तन्वी सेठ का पासपोर्ट और ‘वीजा माता’ का इंसाफ ! अजय बोकिल की कलम से

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अंतरधर्मीय विवाह कर पासपोर्ट के लिए आवेदन करने वाले एक युगल के साथ कथित बदतमीजी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से शिकायत के बाद तुरंत पासपोर्ट जारी होने के चर्चित मामले में जो ताजा खुलासे हो रहे हैं, उसे फिरकाई चश्मे के बजाए व्यावहारिक नजर से देखने की जरूरत है। पूरे मामले में सवाल उठ रहा है कि प्रशासन को ‘हयूमन टच’ देते समय नियम-कायदों की अनदेखी कितनी जायज है? बेशक बतौर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने विभाग को एक मानवीय चेहरा प्रदान किया है, जिसकी व्यापक सराहना भी हुई है।

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लेकिन युगल पासपोर्ट मामले में जिस तेजी से कार्रवाई हुई और वह भी नियमों को दरकिनार कर, उसके बाद खुद सुषमाजी भी बैकफुट पर दिखाई दे रही हैं। व्यंग्यात्मक रूप में ही सही, यह बात उनके ताजा ट्वीट में भी झलकी। उन्होने कहा कि वे 17 जून से 23 जून तक विदेश में थी। उन्हें ठीक-ठीक नहीं पता कि इस दौरान (देश में) क्या हुआ। युगल पासपोर्ट मामले को हिंदू- मुस्लिम रंग न देते हुए भी यह प्रश्न एकदम जायज है कि क्या विदेश मंत्री को पहले सम्बन्धित अधिकारी से प्रकरण की पूरी जानकारी नहीं ले लेनी चाहिए थी? मंत्री को जनहित में त्वरितता से काम करना चाहिए, लेकिन किस कीमत पर यह भी उतना ही अहम है।

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इस देश में अंतधर्मीय विवाह और खासकर हिंदू-मुस्लिम विवाह को समाज आसानी से पचा नहीं पाता। लेकिन कौन किससे विवाह करे, यह हर एक का ‍निजी मामला है, उसमें किसी को दखल देने का हक नहीं है। पासपोर्ट आ‍ॅफिस को भी नहीं। लखनऊ में जो मामला सामने आया है, उसके मुताबिक वहां के एक युवक अनस सिद्धिसकी ने लखनऊ की ही तन्वी सेठ से निकाह किया। इसके बाद तन्वी सेठ सादिया बन गई। दोनो का एक बच्चा भी है। सि‍द्धि की दंपति का आरोप है कि तन्वी जब अपना पासपोर्ट बनवाने गई तो पासपोर्ट अधीक्षक ने उसके मजहब के बारे में पूछा और उसे अपमानित किया। इसके बाद तन्वी ने सीधे पीएमअो और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट कर दिया।

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सुषमा ने तुरंत तन्वी का पासपोर्ट बनाने के निर्देश दिए और आरोपी पासपोर्ट अधीक्षक विकास मिश्रा का तबादला कर दिया। यह घटना 20 जून की है। उस वक्त सुषमा विदेश में थीं। जाहिर है कि सुषमा स्वराज की इस प्राॅम्प्टनेस और ‍दरियदिली की चौतरफा तारीफ हुई। माना गया कि अफसरों की अकड़ और नुक्स निकालने की प्रवृत्ति से निपटने का यही सही तरीका है। सिद्धि की दंपति ने इसे अपनी ‘नैतिक विजय’ मानते हुए मीडिया के सामने ‘वी’ का निशान भी बनाया। उधर किसी ने हटाए गए पासपोर्ट अधीक्षक का पक्ष भी जाना।

उसमें खुलासा हुआ कि तन्वी का कथित अपमान नहीं हुआ था, बल्कि उससे वह पूछताछ की गई थी, जो पासपोर्ट में विसंगत जानकारी देने के कारण जरूरी थी। इसके बाद संदेह और गहरा गया। ट्रोलर्स ने सुषमा स्वराज को खूब ट्रोल किया। यह भी कहा गया कि सुषमाजी किसी को तवज्जो नहीं देती सिवाय उस पाकिस्तानी को, जो भारत आने के लिए वीजा मांग रहा हो। एक ने यह भी ट्वीट किया कि अगर हाफिज सईद चाहेगा तो उसका पास पासपोर्ट भी बन जाएगा। हालांकि इसे सुषमा स्वराज की उदारता ही कहिए कि उन्होने अपने खिलाफ पोस्ट को भी ‘लाइक’ किया। लेकिन इसी बीच विदेश मंत्रालय ने लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) को इस मामले की पूरी जांच करने को कहा। जांच में सामने आया ‍िक तन्वी ने आवेदन में अपना नाम शािदया अनस लिखा है।

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उनका पता भी सही नहीं है। सत्यापन में पाया गया कि सिद्धितकी दंपति नोएडा में हैं, पता लखनऊ का ‍िदया है। ऐसी गलत जानकारी के लिए पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है। यह भी सामने आया कि तन्वी ने कहीं अपना नाम शादिया और कहीं सादिया बताया है। जानकारों के मुता‍िबक शादिया कोई शब्द नहीं है। सादिया जरूर होता है। पासपोर्ट अधीक्षक विकास मिश्रा के अनुसार उन्होने तन्वी से वही नाम आवेदन में लिखने को कहा था जो निकाहनामे में लिखा है। निकाहनामे में यह नाम शादिया अनस है। लेकिन तन्वी ने इंकार कर दिया। नियम कहता है कि पति-पत्नी दोनो के उपनाम एक होने चाहिए। लेकिन अगर ये अलग-अलग हैं तो आवेदक को एक घोषणा पत्र देना होता है। इसमें धार्मिक अपमान की क्या बात है? इस पर तन्वी का कहना था ‍िक मिश्रा ने यह बात तेज आवाज में कही। वे इसे शांत ढंग से भी कह सकते थे।

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यहां सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या किसी मंत्री को न्याय दिलाने के उत्साह में नियमों को दरकिनार कर देना चाहिए? दूसरे, सिद्धि की दंपति को इस मामले को साम्प्रदायिक तूल देने की जगह पूछे गए सवालो के संतोषजनक जवाब नहीं देने चाहिए थे? क्या उन्होने यह ‘सच’ को छुपाने के‍ लिए किया? या फिर वे नियमों के पालन को ‘अड़ंगेबाजी’ मान रहे थे? इस बात से कोई इंकार नही कर सकता कि सुषमा स्वराज जितनी जल्दी इंसाफ करने में भरोसा करती हैं, वह काबिले तारीफ है। ऐसा करते वक्त वे कोई फिरकाई, नस्ली या जाति का चश्मा भी नहीं लगातीं। उनके लिए इंसानियत पहले है। होना भी चाहिए। इस हिसाब से ‘भक्तों’ द्वारा उनको ट्रोल किया जाना नासमझी ही थी। लेकिन अफसर विकास‍ मिश्रा को भी अकारण जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी, वह भी नौकरशाहों में भरोसा जगाने वाली नहीं थी। अफसरों का काम नियम सम्मत काम करना है।

हुकूमत चलाना नहीं है। लेकिन जवाब तलबी भी उन्हीं का ही काम है। अगर तुरंत पासपोर्ट दिलाना मानवता है तो पासपोर्ट नियमानुसार देना भी मानवीय जरूरत का वैध हिस्सा है। इसे हिंदू-मुस्लिम की तराजू में तौलना मामले को गलत मोड़ देना होगा। अंतरधर्मीय‍ विवाह मनुष्यों को जोड़ता है ,लेकिन उससे गलत बयानी का ‍अधिकार नहीं मिल जाता। लखनऊ पासपोर्ट विवाद का सबक यह है कि जज्बात के साथ कानूनी जरूरियात का भी उतना ही महत्व है। एक ट्रोलर ने सुषमा स्वराज की को ‘वीजा माता’ का खिलता दे डाला। ऐसी माता जो वरदान की तरह वीजा देने को आतुर है। बेहतर होता कि अनस दंपति को पासपोर्ट तुरंत मिलता और वो भी सही और प्रामाणिक जानकारी के साथ। वैसे भी देश में किसी हिंदू-मुस्लिम जोड़े का पासपोर्ट कोई पहली बार तो बना नहीं है। यह सुषमाजी भी जानती हैं

ajay bokilअजय बोकिल

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