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संत की संलेखना….सदियों से सुन रहे हैं कि जन्म लेते ही हमारा कदम मृत्यु की ओर बढ़ता है

Posted on: 31 Aug 2018 22:04 by krishnpal rathore
संत की संलेखना….सदियों से सुन रहे हैं कि जन्म लेते ही हमारा कदम मृत्यु की ओर बढ़ता है

सदियों से सुन रहे हैं कि जन्म लेते ही हमारा कदम मृत्यु की ओर बढ़ता है। रोज रात को नींद में हम पूर्वाभ्यास भी करते हैं। बावजूद इसके हर वक्त इसी कोशिश में रहते हैं कि कैसे मृत्यु को खुद से दूर रख सकें। मृत्यु का भय इस हद तक समाया हुआ है कि घर से निकलते वक्त कोई कह दे कि मैं जा रहा हूं तो बुजुर्ग टोक देते हैं कि ऐसा नहीं कहते। कहते हैं मैं जाकर आता हूं या मैं अभी आता हूं। हम भूल से भी किसी के जाने की बात नहीं सह पाते।

बेध्यानी में अगर कोई गाड़ी अचानक से सामने आ जाए तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं, धडक़नें तेज हो जाती हैं। कुछ देर तक कंपकंपी मची रहती है। ब्लड टेस्ट के लिए अंगुली की ओर बढऩी वाली छोटी सी सुई पूरे तंतु हिला देती है। इंजेक्शन तो कयामत ही ला देता है। समझ ही नहीं आता कि ये ही जान ले लेगा तो बचाएगा क्या। कोई कुत्ता पीछे पड़ जाए तब तो सारे देव मना लिए जाते हैं। मृत्यु का ये कैसा भय है, जो चारों ओर से हमें घेरे हुए है। हर सांस के साथ जीने का उत्सव कम और मृत्यु की आहट का भय अधिक हावी रहता है।

सारी दौड़ के पीछे भी तो वही डर काम कर रहा है। दिन, महीनों बरसों की गिनती के पीछे से भी वही तो झांकता रहता है। कितने लोग हैं, जो जन्मदिन की शुभकामना लेने के बजाय ठहाका लगा देते हैं कि बधाई तो ठीक है भाई, लेकिन एक साल और कम हो गया, उसका क्या। यानी जन्मदिन के जश्न में एक वक्त के बाद मोमबत्तियां कम और दिल ज्यादा जलता है। चिंताएं सताने लगती है, इतने हो गए, न जाने कितने और बाकी हैं।

इसलिए आखिरी दिनों के इंतजाम में पूरी जिंदगी को ही रात-दिन के चूल्हे में झोंक देते हैं। जब हाथ-पैर काम नहीं करेंगे, तब जरूरतें कैसे पूरी होंगी। किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। कितनी दुश्चिंताएं घेरे रहती है। यानी दुनिया का हर साजो सामान इसलिए जुटाया जा रहा है ताकि आखिरी वक्त सुकून के साथ रह सकें। जैसे लोग चाहते हैं कि पूरा दिन कैसे भी बीते, लेकिन रात को बिस्तर पर सिर रखते ही नींद आ जाए। सुकून की नींद में आरामदायक मृत्यु की ख्वाहिश ही झांक रही होती है।

जीवन की किताब में मौत के साथ सांसों का यह हिसाब ऐसे ही चलता रहता है। जैसे एक अंतहीन सा इंतजार पसरा हुआ है हर कहीं। कहीं से झांक रहा है, हमें देख रहा है, कहीं हमारी अंगुली पकडक़र हमारे ही साथ चहलकदमी कर रहा है। और इस कदमताल में अगर कोई है, जो इस डर से बाहर ले जाता है तो वह है हमारा मन। ख्वाहिशों से भरा, जिसका दामन कभी खाली नहीं होता। एक सपना पूरा होता है या टूटता है तो चार नए संजो लेता है।

मन ही तो है जो जिंदगी के दरवाजे पर मौत की कुंडी लगने से रोके रखता है। इच्छाओं की ऐसी घुट्टी पिलाता है कि हर वक्त लगाए रखता है, दौड़ाते रहता है। जब पैर जवाब दे जाते हैं, सांसे-धडक़न भी साथ छोडऩे पर आ जाते हैं, तब भी मन का दीपक उसी ताकत से रोशन होता रहता है। जिंदगी के आखिरी क्षण तक जिंदगी की इच्छा खत्म ही नहीं होने देता। आखिरी दम तक इसी कोशिश में लगाए रखता है कि कैसे चंद सांसें और मिल जाए।

इसलिए सबकुछ आंखों के सामने आ जाने के बाद भी यकीन नहीं कर पाते कि जिंदगी का तंबू उखडऩे वाला है। सामान समेटने का वक्त आ गया है। उस लालची किसान की तरह जिसे वरदान मिलता है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक जितनी भूमि वह दौडक़र नाप लेगा, उतनी उसकी हो जाएगी। शर्त यही होगी कि उसे सूर्यास्त तक वहीं लौटकर आना होगा, जहां से शुरू किया था। लौटना जरूरी है, अहम शर्त है, फिर भी कोई लौटकर नहीं आ पाता, क्योंकि मन और..और ही करता रहता है।

ऐसे में अगर कोई मन के दरीचे खोलकर बाहर-भीतर से खुद को खाली कर ले। मृत्यु के आगमन के लिए रेड कॉरपेट बिछाकर बैठ जाए। मन के घोड़े को बांध दे और कह दे कि बस अब और न ही अब अगर कुछ बाकी है तो सिर्फ उस क्षण का इंतजार। वह तो आना ही है, लेकिन उसे टालने की कोशिशों के बजाय आलिंगन को तत्पर हो जाएं कि आजा कब से तेरा ही इंतजार था, तो मृत्यु भी उत्सव हो सकती है। एक संत इसी उत्सव का आगाज करने जा रहा है। क्षण दु:ख के हैं, लेकिन इतनी बड़ी सीख हम सबको पीढिय़ों तक रोशन करती रहेगी।

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