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दक्षिण राज्यों में हिंदी पढ़ाने के प्रस्ताव पर बोले थरूर- ‘उत्तर भारत में तो कोई तमिल नहीं सीखता’

Posted on: 02 Jun 2019 21:16 by bharat prajapat
दक्षिण राज्यों में हिंदी पढ़ाने के प्रस्ताव पर बोले थरूर- ‘उत्तर भारत में तो कोई तमिल नहीं सीखता’

अहिंदी राज्यों में हिंदी पढ़ाए जाने के प्रस्ताव को लेकर छिड़े विवाद के बीच रविवार को पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता शशि थरूर ने बड़ा बयान दिया है। तिरुवंतपुरम से सांसद थरूर ने कहा कि तीन भाषा फार्मूले कि सफलता इसमें है कि देशभर में इसे ठीक तरह से लागू किया जाए । पहले भी इसे लागू करने की बात कही गई थी लेकिन इसे ठिक से क्रियान्वित नहीं किया जा सका था।

क्या बोले थरूर-

कांग्रेसी नेता थरूर ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा कि ‘दक्षिण भारत में हममें से कई लोग दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी सीखते हैं लेकिन उत्तर भारत में कोई मलयालम या तमिल नहीं सकता। इस दिन भाषा के फार्मूले की सफलता इसमें है कि देश भर में इसे ठीक तरह से लागू किया जाए।’

नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट में रखा गया था यह प्रस्ताव-

बता दे कि पिछली एनडीए सरकार में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ने प्रमुख वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक पैनल का गठन किया था। जिसमें एक नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सरकार को सौंपा गया था। ड्राफ्ट में अहिंदी भाषी राज्य में हिंदी पढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था।

दक्षिण भारत में हो रहा विरोध-

वहीं इस प्रस्ताव का दक्षिण भारत में जमकर विरोध हो रहा है और कई नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार दक्षिण में हिंदी भाषा को जबरन थोप रही है। अब इस मामले में शशि थरूर ने भी अपना मत रखा है और कहा है कि शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में दिया गया यह प्रस्ताव कोई नई बात नहीं है। 60 के दशक में भी इस फार्मूले को लागू करने की बात की गई थी लेकिन अभी तक इसे ढंग से क्रियान्वित नहीं किया जा सका।

डीएमके ने जताया था विरोध-

डीमके के राज्यसभा सांसद तिरुचि सिवा ने हिंदी को तमिलनाडु में थोपा जाना सल्फर गोदाम में आग फेंकने जैसा बताया है। उन्होने कहा कि यदि फिर से हिंदी सीखने पर जोर दिया जाता है तो यहां के छात्र और युवा द्वारा इसे रोक दिया जाएगा। उन्होने 1965 में हुए हिंदी विरोधी आंदोलन का भी उदाहरण दिया है।

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