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नोटबंदी मोदी सरकार का राजनीतिक प्रयोग था | Demonetisation was a political experiment of ‘Modi Government’

Posted on: 21 Apr 2019 12:27 by Pawan Yadav
नोटबंदी मोदी सरकार का राजनीतिक प्रयोग था | Demonetisation was a political experiment of ‘Modi Government’

वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया

मौजूदा लोकसभा चुनाव देखकर लगता है कि देश की जनता के साथ कोई प्रयोग हो रहा है। देश की हालत सबके सामने है। 130 करोड़ से ज्यादा आबादी है, जिसमें आधी से ज्यादा गरीब है। गिनती के लोगों की अमीरी लगातार बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था उलट-पलट हो चुकी है। पिछले चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने अच्छे दिन लाने का जुमला उछाला था। अब उनकी सरकार के कार्यकाल के पांच साल पूरे होने वाले हैं। चुनाव के मौके पर कई लोग आकलन कर रहे हैं कि जो हो रहा है, उसे अच्छे दिन कहें या बुरे? मोदी को आगे करके किन ताकतों ने देश को अपने काबू में ले लिया है, यह जांच का विषय है।

मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार समाप्त करने और लोगों के यहां जमा काला धन निकलवाने के नाम पर बहुत कुछ किया है। इसमें नोटबंदी प्रमुख है। मोदी का दावा है कि देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए उन्होंने नोटबंदी का फैसला किया। उसके बाद सामान्य वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगाया। नोटबंदी के ढाई साल बाद जो माहौल बना, उससे यह साबित होता है कि यह अर्थव्यवस्था ठीक करने के लिए उठाया कदम नहीं था, बल्कि सोच समझकर उठाया गया राजनीतिक कदम था। इस देश की अर्थव्यवस्था अलग तरह की है और राजनीति अलग तरह की। जिस तरह दो समानांतर पटरियों पर रेल चलती है, उसी तरह देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था भी समानांतर है, जो एक दूसरे को टच नहीं करती।

मोदी सरकार ने नोटबंदी के बाद लोगों के घरों से सारे एक हजार और पांच सौ के नोट निकलवा लिए। जब नोट ही रद्दी हो गए तो उनको नए नोटों से बदलना जरूरी था। पुराने नोट चलन से बाहर कर पांच सौ और दो हजार के नए नोटों से उनको बदलने में बहुत बड़ा खेल हो गया। भाजपा को छोड़कर बाकी अन्य राजनीतिक पार्टियों के पास नकदी खत्म हो चुकी थी और बगैर पैसे के चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल है। मार्च 2017 में उप्र विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला तीन चौथाई बहुमत इसकी मिसाल है।
मौजूदा लोकसभा चुनाव में भी कई बातें सामने आ रही हैं, जो यह साबित करती है कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था पर काबू करके भाजपा के बहुमत को स्थायी बनाने की संभावनाओं पर काम कर रही है। काले धन को सफेद करने के लिए चुनावी बांड योजना लागू की गई, जिसमें 95 फीसदी चंदा सिर्फ भाजपा को मिला। भाजपा का विरोध करने वाले विपक्षी नेताओं के ठिकानों पर आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के छापे पड़ने लगे। अब तक एक भी किसी बड़े भाजपा नेता के यहां या भाजपा से जुड़े किसी बड़े व्यापारी के यहां छापों की खबर नहीं आई है। क्या भाजपा के लोग ईमानदार हैं और अन्य पार्टियों से जुड़े लोग बेईमान हैं?
देश की बहुसंख्यक जनता आर्थिक रूप से कमजोर है। ज्यादातर लोग रोज कमाने खाने वाले हैं। किसानों की हालत तो और भी खराब है। इन लोगों के वोटों से सरकार बनती है। इन लोगों से भाजपा के पक्ष में मतदान करवाने के लिए मोदी सरकार गरीब किसानों को पैसे बांटने का प्रचार कर रही है। नोटबंदी और गलत तरीके से जीएसटी लागू करने से जो लोग बड़ी संख्या में बेरोजगार हो गए हैं, उनको देखकर किसी भाजपा नेता के चेहरे पर शिकन तक नहीं है। उनका एक ही राग है कि मोदी सरकार जो कर रही है, अच्छा कर रही है और आगे भी अच्छा ही करेगी। मोदी सरकार से प्रेरणा लेकर कांग्रेस ने भी न्यूनतम आय योजना (न्याय) लागू करने का वादा किया है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों के केंद्र में गरीब जनता है, गरीबी दूर करने के वादे हैं।

कांग्रेस का घोषणा पत्र जारी होने के बाद भाजपा के धुंआधार प्रचार में अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे चतुराई से गायब कर दिए गए हैं, क्योंकि कांग्रेस का न्याय भारी पड़ रहा है। मोदी सरकार को अनुमान था कि अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने का असर चुनाव पर पड़ेगा, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रवाद, भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान जैसे मुद्दों को उछाला गया है। एयरस्ट्राइक और उसका प्रचार इसी रणनीति का हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी ईमानदार हैं, खुद भ्रष्टाचार नहीं करते हैं, देश के चौकीदार हैं, देश मोदी के हाथों में सुरक्षित है, मोदी है तो मुमकिन है, एक बार फिर मोदी सरकार। तरह-तरह के नारे देश में गूंज रहे हैं। सुनते-सुनते लोगों के कान पक गए हैं।

मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कार्पोरेट कंपनियों के हवाले करने की नीति अपनाई है। उसका असर बाजार पर दिखने लगा है। आने वाले दिनों में और परिवर्तन होगा। छोटे-छोटे कामधंधे खत्म होने के रास्ते पर हैं। एक बार फिर मोदी सरकार बनने पर बाकी बचे छोटे कारोबार भी इतिहास का विषय बन जाएंगे। उसके बाद देश के लोग क्या करेंगे? शिक्षा की तरफ कोई ध्यान नहीं है, सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में कोई काम नहीं हुआ, जनता को रोजगार करने की सहूलियत नहीं है, अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम कानून-कायदे थोप दिए गए हैं। बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार नौकरी नहीं दे रही है और स्वरोजगार करके आजीविका चलाना मुश्किल हो रहा है। इस स्थिति में ये बेरोजगार क्या करेंगे?

बेरोजगारों की भीड़ और सांप्रदायिक तनाव फैलाने की रणनीति। क्या यह लोकतंत्र में अराजकता को निमंत्रण नहीं है? अगर अराजकता फैल गई तो क्या होगा? क्या लोगों की ऊर्जा एक दूसरे से लड़ने में खर्च होगी? इस माहौल में मोदी और अमित शाह क्या करेंगे? बहरहाल देश की स्थिति विकट है। चुनाव के मौके पर सवालों की भीड़ है और लोगों से कहा जा रहा है कि मोदी पर भरोसा रखें, मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है। एक बार फिर मोदी सरकार। अगर लोग भाजपा के प्रचार की चपेट में आ गए तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। इस पर हर देशभक्त भारतीय को सोचने की जरूरत है। लेकिन चुनाव प्रचार के शोर में क्या लोगों को सोचने का मौका मिलेगा?

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