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झांसेबाजी में झूठ का झमेला ‘द फकीर ऑफ वेनिस’

Posted on: 10 Feb 2019 09:55 by Ravindra Singh Rana
झांसेबाजी में झूठ का झमेला ‘द फकीर ऑफ वेनिस’

विनोद नागर

भारत में फिल्में बनाना जितना आसान है उससे कहीं अधिक मुश्किल है उन्हें बगैर किसी झमेले के निधारित समयावधि में पूराकर सही ढंग से प्रदर्शित कर पाना. अपनी फिल्म को हर हाल में सफल बनाने की चाहत निर्माताओं को बॉक्स ऑफिस पर हर हथकंडा अपनाने को विवश करती है. ऐसे में एक ओर जहाँ बड़े बैनर और बड़े निर्माता अपनी फिल्मों को हजारों स्क्रीन पर एक साथ रिलीज़ करने की होड़ में लगे रहते हैं वहीं दूसरी ओर मध्यम और छोटे बजट की अच्छी फिल्में रिलीज़ के मोर्चे पर ही मात खा जाती हैं. न उन्हें मल्टीप्लेक्स में पर्याप्त स्क्रीन और शो ही मिलते हैं न एकल सिनेमाघरों में उनकी वाजिब पूछ परख होती है.

इस शुक्रवार कोई बड़ी फिल्म रिलीज़ न होने से एक साथ कई नई फिल्मों की किस्मत चमकी. हालाँकि एक महीने से उरी और मणिकर्णिका के एक पखवाड़े बाद भी रण क्षेत्र में डटे होने से इस शुक्रवार हॉलीवुड की महँगी फिल्म ‘अलिटा: बैटल एंजल’ को टू डी, थ्री डी और हिन्दी संस्करण के लिये एक छत्र रिलीज़ का मौका तो नहीं मिला अलबत्ता नर्गिस फाखरी की ‘अमावस’ को छोड़कर सपना चौधरी की ‘दोस्ती के साइड इफ़ेक्ट’ और जिमी शेरगिल की ‘एसपी चौहान’ को पर्याप्त स्क्रीन नहीं मिले. सर्वाधिक अधोगति अभिनेता के रूप में फरहान अख्तर की सबसे पहली फिल्म ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ की हुई जिसे रिलीज़ के पहले दिन भोपाल में मात्र दो शो मिले. गौर तलब है कि निर्माण के दस साल बाद भारत में अब जाकर रिलीज़ हुई यह डार्क कॉमेडी फिल्म लॉस एंजलिस के भारतीय फिल्म समारोह में एक दशक पूर्व ओपनिंग सेशन में दिखाई जा चुकी है.

शेक्सपीयर के मशहूर नाटक ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ से प्रेरित यह फिल्म कई कारणों से बॉलीवुड की आम फिल्मों से बिलकुल अलग है. करीब पौने दो घंटे की इस फिल्म में कोई गाना नहीं है. फिल्म का अधिकाँश हिस्सा अंग्रेजी में है और केवल भारतीय पात्रों के आपसी संवाद ही हिन्दी में हैं. फिल्म में वेनिस की अद्भुत खूबसूरती अत्यंत कलात्मक ढंग से उभरकर सामने आई है.

फिल्म की कहानी लेह लद्दाख के पहाड़ी इलाकों में विदेशी फिल्मकारों के लिये एक आज्ञाकारी बन्दर जुटाने वाले क्रू मेम्बर आदि कांट्रेक्टर (फरहान अख्तर) की हिकमत अमली के गुणों से होती है जो मुंबई में रूटीन लाइफ के बजाय नई चुनौतियाँ स्वीकारने में यकीन रखता है. अपने संपर्कों के जरिये आदि को इटली की नामचीन आर्ट गैलरी से भारत की चमत्कारिक हठ योग साधना की रोमांचक अनुभूति कराने के लिये किसी फकीर यानि चमत्कारी बाबा को वेनिस लाने का कॉन्ट्रैक्ट मिलता है, जो शीर्षासन की मुद्रा में अपना आधा शरीर जमीन में गाड़कर सांस रोककर जीवित रहने की कला का प्रदर्शन कर सके. गंगा किनारे अनेक तीर्थ स्थलों पर भटकने के बाद भी आदि को ऐसा कोई योगी तपस्वी हाथ नहीं लगता जो इस प्रयोजन से उसके साथ इटली जाने को तैयार हो.

मुंबई लौटकर इसी उधेड़बुन में जब वह अपनी परेशानी का जिक्र फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट सप्लाई करनेवाले एजेंट अमीन भाई से करता है तो वह उसे मकानों की पुताई करनेवाले एक अधेड़ पेंटर अब्दुल सत्तार शेख (अन्नू कपूर) से मिलवाता है. अभावग्रस्त जीवन जीने वाला सत्तार और उसकी बहन हमीदा बचपन में कभी जुहू चौपाटी पर अपना मुँह कपडे से बांधकर पूरा शरीर रेत में छुपाकर सिर्फ हथेलियाँ बाहर निकलकर लोगों को चमत्कृत कर पैसा इकठ्ठा किया करते थे. उनके इसी तजुर्बे का लाभ उठाकर अपना उल्लू सीधा करने के लिये तेज तर्रार आदि सत्तार को पैसे के बल पर अपने साथ वेनिस ले जाने के लिये राजी कर लेता है.

बीमार और नशे का आदी सत्तार आदि की योजना के मुताबिक वेश बदलकर इटली की आर्ट गैलरी में जमीन के अन्दर अपना शरीर दफ़न करने की कला का प्रदर्शन करने लगता है. इधर आदि चमत्कारी बाबा के रूप में फकीर की असलियत छुपाने के लिये हर तरकीब आजमाता है और सत्तार को लोगों से दूर रखता है. लेकिन कलाप्रेमी युवती जिया (कमल सिद्धू) को दाल में कुछ काला नज़र आता है. नशे की तलब पूरी न होने पर सत्तार एक दिन होटल से भाग जाता है. जिया उसे पनाह देती है. मुँह से खून आने पर पता चलता है कि सत्तार फेफडों की गंभीर बीमारी की चपेट में है और मौत के बुरे सपनो के चलते अब आगे से वह अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर पाएगा. तब आदि प्रायश्चित कर खुद अपने आपको सत्तार की जगह जमीन में दफन होने की पेशकश करता है.

पूरी फिल्म में फरहान अख्तर और अन्नू कपूर की अभिनयजन्य केमिस्ट्री देखने लायक है. चूँकि बीते एक दशक में फरहान कुशल अभिनेता व निर्देशक के बतौर स्वयं को साबित कर चुके हैं पर पहली फिल्म में भी उनका आत्म विश्वास गजब का है. अन्नू कपूर फिल्म में अपने जीवन की सर्व श्रेष्ठ भूमिका में नज़र आते हैं. कनाडाई अभिनेत्री कमल सिद्धू और इटेलियन कलाकार वेलेंटिना कर्नेल्टी सहित अन्य सहायक कलाकार मुफीद हैं. आनंद सुरापुर का निर्देशन और एआर रहमान का संगीत स्तरीय है. निर्देशक ने आर्ट गैलरी में बल्ब की रोशनी में मिटटी से पौधे की तरह निकले मनुष्य के नमस्कार की मुद्रा में जुड़े हाथ के प्रसंगों को फिल्माने में अद्भुत कल्पनाशक्ति का परिचय दिया है. ध्यान योग सिखाने के दृश्य में सत्तार के अचानक नशे में लड़खड़ाकर गिरने, आदि के साथ होटल के एक ही कमरे में रहने, नशे की तलब पूरी न होने पर बिफरने, आर्ट गैलरी के बाद सार्वजनिक स्थल पर मोमबत्तियों के बीच खुदी कब्र में दफ़न होने की कल्पना मात्र से सिहरने के दृश्य लाजवाब हैं.

राजेश देवराज की कहानी, पटकथा और संवाद का स्वाद भी कुछ अलग ही है- लिंग लीला यहाँ की विशेषता है.. हम यहीं बैठकर सारे ब्रम्हांड की सैर करते हैं.. दुनिया चैन से कहाँ रहने देती है.. दफ़न होने के लिये पीना ज़रूरी है.. इसको पीठ का प्रॉब्लम है ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता.. फारेन में ज्यादातर फारेनर ही रहते हैं.. कहते हैं एक बार वेनिस देख लिया तो चैन से मर सकते हैं.. पब्लिक समझ रही है इंडिया से कोई बड़ा संत आया है, तेरा फिल्म फेयर अवार्ड है ये रख ले.. आय मीन समाधि द फाइनल स्टेज ऑफ़ मेडिटेशन.. यहाँ की मिट्टी भारी है तो क्या तेरे लिये जुहू बीच से मिट्टी लेकर आऊँ.. अमेरिका जाकर पढाई करने के लिये पैसे चाहिए मुझे इसलिये तुझे फ़कीर बनाकर लाया हूँ यहाँ.. तेरा टाइम पूरा हो गया है अब तू अपने मरने का इंतज़ार कर.. मरना इतना मुश्किल काम है ये पता नहीं था पहले मुझे.. सत्तार तू जिया के पास यहीं रुक जा वेनिस में, अपना इलाज भी करा लेना..

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक हैं

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