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परदे का महानायक और पर्दे के पीछे का नायक

Posted on: 25 Jun 2018 14:46 by krishnpal rathore
परदे का महानायक और पर्दे के पीछे का नायक

ज़िंदगी में कभी कभी ऐसे लोग भी मिलते हैं ,जो अपने काम से समाज में नायक का दर्ज़ा खुद ही हासिल कर लेते हैं | उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं होती | समाज आगे बढ़कर उन्हें सलाम करता है | ऐसे ही एक नायक हैं बिहार से आकर दिल्ली बसे पुष्कर पुष्प | दस बरस से भारतीय टेलिविजन पत्रकारिता के सुपरस्टार सुरेंद्र प्रताप सिंह याने एसपी की याद का सिलसिला अपनी दम पर बनाए हुए हैं | रविवार की शाम इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में एसपी की याद का दसवाँ साल | पुराने और नए पत्रकारों और एसपी के चाहने वालों का जमावड़ा | किस किस का नाम लूँ ? मेरे अलावा संतोष भारतीय ,राहुल देव ,सतीश के.सिंह , शैलेश ,अनुरंजन झा ,सईद अंसारी और एसपी के चहेते भाई सत्येंद्र प्रताप सिंह |सच कहूँ तो हर साल इस आयोजन के दिनों में मेरा अपना अपराध बोध और विकराल रूप धारण कर लेता है |

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पुष्कर ने न एसपी को देखा ,न उनके साथ काम किया फिर भी हर साल एकलव्य की तरह यह जोत जलाए हुए हैं | दूसरी तरफ मैं ,जिसने एसपी के साथ उन्नीस बरस एकदम निकट रहते हुए बिताए – कुछ न कर सका | रविवार,नवभारत टाइम्स,देव फीचर्स से लेकर आजतक का साथ | बहुत कुछ उनसे पाया ,बहुत कुछ उनसे सीखा लेकिन उनके जाने के बाद मीडिया के लोगों को उनके बारे में कुछ न दे पाया |हाँ राज्यसभा टीवी में रहते हुए उन पर एक घंटे की फ़िल्म बनाई ,जिसे आप उनकी याद का दिया कह सकते हैं | यह फ़िल्म यू ट्यूब पर आप भी देख सकते हैं | फ़िल्म की प्रति मैंने पुष्कर पुष्प को भी भेंट की ,जिससे वे इसे देश भर में विस्तार दे सकें | मैं भी इस फ़िल्म को क़रीब पचास मीडिया संस्थानों में दिखा चुका हूँ | अफ़सोस ! मीडिया के छात्रों को एसपी और राजेंद्र माथुर जैसे महान संपादकों के बारे में न तो पढ़ाया जाता है और न नवोदित पत्रकार उनके बारे में ज़्यादा जानते हैं | समारोह में सभी ने एसपी की स्मृति और पत्रकारिता के संदेशों पर व्यापक काम की ज़रूरत बताई | चुलबुले किन्तु जीवंत संचालन से निमिष ने पूरे कार्यक्रम में रफ़्तार बनाए रखी |

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उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले के एक छोटे से गाँव पातेपुर में जन्में एसपी हमारे बीच से सिर्फ़ उनचास बरस की उमर में 27 जून 1997 को विदा हो गए | मगर अपनी बीस बरस की पत्रकारिता में उन्होंने जो कीर्तिमान रचे वहां तक हम जैसे लोगों को पहुँचने के लिए कई उमरें चाहिए | केवल दो साल की टेलिविजन पत्रकारिता में उन्होंने जो मापदंड तय किए ,वो आज भी टीवी पत्रकारों के लिए गीता से कम नहीं हैं | बाक़ी आप इस फिल्म के ज़रिए जाने तो बेहतर | चित्र इसी अवसर के हैं |

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