षी दल की ताकत और खरे होने का मोहताज नहीं है, उसे किसी विपक्षी या विकल्प को नहीं जिताना, सर्वप्रथम तो उसे अपनी पराजय के मार्ग में अवरोध खड़ा करना है, और यह वह करने जा रहा है. पूरे उत्तर भारत से लेकर, दक्षिण, पश्चिम, पूरब तक…
भारत का इतना कुछ कभी दांव पर नहीं लगा था — न महमूद गजनवी के आक्रमण में, न गोरी के अभियानों में, न ब्रिटिश साम्राज्य की जकड़न में और न किसी युद्ध या आपातकाल में…
यह बिल्कुल नई परिस्थिति है. और इसका बिल्कुल नया जवाब जनता देने जा रही है…

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