राजनीति और मीडिया के पतन की काली छाया का आईना है ‘आर्टिकल 15’

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क्या आपने अनुभव सिन्हा की बहुचर्चित फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ देख ली है? न देखी हो तो सब काम छोड़कर देख आइए। ऐसी फ़िल्मे देश में कभी-कभार बनती हैं। यह सिर्फ़ फ़िल्म नहीं है। जातिवाद में सने ‘जन’जीवन, दलित उत्पीड़न, धर्मांध राजनीति और बेईमान पुलिस-तंत्र के धतकरम का जीवंत दस्तावेज़ है। संविधान की उड़ती धज्जियों, समाज, राजनीति और मीडिया के पतन की काली छाया का आईना।

मैंने तो गए हफ़्ते ट्विटर पर लिखा था कि आर्टिकल-15 को बेहिचक कर-मुक्त घोषित किया जाना चाहिए। ज़्यादा लोग देखेंगे। समाज का सोच कुछ चेतन होगा। लेकिन कर-मुक्त करे कौन? शायद ख़याल हो कि ब्राह्मण न नाराज़ हो जाएँ। कोरा डर है। फिर, कूपमंडक जड़-दिमाग़ों से डरना भी क्या।

इस फ़िल्म की ख़ासियत केवल कथा-पटकथा-संवाद (गौरव सोलंकी/अनुभव सिन्हा) नहीं है, निर्देशन, अभिनय (मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयानी गुप्ता और मोहम्मद जीशान अय्यूब किरदारों से कितने एकजान हो गए हैं), छायांकन (पूरी फ़िल्म मानो एक धुँधलके से गुज़र रही हो, जैसे कि समाज), संपादन, संगीत और गीत (कभी अरुणा रॉय-निखिल डे वाली मंडली के लोकरंग में सुने ‘कहब तो लग जाई धक्’ से लेकर बॉब डिलन के वेदना-सने ‘आंसर इज ब्लोइंग इन द विंड’ तक), ध्वनि, लोकेल, भाषा, वेशभूषा …। कहने का आशय यह कि फ़िल्म फ़िल्म के मानदंडों पर मुकम्मल है। मुकम्मल शब्द मैं कम ही फ़िल्मों के लिए इस्तेमाल कर सकता हूँ।

इसे देखने से पहले हाल के माहौल में तो सोचना मुश्किल था कि हिंदी में क्या अब फ़िल्में बिना नाच-गाने, हिंसा, गाली-गुफ़्तार (अनुराग कश्यप नोट करें) आदि टोटकों के बिना भी बन सकती हैं।

यह भी अहम बात है कि फ़िल्म बाबा साहब और गांधीजी दोनों को साथ लेकर चलती है। जबकि आजकल दोनों के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिशें आम हैं।

आर्टिकल-15 निर्देशक की फ़िल्म है। मगर वे किसी पहलू पर हावी नहीं लगे। फिर भी हर जगह मौजूद हैं। तभी ‘संदेश’ न-संदेश की तरह सहजता से देखने वालों तक पहुँच जाता है। मैंने कम ही फ़िल्मों में लोगों को सही जगह पर ताली बजाते हुए देखा है। उठते वक़्त तो कम ही।

ओम थानवी जी की वॉल से

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