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यानी बहनजी की पार्टी में ‘वो सुबह’ शायद कभी नहीं आएगी, अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 28 May 2018 04:19 by Ravindra Singh Rana
यानी बहनजी की पार्टी में ‘वो सुबह’ शायद कभी नहीं आएगी, अजय बोकिल की टिप्पणी

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अपनी पार्टी को परिवारवाद से मुक्त करने के लिए जो बदलाव किया है, वह वास्तव में परिवारवाद पर एकाधिकारवाद की दमदारी से पुनर्स्थापना है। बहनजी ने पार्टी में जारी आंशिक परिवारवाद को भी खत्म करने के लिए अपने सगे भाई और इनकम टैक्स के कई मामलों में फंसे आनंद कुमार को बीएसपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से हटा दिया है। साथ ही पार्टी की यूपी यूनिट का अध्यक्ष आरएस कुशवाहा को बना दिया है। पूर्व में इस पद पर तैनात राम अचल राजभर को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है।

पार्टी में पहली बार नेशनल कोआॅर्डिनेटर की नियुक्ति की भी गई है। इनमें से एक के पास छत्तीसगढ़ का भी चार्ज होगा। मायावती ने कहा कि ‘मुझे मिलाकर और मेरे बाद अब आगे भी बीएसपी का जो भी ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष’ बनाया जाएगा तो फिर उसके जीते-जी और ना रहने के बाद भी उसके परिवार के किसी भी नजदीकी सदस्य को पार्टी संगठन में किसी पद पर नहीं रखा जाएगा। उनके परिवार के सदस्य बिना किसी पद पर रहकर और एक साधारण कार्यकर्ता के तौर पर नि:स्वार्थ भाव से पार्टी में कार्य कर सकते हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि उनके अपने परिवार के किसी भी नजदीकी सदस्य को ना कोई चुनाव लड़ाया जाएगा और ना ही उसे कोई राज्यसभा सांसद, एमएलसी और मंत्री बनाया जाएगा। ना ही उसे अन्य किसी भी राजनीतिक उच्च पद पर रखा जाएगा। पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को छोड़कर बाकी अन्य सभी पदाधिकारियों के परिवार के लोगों पर ‘विशेष परिस्थितियों में’ यह सब शर्तें लागू नहीं होगी।’

बहुजन समाज पार्टी देश की तीसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है, जिसे पिछले लोकसभा चुनाव में 4.2 फीसदी वोट मिलने के बाद बावजूद एक भी सीट नहीं मिल पाई थी। इसके बाद भी मायावती ने हौसला नहीं खोया और वह पार्टी की धुरी बनी रहीं। बहुजन समाज पार्टी मुख्यह रूप से दलितों, आदिवासियों और कुछ अोबीसी की पार्टी मानी जाती है। विचारधारा की दृष्टि से वह गौतम बुद्ध, बाबा साहब आंबेडकर, महात्मा फुले और पेरियार ई वी रामास्वामी को मानती है। इनमें समान सूत्र यह है कि ये सभी ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद विरोधी थे। वैसे बहुजन समाज पार्टी की स्थापना स्व. कांशीराम ने 1984 में की थी। ‘बहुजन’ नाम बौद्ध दर्शन से लिया गया है, जहां बुद्ध ने समाज के पिछड़े और दलित वर्ग को बहुजन को कहकर सम्बोधित किया था।

उन्होने कहा था ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।‘ स्व. कांशीराम कुशल संगठक थे। उन्होने दलितों और पिछड़ों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था के ‍खिलाफ राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की सफल कोशिश की। हालांकि उन्हें सत्ता सुख ज्यादा नहीं मिल सका। मायावती उन्हीं की ‍िशष्या हैं और दलित जातियां और खासकर जाटव समाज उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत मानता है। बसपा की विचारधारा दलितों के हित में ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति’ पर आधारित है। बसपा ब्राह्मणवाद को ही ‘मनुवाद’ कहती है। इस शाब्दिक बदलाव का फायदा पार्टी को यह हुआ कि उसने 2007 में ब्राह्मणों के समर्थन से ही यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। वैसे भी ब्राह्मणों को लेकर पार्टी की सोच राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से बदलती रहती है।

यहां मुद्दा यह कि बरसों बाद बसपा ने अपने पार्टी संविधान में कोई महत्वपूर्ण बदलाव किया है। हालांकि यहां यह सवाल भी किया जा सकता है कि बसपा का कोई संविधान है भी ? है तो क्या है? क्योंकि इस तरह की ‘व्यक्ति केन्द्रित’ पार्टियों में लिखित संविधान कुछ भी हो, व्यावहारिक संविधान मौखिक ही होता है और वह पार्टी सुप्रीमो की मर्जी से संचालित होता है। बसपा जैसी पार्टी में तो संविधान दरअसल बहनजी से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होता है। इस हिसाब से बसपा यकीनन ऐसी पार्टी है, जहां व्यक्ति का कोई वजूद ही नहीं है। किसकी जगह कौन आया, यह समझने के लिए पहले यह जानना पड़ता है कि पहले था कौन, जो अब बदल ‍िदया गया है।

बहरहाल मायावती ने पार्टी में जो बदलाव किए हैं, उसका अहम संदेश यह है कि दल में अब परिवारवाद नहीं चलेगा ( जो खुद उनका ही चलाया हुआ था)। यह अन्य पार्टियों के लिए भी अनुकरणीय है। लेकिन जो दूसरी मार्के की बात बहनजी ने जो कही, वह यह है कि अगले 20-22 वर्षों तक वे ही पार्टी की सुप्रीमो बनी रहेंगी। बहनजी अभी 62 की हैं, इस हिसाब से उनके 82 का होने तक तो बसपा में ‍िकसी के पार्टी अध्य क्ष बनने के कोई चांस नहीं है। कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियो में सत्ता का हस्तांतरण कम से कम परिवार की अगली पीढ़ी को तो हो जाता है, लेकिन बसपा में इसकी गुंजाइश भी नहीं है। उन्होने साफ कहा कि कोई मेरा उत्तराधिकारी बनने का सपना भी न देखे।

यह धमकी भरी नसीहत इसलिए भी अहम है कि बहनजी ने 2009 में खुला ऐलान किया था कि उन्होने अपने उत्तराधिकारी का चयन कर ‍िलया है। वह दलित ही होगा और उमर में उनसे 18-20 साल छोटा होगा। मायावती ने यह भी कहा था ‍कि राजनीतिक वारिस का नाम सील बंद लिफाफे में दो विश्वस्तों की कस्टडी में रख दिया गया है। वो किस्मतवाला कौन है, इसका खुलासा मायावती के इहलोक से जाने के बाद ही होगा।

लेकिन बीते दस सालों में हालात बदले हैं। मायावती ‘बहनजी’ से ‘बुआजी’ कहलाने लगी हैं। उनकी राजनीतिक पकड़ को उनके अपने समुदाय से ही चुनौती मिलने लगी है। नया दलित नेतृत्व बहनजी के समझौतावादी सामाजिक परिवर्तनवाद से दूर जाने लगा है। दरअसल बसपा का सबसे माइनस पाॅइंट यह है कि उसने बाबा साहब की मूल चिंतन धारा से हटकर सत्ता को ही सामाजिक बदलाव का इंजन मान लिया है। चूंकि सत्ता ही साध्य है, इसलिए बहनजी के लिए उनके समुदाय के लोग सैनिक तो हैं, लेकिन उन्हें जनरल बनने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यह केवल बहनजी का विशेषाधिकार है। सेवकों का काम केवल सेवा ही करते रहना है। यहां सवाल सिर्फ इतना है कि ऐसे कितने संघर्षजीवी दलित नेता हैं, जो अपने भावी 22 साल भी इस उम्मीद में दांव पर लगाने को तैयार होंगे कि ‘वो सुबह कभी तो आएगी…।‘ अगर आएगी तब क्या पार्टी बची रहेगी ?

अजय बोकिल

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